8 years ago#41
दरअसल अनिल को MBA कराने के लिए पिताजी को अपनी ज़मीन और घर गिरवी रख के बैंक से लोन लेना पड़ा था| बैंक ने घर और ज़मीन की value बहुत कम लगाईं थी इस कारन हमें सिर्फ 3.5 लाख ही लोन मिला बाकी का 1.5 लाख कम पड़ रहा था| हमारी दूसरी ज़मीन से घर का गुजर-बसर हो जाय करता था बस! पिताजी की उम्मीद थी की MBA के बाद अनिल को अच्छी नौकरी मिल जायेगी और वो धीरे-धीरे कर के लोन की किश्त उतारता जायेगा| पर ऐसा ना हो सका..... financially हमारे घर की हालत बहुत कमजोर हो गई थी और बैंक को अपना पिसा डूबता नजर आया तो उसने पिताजी को नोटिस भेज दिया...... सच पूछो तो मैं अपनी इस नई जिंदगी में इस कदर डूब गई की मैं ये बात भूल ही गई थी...और मुझे ये तब याद आया जब आज पिताजी ने ये बात दोहराई!
"जब मानु को ये बात पता चली तो उसने बिना कुछ सोचे मुझे दस लाख का चेक फाड़ के दे दिया..... और बस इतना कहा की संगीता को कुछ मत बताना| " ये सुन के मेरे चेहरे पे हवाइयां उड़ने लगीं...क्योंकि मुझे इन्होने कुछ नहीं बताया था| "हाँ...तूने सही सुना...तेरे पति ने...जबकि तुझे तो शायद याद ही नहीं होगा की तेरा बाप कर्जे तले दबा हुआ है! पर मैंने आजतक तुझसे कुछ शिकायत नही की.... पर आज तूने एक देवता सामान इंसान को इस कदर दुखी किया की आज उसकी ये हालत हो गई! और तुझे अगर इतनी ही तकलीफ थी तो क्यों शादी की? ..क्यों मानु की और अपने सास-ससुर की जिंदगी में जहर घोल दिया?क्या तुझे पता नहीं था की जो कदम तू उठाने के लिए उसे मजबूर कर रही है उसका अंजाम क्या होगा? उसने बिना पूछे बिना कहे हर मोड़ पे हमारे परिवार की मदद की...सिर्फ इसलिए की वो तुझे खुश देखना चाहता था और तू....तू उसका मन रखने के लिए खुश होने का दिखावा तक ना कर सकी? मैं पूछता हूँ उसने कौन सा तुझसे सोना-चांदी माँगा था जो तू दे ना पाई? ………. उसके बहुत एहसान हैं हम पर...जिन्हें मैं कभी नही उतार सकता| दिल को लगता था की कम से कम तुझे पा कर वो खुश है...पर तूने तो उससे वो ख़ुशी भी छीन ली! .मुझे शर्म आती है तुझे अपनी बेटी कहते हुए!" ये सब सुनने के बाद मेरे पाँव तले की जमीन खिसक चुकी थी...और मुझे खुद से घिन्न आने लगी थी....नफरत हो गई थी खुद से.... मन इस कदर कचोटने लगा की अगर मैं मर जाती तो अच्छा था!
"समधी जी ये आप क्या कह रहे हो? ये बहु है हमारी!" ये कहते हुए मेरी माँ (सासु माँ) तेजी से चल के मेरे पास आईं और मेरे आँसूं पोंछने लगी| "बहुत प्यार करती है ये मानु से! हो गई गलती बच्ची से! ... उसने कुछ जानबुझ के तो नहीं किया? वो भी सिर्फ इसलिए की वो हम लोगों को अकेला छोड़ के नहीं जाना चाहती थी| इसीलिए वो नाराज हुई...मुझे नहीं लगता उसने कुछ गलत किया! आपको पता है मैं और मानु के पिताजी चाहते थे की शादी के बाद ये दोनों अलग settle हो जाएँ इसलिए शादी वाले दिन मैंने बहु को उसके नए घर की चाभी दी तो जानते हैं इसने क्या किया? चाभी मुझे लौटा दी...और बोली माँ मैं इन्हें आप से अलग करने नहीं आई हूँ| हम आपके साथ ही रहेंगे! और तो और अपने हनीमून पर जाने के लिए इसने शर्त राखी की हम सब एक साथ घूमने जाएँ! हर कदम पर इस्सने परिवार को तवज्जो दी है और आप इसकी एक छोटी सी गलती पर....."
"समधन जी...छोटी सी गलती? अगर आप इसे अपनी बेटी मानती हैं तो ये हमारा बेटा है...और आपकी बेटी की वजह से मेरा बेटा इस समय बी बेहोश पड़ा है... सिर्फ और सिर्फ इसकी वजह से!" पिताजी ने मुझ पर गरजते हुए कहा|
"एक बात बताइये समधी जी... अगर यही गलती आपके बेटे ने की होती तो?" माँ ने फिर से मेरा बचाव किया|
"बहनजी.... मानु के बहुत एहसान हैं हम पर...जिसे हम छह के भी नहीं उतार सकते|" पिताजी ने बात को संभालते हुए कहा|
"भाईसाहब.....कैसे एहसान? एहसान तो परायों पर किये जाते हैं और आप तो अपने हैं|" पिताजी (ससुर जी) ने मुस्कुराते हुए कहा| "देखिये जो हुआ सो हुआ...बहु ने कुछ भी जान कर नहीं किया| वो बस मानु को टेंशन नहीं देना चाहती थी| अब आप गुस्सा छोड़िये और अनिल बेटा तुम्हें गुडगाँव दस बजे पहुँचना है| तो मुझे और अपने माँ-पिताजी को घर छोड़ दो| और मानु की माँ..तुम यहीं बहु के पास रहो मैं थोड़ी देर बाद आऊँगा तब तक तुम बहु को नाश्ता करा देना|" बस इतना कह के पिताजी और सब चले गए|
सब के जाने के बाद माँ ने मुझे मुँह-हाथ धो के आने को कहा और फिर नाश्ता परोस दिया| "चल आजा बेटी नाश्ता कर ले! आयुष और नेहा सुबह अपने आप उठ गए और आज खुद तैयार भी हो गए| मैंने सोचा की आज इन्हें स्कूल छोड़ दिया जाए तो आयुष जिद्द करने लगा की पहले पापा से मिलूँगा...उफ्फ्फ्फ़ कितनी मुश्किल से माना वो! खेर तेरे पिताजी (ससुर जी) ने उसे वादा किया की दोनों आज रात यहीं रुकेंगे तब जाके माना वो| अरे! तू वहां कड़ी-कड़ी क्या सोच रही है? चल आजा जल्दी से|" मैं आके उनके सामने बैठ गई पर खाने को हाथ तक नही लगाया और बोली; "माँ...मन नहीं है ...!"
"बेटी..माँ-बाप के कुछ कहने से रूठ थोड़े ही जाते हैं? क्या माँ-बाप को इतना भी हक़ नही की वो अपने बच्चों को डाँट सके?" माँ ने बड़ा सीधा सा सवाल पूछा|
"माँ मैं पिताजी के डाँटने से नही रूठी ... उन्होंने तो कुछ गलत कहा ही नहीं! गलती मेरी थी...सारी की सारी... मुझे तो खुद से घिन्न आ रही है की मैंने इनके साथ ऐसा व्यवहार किया| इन्होने बिना बोले मेरी हर बात समझी.... बिना मेरे कहे पिताजी की ज़मीन बचाई वरना आज वो सब सड़क पे आ जाते और...मैं इनको इस कदर परेशान करती रही!"
"बेटी अगर तेरे खाना ना खाने से मानु की तबियत ठीक हो जाती तो हम सब भूख हड़ताल कर देते और आब तक तो वो भला-चंगा हो जाता| देख तू अपने लिए ना सही उस नए मेहमान के लिए खाना खा ले... अगर उसे कुछ हो गया तो मानु भले ही तुझे माफ़ कर दे पर वो खुद तुझे कभी माफ़ नही करेगा!" इतना कह के माँ ने मुझे जबरदस्ती अपने हाथ से खाना खिलाया|
"बेटी मैं बड़ी किस्मत वाली हूँ.... पहले मानु को अपने हाथ से खिलाती थी.... फिर आयुष को खाना खिलने का मौका मिलाया और आज देख तो किस्मत ने मुझे तुझे भी खिलाने का मौका दिया|"
"इस हिसाब से तो मैं ज्यादा किस्मत वाली हूँ माँ.... बचपन के बाद इतने साल गुजर गए और आज मुझे फिर से अपनी माँ के हाथों खाना खाने का मौका मिल रहा है|"
"अच्छा जी...मानु ने तुझे कभी खाना नहीं खिलाया?" माँ ने जानबूझ के ये शरारती सवाल पूछा, और उनका सवाल सुन के मैं हँस पड़ी! "देखा ....मैं जानती थी!!!" मेरी हँसी छूट गई... और इस तरह हम माँ-बेटी हँस पड़े..... एक मुद्दत बाद!
"जब मानु को ये बात पता चली तो उसने बिना कुछ सोचे मुझे दस लाख का चेक फाड़ के दे दिया..... और बस इतना कहा की संगीता को कुछ मत बताना| " ये सुन के मेरे चेहरे पे हवाइयां उड़ने लगीं...क्योंकि मुझे इन्होने कुछ नहीं बताया था| "हाँ...तूने सही सुना...तेरे पति ने...जबकि तुझे तो शायद याद ही नहीं होगा की तेरा बाप कर्जे तले दबा हुआ है! पर मैंने आजतक तुझसे कुछ शिकायत नही की.... पर आज तूने एक देवता सामान इंसान को इस कदर दुखी किया की आज उसकी ये हालत हो गई! और तुझे अगर इतनी ही तकलीफ थी तो क्यों शादी की? ..क्यों मानु की और अपने सास-ससुर की जिंदगी में जहर घोल दिया?क्या तुझे पता नहीं था की जो कदम तू उठाने के लिए उसे मजबूर कर रही है उसका अंजाम क्या होगा? उसने बिना पूछे बिना कहे हर मोड़ पे हमारे परिवार की मदद की...सिर्फ इसलिए की वो तुझे खुश देखना चाहता था और तू....तू उसका मन रखने के लिए खुश होने का दिखावा तक ना कर सकी? मैं पूछता हूँ उसने कौन सा तुझसे सोना-चांदी माँगा था जो तू दे ना पाई? ………. उसके बहुत एहसान हैं हम पर...जिन्हें मैं कभी नही उतार सकता| दिल को लगता था की कम से कम तुझे पा कर वो खुश है...पर तूने तो उससे वो ख़ुशी भी छीन ली! .मुझे शर्म आती है तुझे अपनी बेटी कहते हुए!" ये सब सुनने के बाद मेरे पाँव तले की जमीन खिसक चुकी थी...और मुझे खुद से घिन्न आने लगी थी....नफरत हो गई थी खुद से.... मन इस कदर कचोटने लगा की अगर मैं मर जाती तो अच्छा था!
अब आगे ......
"समधी जी ये आप क्या कह रहे हो? ये बहु है हमारी!" ये कहते हुए मेरी माँ (सासु माँ) तेजी से चल के मेरे पास आईं और मेरे आँसूं पोंछने लगी| "बहुत प्यार करती है ये मानु से! हो गई गलती बच्ची से! ... उसने कुछ जानबुझ के तो नहीं किया? वो भी सिर्फ इसलिए की वो हम लोगों को अकेला छोड़ के नहीं जाना चाहती थी| इसीलिए वो नाराज हुई...मुझे नहीं लगता उसने कुछ गलत किया! आपको पता है मैं और मानु के पिताजी चाहते थे की शादी के बाद ये दोनों अलग settle हो जाएँ इसलिए शादी वाले दिन मैंने बहु को उसके नए घर की चाभी दी तो जानते हैं इसने क्या किया? चाभी मुझे लौटा दी...और बोली माँ मैं इन्हें आप से अलग करने नहीं आई हूँ| हम आपके साथ ही रहेंगे! और तो और अपने हनीमून पर जाने के लिए इसने शर्त राखी की हम सब एक साथ घूमने जाएँ! हर कदम पर इस्सने परिवार को तवज्जो दी है और आप इसकी एक छोटी सी गलती पर....."
"समधन जी...छोटी सी गलती? अगर आप इसे अपनी बेटी मानती हैं तो ये हमारा बेटा है...और आपकी बेटी की वजह से मेरा बेटा इस समय बी बेहोश पड़ा है... सिर्फ और सिर्फ इसकी वजह से!" पिताजी ने मुझ पर गरजते हुए कहा|
"एक बात बताइये समधी जी... अगर यही गलती आपके बेटे ने की होती तो?" माँ ने फिर से मेरा बचाव किया|
"बहनजी.... मानु के बहुत एहसान हैं हम पर...जिसे हम छह के भी नहीं उतार सकते|" पिताजी ने बात को संभालते हुए कहा|
"भाईसाहब.....कैसे एहसान? एहसान तो परायों पर किये जाते हैं और आप तो अपने हैं|" पिताजी (ससुर जी) ने मुस्कुराते हुए कहा| "देखिये जो हुआ सो हुआ...बहु ने कुछ भी जान कर नहीं किया| वो बस मानु को टेंशन नहीं देना चाहती थी| अब आप गुस्सा छोड़िये और अनिल बेटा तुम्हें गुडगाँव दस बजे पहुँचना है| तो मुझे और अपने माँ-पिताजी को घर छोड़ दो| और मानु की माँ..तुम यहीं बहु के पास रहो मैं थोड़ी देर बाद आऊँगा तब तक तुम बहु को नाश्ता करा देना|" बस इतना कह के पिताजी और सब चले गए|
सब के जाने के बाद माँ ने मुझे मुँह-हाथ धो के आने को कहा और फिर नाश्ता परोस दिया| "चल आजा बेटी नाश्ता कर ले! आयुष और नेहा सुबह अपने आप उठ गए और आज खुद तैयार भी हो गए| मैंने सोचा की आज इन्हें स्कूल छोड़ दिया जाए तो आयुष जिद्द करने लगा की पहले पापा से मिलूँगा...उफ्फ्फ्फ़ कितनी मुश्किल से माना वो! खेर तेरे पिताजी (ससुर जी) ने उसे वादा किया की दोनों आज रात यहीं रुकेंगे तब जाके माना वो| अरे! तू वहां कड़ी-कड़ी क्या सोच रही है? चल आजा जल्दी से|" मैं आके उनके सामने बैठ गई पर खाने को हाथ तक नही लगाया और बोली; "माँ...मन नहीं है ...!"
"बेटी..माँ-बाप के कुछ कहने से रूठ थोड़े ही जाते हैं? क्या माँ-बाप को इतना भी हक़ नही की वो अपने बच्चों को डाँट सके?" माँ ने बड़ा सीधा सा सवाल पूछा|
"माँ मैं पिताजी के डाँटने से नही रूठी ... उन्होंने तो कुछ गलत कहा ही नहीं! गलती मेरी थी...सारी की सारी... मुझे तो खुद से घिन्न आ रही है की मैंने इनके साथ ऐसा व्यवहार किया| इन्होने बिना बोले मेरी हर बात समझी.... बिना मेरे कहे पिताजी की ज़मीन बचाई वरना आज वो सब सड़क पे आ जाते और...मैं इनको इस कदर परेशान करती रही!"
"बेटी अगर तेरे खाना ना खाने से मानु की तबियत ठीक हो जाती तो हम सब भूख हड़ताल कर देते और आब तक तो वो भला-चंगा हो जाता| देख तू अपने लिए ना सही उस नए मेहमान के लिए खाना खा ले... अगर उसे कुछ हो गया तो मानु भले ही तुझे माफ़ कर दे पर वो खुद तुझे कभी माफ़ नही करेगा!" इतना कह के माँ ने मुझे जबरदस्ती अपने हाथ से खाना खिलाया|
"बेटी मैं बड़ी किस्मत वाली हूँ.... पहले मानु को अपने हाथ से खिलाती थी.... फिर आयुष को खाना खिलने का मौका मिलाया और आज देख तो किस्मत ने मुझे तुझे भी खिलाने का मौका दिया|"
"इस हिसाब से तो मैं ज्यादा किस्मत वाली हूँ माँ.... बचपन के बाद इतने साल गुजर गए और आज मुझे फिर से अपनी माँ के हाथों खाना खाने का मौका मिल रहा है|"
"अच्छा जी...मानु ने तुझे कभी खाना नहीं खिलाया?" माँ ने जानबूझ के ये शरारती सवाल पूछा, और उनका सवाल सुन के मैं हँस पड़ी! "देखा ....मैं जानती थी!!!" मेरी हँसी छूट गई... और इस तरह हम माँ-बेटी हँस पड़े..... एक मुद्दत बाद!
8 years ago#42
सब के जाने के बाद माँ ने मुझे मुँह-हाथ धो के आने को कहा और फिर नाश्ता परोस दिया| "चल आजा बेटी नाश्ता कर ले! आयुष और नेहा सुबह अपने आप उठ गए और आज खुद तैयार भी हो गए| मैंने सोचा की आज इन्हें स्कूल छोड़ दिया जाए तो आयुष जिद्द करने लगा की पहले पापा से मिलूँगा...उफ्फ्फ्फ़ कितनी मुश्किल से माना वो! खेर तेरे पिताजी (ससुर जी) ने उसे वादा किया की दोनों आज रात यहीं रुकेंगे तब जाके माना वो| अरे! तू वहां कड़ी-कड़ी क्या सोच रही है? चल आजा जल्दी से|" मैं आके उनके सामने बैठ गई पर खाने को हाथ तक नही लगाया और बोली; "माँ...मन नहीं है ...!"
"बेटी..माँ-बाप के कुछ कहने से रूठ थोड़े ही जाते हैं? क्या माँ-बाप को इतना भी हक़ नही की वो अपने बच्चों को डाँट सके?" माँ ने बड़ा सीधा सा सवाल पूछा|
"माँ मैं पिताजी के डाँटने से नही रूठी ... उन्होंने तो कुछ गलत कहा ही नहीं! गलती मेरी थी...सारी की सारी... मुझे तो खुद से घिन्न आ रही है की मैंने इनके साथ ऐसा व्यवहार किया| इन्होने बिना बोले मेरी हर बात समझी.... बिना मेरे कहे पिताजी की ज़मीन बचाई वरना आज वो सब सड़क पे आ जाते और...मैं इनको इस कदर परेशान करती रही!"
"बेटी अगर तेरे खाना ना खाने से मानु की तबियत ठीक हो जाती तो हम सब भूख हड़ताल कर देते और आब तक तो वो भला-चंगा हो जाता| देख तू अपने लिए ना सही उस नए मेहमान के लिए खाना खा ले... अगर उसे कुछ हो गया तो मानु भले ही तुझे माफ़ कर दे पर वो खुद तुझे कभी माफ़ नही करेगा!" इतना कह के माँ ने मुझे जबरदस्ती अपने हाथ से खाना खिलाया|
"बेटी मैं बड़ी किस्मत वाली हूँ.... पहले मानु को अपने हाथ से खिलाती थी.... फिर आयुष को खाना खिलने का मौका मिलाया और आज देख तो किस्मत ने मुझे तुझे भी खिलाने का मौका दिया|"
"इस हिसाब से तो मैं ज्यादा किस्मत वाली हूँ माँ.... बचपन के बाद इतने साल गुजर गए और आज मुझे फिर से अपनी माँ के हाथों खाना खाने का मौका मिल रहा है|"
"अच्छा जी...मानु ने तुझे कभी खाना नहीं खिलाया?" माँ ने जानबूझ के ये शरारती सवाल पूछा, और उनका सवाल सुन के मैं हँस पड़ी! "देखा ....मैं जानती थी!!!" मेरी हँसी छूट गई... और इस तरह हम माँ-बेटी हँस पड़े..... एक मुद्दत बाद!
मैं जानती तो थी की माँ मुझसे अपनी बेटी जैसा प्यार करती है...पर उसका एक अनोखा एहसास मुझे उस दिन हुआ!
दोपहर को अनिल बच्चों को स्कूल से सीधा हॉस्पिटल ले आया और वापसी में माँ को अपने साथ घर ले गया| आयुष तो आते ही अपने पापा के पास जा बैठा और उनसे बात करने लगा| नेहा सोफे पे बैठ के अपना होमवर्क निकाल के बैठ गई| आयुष कुछ खुसफुसाने लगा और उसकी इस खुसर-फुसर में हम माँ-बेटी दोनों की दिलचस्पी जाग गई| "आयुष...बेटा पापा से क्या बात कर रहे हो?" इतने में नेहा उठ के अपने पापा के पास स्टूल पर बैठ गई| उसे इतने नजदीक बैठा देख वो बोला; "दीदी....आप उधर सोफे पर बैठो...मुझे पापा से बात करनी है|"
"मैं नहीं जाती... तू बोल जो बोलना है|" नेहा ने अकड़ते हुए जवाब दिया|
"प्लीज दीदी ...प्लीज......" आयुष ने बड़ी भोली सी शकल बनाते हुए कहा| पर नेहा टस से मस नहीं हुई आखिर मुझे ही बात संभालनी पड़ी वरना दोनों लड़ाई शुरू कर देते|
"आयुष....जो सीक्रेट बात तुम करने वाले हो मुझे पहले से पता है!" मैंने थोड़ा सा नाटक किया| (Bluffing)
"आपको कैसे पता?.... ये तो पापा और मेरा सीक्रेट है!" उसने बड़ी हैरानी से पूछा|
"बेटा....मैं आपकी माँ हूँ| उस दिन जब आप पापा से बात कर रहे थे ना, तब मैंने सब सुन लिया था|" मैंने फिर से Bluff किया|
"ठीक है.... !" शर्म से उसके गाल लाल हो गए थे! "वो...... आज उसने मुझसे बात की!" बस इतना कह के आयुष रुक गया और अपने पापा की तरफ देखने लगा| 'उसने' सुन के मुझे थोड़ा शक हुआ की जर्रूर ये कोई लड़की है! दरअसल आयुष अपने पापा पर ही गया है| इन्होने भी स्कूल में कभी किसी लड़की से बात करने की कोशिश नही की...हाँ अगर कोई लड़की सामने से बात करे तभी ये उसका जवाब देते थे|
"अच्छा...wow! क्या बोला उसने?" मैंने पूछा तो आयुष शर्मा गया|
"वो....उसने....पूछा की .....क्या मैंने होमवर्क किया है?" आयुष ने अटकते-अटकते हुए कहा, ये सुनते ही मेरी हँसी छूट गई| पर नेहा के चेहरे पर कोई भाव नही थे| वो अब भी मुझसे नाराज थी और मेरी हँसी उसे रास नही आई थी इसलिए वो चिढ़ते हुए बोली; "तो? तू स्कूल पढ़ने जाता है या girlfriends बनाने? पढ़ाई में ध्यान लगा!" आयुष का मुँह लटक गया तो मैंने उसे अपने साथ चलने को बोला और उसे ले के मैं कैंटीन आ गई|
"बेटा ये लो आपका फेवरट मिल्क शेक.... happy!" उसने कोई जवाब नहीं दिया तो मैंने ही से बात शुरू की; "बेटा....आपकी दीदी पापा को लेके थोड़ा परेशान है| देखो मुझसे भी वो बात नही करती.... जब पापा ठीक हो जायेंगे तब सब ठीक हो जायेगा| तबतक कोशिश करो की आपकी दीदी को गुस्सा ना आये पर उसे अकेला मत छोड़ना, वो आपसे बहुत ज्यादा प्यार करती है...मुझसे भी ज्यादा!" वो प्यार से मुस्कुराया और स्लुर्प...स्लुर्प... कर अपना मिल्क शेक पीने लगा| आज रात को मैं और बच्चे यहीं सोने वाले थे तो खाना खाने के बाद हम सब लेट गए| मैं सोफे पर और बच्चे नीचे| रात के बारह बजे होंगे की मुझे किसी के बोलने की आवाज आई, ये कोई और नहीं नेहा की आवाज थी| वो अपने पापा से कुछ बात कर रही थी|
"बेटी..माँ-बाप के कुछ कहने से रूठ थोड़े ही जाते हैं? क्या माँ-बाप को इतना भी हक़ नही की वो अपने बच्चों को डाँट सके?" माँ ने बड़ा सीधा सा सवाल पूछा|
"माँ मैं पिताजी के डाँटने से नही रूठी ... उन्होंने तो कुछ गलत कहा ही नहीं! गलती मेरी थी...सारी की सारी... मुझे तो खुद से घिन्न आ रही है की मैंने इनके साथ ऐसा व्यवहार किया| इन्होने बिना बोले मेरी हर बात समझी.... बिना मेरे कहे पिताजी की ज़मीन बचाई वरना आज वो सब सड़क पे आ जाते और...मैं इनको इस कदर परेशान करती रही!"
"बेटी अगर तेरे खाना ना खाने से मानु की तबियत ठीक हो जाती तो हम सब भूख हड़ताल कर देते और आब तक तो वो भला-चंगा हो जाता| देख तू अपने लिए ना सही उस नए मेहमान के लिए खाना खा ले... अगर उसे कुछ हो गया तो मानु भले ही तुझे माफ़ कर दे पर वो खुद तुझे कभी माफ़ नही करेगा!" इतना कह के माँ ने मुझे जबरदस्ती अपने हाथ से खाना खिलाया|
"बेटी मैं बड़ी किस्मत वाली हूँ.... पहले मानु को अपने हाथ से खिलाती थी.... फिर आयुष को खाना खिलने का मौका मिलाया और आज देख तो किस्मत ने मुझे तुझे भी खिलाने का मौका दिया|"
"इस हिसाब से तो मैं ज्यादा किस्मत वाली हूँ माँ.... बचपन के बाद इतने साल गुजर गए और आज मुझे फिर से अपनी माँ के हाथों खाना खाने का मौका मिल रहा है|"
"अच्छा जी...मानु ने तुझे कभी खाना नहीं खिलाया?" माँ ने जानबूझ के ये शरारती सवाल पूछा, और उनका सवाल सुन के मैं हँस पड़ी! "देखा ....मैं जानती थी!!!" मेरी हँसी छूट गई... और इस तरह हम माँ-बेटी हँस पड़े..... एक मुद्दत बाद!
अब आगे ....
मैं जानती तो थी की माँ मुझसे अपनी बेटी जैसा प्यार करती है...पर उसका एक अनोखा एहसास मुझे उस दिन हुआ!
दोपहर को अनिल बच्चों को स्कूल से सीधा हॉस्पिटल ले आया और वापसी में माँ को अपने साथ घर ले गया| आयुष तो आते ही अपने पापा के पास जा बैठा और उनसे बात करने लगा| नेहा सोफे पे बैठ के अपना होमवर्क निकाल के बैठ गई| आयुष कुछ खुसफुसाने लगा और उसकी इस खुसर-फुसर में हम माँ-बेटी दोनों की दिलचस्पी जाग गई| "आयुष...बेटा पापा से क्या बात कर रहे हो?" इतने में नेहा उठ के अपने पापा के पास स्टूल पर बैठ गई| उसे इतने नजदीक बैठा देख वो बोला; "दीदी....आप उधर सोफे पर बैठो...मुझे पापा से बात करनी है|"
"मैं नहीं जाती... तू बोल जो बोलना है|" नेहा ने अकड़ते हुए जवाब दिया|
"प्लीज दीदी ...प्लीज......" आयुष ने बड़ी भोली सी शकल बनाते हुए कहा| पर नेहा टस से मस नहीं हुई आखिर मुझे ही बात संभालनी पड़ी वरना दोनों लड़ाई शुरू कर देते|
"आयुष....जो सीक्रेट बात तुम करने वाले हो मुझे पहले से पता है!" मैंने थोड़ा सा नाटक किया| (Bluffing)
"आपको कैसे पता?.... ये तो पापा और मेरा सीक्रेट है!" उसने बड़ी हैरानी से पूछा|
"बेटा....मैं आपकी माँ हूँ| उस दिन जब आप पापा से बात कर रहे थे ना, तब मैंने सब सुन लिया था|" मैंने फिर से Bluff किया|
"ठीक है.... !" शर्म से उसके गाल लाल हो गए थे! "वो...... आज उसने मुझसे बात की!" बस इतना कह के आयुष रुक गया और अपने पापा की तरफ देखने लगा| 'उसने' सुन के मुझे थोड़ा शक हुआ की जर्रूर ये कोई लड़की है! दरअसल आयुष अपने पापा पर ही गया है| इन्होने भी स्कूल में कभी किसी लड़की से बात करने की कोशिश नही की...हाँ अगर कोई लड़की सामने से बात करे तभी ये उसका जवाब देते थे|
"अच्छा...wow! क्या बोला उसने?" मैंने पूछा तो आयुष शर्मा गया|
"वो....उसने....पूछा की .....क्या मैंने होमवर्क किया है?" आयुष ने अटकते-अटकते हुए कहा, ये सुनते ही मेरी हँसी छूट गई| पर नेहा के चेहरे पर कोई भाव नही थे| वो अब भी मुझसे नाराज थी और मेरी हँसी उसे रास नही आई थी इसलिए वो चिढ़ते हुए बोली; "तो? तू स्कूल पढ़ने जाता है या girlfriends बनाने? पढ़ाई में ध्यान लगा!" आयुष का मुँह लटक गया तो मैंने उसे अपने साथ चलने को बोला और उसे ले के मैं कैंटीन आ गई|
"बेटा ये लो आपका फेवरट मिल्क शेक.... happy!" उसने कोई जवाब नहीं दिया तो मैंने ही से बात शुरू की; "बेटा....आपकी दीदी पापा को लेके थोड़ा परेशान है| देखो मुझसे भी वो बात नही करती.... जब पापा ठीक हो जायेंगे तब सब ठीक हो जायेगा| तबतक कोशिश करो की आपकी दीदी को गुस्सा ना आये पर उसे अकेला मत छोड़ना, वो आपसे बहुत ज्यादा प्यार करती है...मुझसे भी ज्यादा!" वो प्यार से मुस्कुराया और स्लुर्प...स्लुर्प... कर अपना मिल्क शेक पीने लगा| आज रात को मैं और बच्चे यहीं सोने वाले थे तो खाना खाने के बाद हम सब लेट गए| मैं सोफे पर और बच्चे नीचे| रात के बारह बजे होंगे की मुझे किसी के बोलने की आवाज आई, ये कोई और नहीं नेहा की आवाज थी| वो अपने पापा से कुछ बात कर रही थी|
8 years ago#43
दोपहर को अनिल बच्चों को स्कूल से सीधा हॉस्पिटल ले आया और वापसी में माँ को अपने साथ घर ले गया| आयुष तो आते ही अपने पापा के पास जा बैठा और उनसे बात करने लगा| नेहा सोफे पे बैठ के अपना होमवर्क निकाल के बैठ गई| आयुष कुछ खुसफुसाने लगा और उसकी इस खुसर-फुसर में हम माँ-बेटी दोनों की दिलचस्पी जाग गई| "आयुष...बेटा पापा से क्या बात कर रहे हो?" इतने में नेहा उठ के अपने पापा के पास स्टूल पर बैठ गई| उसे इतने नजदीक बैठा देख वो बोला; "दीदी....आप उधर सोफे पर बैठो...मुझे पापा से बात करनी है|"
"मैं नहीं जाती... तू बोल जो बोलना है|" नेहा ने अकड़ते हुए जवाब दिया|
"प्लीज दीदी ...प्लीज......" आयुष ने बड़ी भोली सी शकल बनाते हुए कहा| पर नेहा टस से मस नहीं हुई आखिर मुझे ही बात संभालनी पड़ी वरना दोनों लड़ाई शुरू कर देते|
"आयुष....जो सीक्रेट बात तुम करने वाले हो मुझे पहले से पता है!" मैंने थोड़ा सा नाटक किया| (Bluffing)
"आपको कैसे पता?.... ये तो पापा और मेरा सीक्रेट है!" उसने बड़ी हैरानी से पूछा|
"बेटा....मैं आपकी माँ हूँ| उस दिन जब आप पापा से बात कर रहे थे ना, तब मैंने सब सुन लिया था|" मैंने फिर से Bluff किया|
"ठीक है.... !" शर्म से उसके गाल लाल हो गए थे! "वो...... आज उसने मुझसे बात की!" बस इतना कह के आयुष रुक गया और अपने पापा की तरफ देखने लगा| 'उसने' सुन के मुझे थोड़ा शक हुआ की जर्रूर ये कोई लड़की है! दरअसल आयुष अपने पापा पर ही गया है| इन्होने भी स्कूल में कभी किसी लड़की से बात करने की कोशिश नही की...हाँ अगर कोई लड़की सामने से बात करे तभी ये उसका जवाब देते थे|
"अच्छा...wow! क्या बोला उसने?" मैंने पूछा तो आयुष शर्मा गया|
"वो....उसने....पूछा की .....क्या मैंने होमवर्क किया है?" आयुष ने अटकते-अटकते हुए कहा, ये सुनते ही मेरी हँसी छूट गई| पर नेहा के चेहरे पर कोई भाव नही थे| वो अब भी मुझसे नाराज थी और मेरी हँसी उसे रास नही आई थी इसलिए वो चिढ़ते हुए बोली; "तो? तू स्कूल पढ़ने जाता है या girlfriends बनाने? पढ़ाई में ध्यान लगा!" आयुष का मुँह लटक गया तो मैंने उसे अपने साथ चलने को बोला और उसे ले के मैं कैंटीन आ गई|
"बेटा ये लो आपका फेवरट मिल्क शेक.... happy!" उसने कोई जवाब नहीं दिया तो मैंने ही से बात शुरू की; "बेटा....आपकी दीदी पापा को लेके थोड़ा परेशान है| देखो मुझसे भी वो बात नही करती.... जब पापा ठीक हो जायेंगे तब सब ठीक हो जायेगा| तबतक कोशिश करो की आपकी दीदी को गुस्सा ना आये पर उसे अकेला मत छोड़ना, वो आपसे बहुत ज्यादा प्यार करती है...मुझसे भी ज्यादा!" वो प्यार से मुस्कुराया और स्लुर्प...स्लुर्प... कर अपना मिल्क शेक पीने लगा| आज रात को मैं और बच्चे यहीं सोने वाले थे तो खाना खाने के बाद हम सब लेट गए| मैं सोफे पर और बच्चे नीचे| रात के बारह बजे होंगे की मुझे किसी के बोलने की आवाज आई, ये कोई और नहीं नेहा की आवाज थी| वो अपने पापा से कुछ बात कर रही थी|
"पापा ..... मुझे आपको सॉरी बोलना था!" इतना कह के वो चुप हो गई.....लगा जैसे आगे बोलने के लिए हिम्मत बटोर रही हो| कुछ देर बाद फिर से बोली; "i'm sorry पापा! मैंने आपको गलत समझा..... इतने साल मम्मी के साथ रही ना इसलिए उनका रंग मुझ पर भी चढ़ गया..... जब आप हमें गाँव में छोड़के शहर आ गए थे ये तब की बात है| आप कभी-कभी फोन किया करते थे ....पर मुझसे आपकी कभी बात नहीं हुई! मुझे बहुत बुरा लगता था.... जबकि मैं जानती थी की आप मुझे सबसे ज्यादा प्यार करते हो फिर भी आप हमेशा मम्मी से ही बात करते थे| रात को मम्मी मुझे बताती थी की तेरे पापा का फोन आया था और तेरे बारे में पूछ रहे थे| तब मैं उनसे पूछा करती की पापा मुझसे बात क्यों नहीं करते तो मम्मी कहती की बेटा तू घर पर नहीं थी इसलिए तुझसे बात नही हो पाई| ये सुन के मुझे यही लगता की मम्मी आपका बचाव कर रही हैं और मैं चुप हो जाती| पर फिर कुछ दिन बाद आपका फोन आना भी बंद हो गया! मम्मी उदास रहने लगी थी .... अब चूँकि आपने मुझे मम्मी को खुश रखने की जिम्मेदारी दी थी तो मैं मम्मी को हँसाने की कोशिश किया करती| एक दिन रात को मैंने मम्मी से पुछ्ह् की अब पापा का फोन क्यों नहीं आता? तो माँ ने कहा की बेटा पापा पढ़ाई कर रहे हैं...उन्हें बहुत बड़ा आदमी बनना है ....इसलिए अभी उनसे बात नहीं हो रही| इस बार फिर मैंने उनकी बातों पर भरोसा कर लिया| पर मन में कहीं न कहीं ये लगता था की आप को हमारी परवाह नहीं है! आयुष के आने के बाद मुझे लगा था की आप जर्रूर आओगे ....पर आप नहीं आये! मैं बहुत रोई.... पर मम्मी ने मुझे चुप करा दिया, ये कह के की बेटा पापा बिजी हैं ...जल्दी ही आएंगे|
आयुष दो महीने का हो गया था....गर्मी की छुट्टियाँ मजदीक आ गई थीं, तो मैंने मम्मी से फिर पूछा की मम्मी इस बार गर्मियों की छुटियों में पापा आएंगे ना? तो माँ ने झुंझलाते हुए जवाब दिया, जब देखो पापा..पापा...पापा... करती रहती है! उन्हें पढ़ने दे .... उन्हें जिंदगी में कुछ बनना है..... कुछ हासिल करना है... यहाँ के लोगों की तरह खेतों में हल नहीं चलाना! ये सुन के मैं चुप हो गई..... आपके दुबारा आने की जो उम्मीद थी उसे भी बुझा दिया! मेरे मन ने मुझसे मम्मी की बातों का ये अर्थ निकालने पर मजबूर किया की आप हमें भूल चुके हो ..... आप पढ़ाई में इस कदर मशगूल हो गए की आपने हमें भुला दिया है| आपके मन में मम्मी के लिए जो प्यार था वो खत्म हो गया तभी तो आपने फोन करना बंद कर दिया और यही कारन है की मम्मी इतना दुखी और परेशान है और इसीलिए वो मुझ पर बरस पड़ीं| मैंने आगे बढ़ के माँ को अपने हाथों से जकड लिया और हम दोनों रोने लगीं| मैंने उस दिन ठान लिया की मैं माँ को कभी आपकी याद नहीं आने दूँगी और उस दिन से मैंने उनका ख़याल रखना शुरू कर दिया|
मैंने माँ को कभी भनक तक नहीं लगने दी की मैं आपको कितना miss करती हूँ! पूरे घर में सिर्फ एक आप ही तो थे जो मुझसे प्यार करते थे| बाकी तो कभी किसी को मेरी फ़िक्र थी ही नहीं| साल दर साल बीतते गए और फिरर वो दिन आया जब मैं आपसे मिली और आपने मुझे वो ड्रेस गिफ्ट की| उस गिफ्ट पैक में सबसे ऊपर मेरे फेवरट चिप्स का पैकेट था| तब मुझे एहसास हुआ की आप मुझे जरा भी नहीं भूले... आपको मेरी पसंद आज भी याद थी| मेरे मन में इच्छा जाएगी की आखिर ऐसी क्या वजह थी की आप को मुझसे इतने सालों तक दूर रहना पड़ा और तब मजबूरन मैंने छुप के आप दोनों की बात सुनी| सब सुनने के बाद पापा मैंने खुद को बहुत कोसा ...इतने साल मैं आपको कितना गलत समझती रही! मम्मी के साथ रह-रह के मैं भी उन्हीं की तरह हो गई थी...उन्ही की तरह सोचने लगी थी| मैं उस दिन से आपसे माफ़ी माँगना चाहती थी पर कभी हिम्मत नहीं हुई| फिर आप को और मम्मी को इस तरह खुश देख के मैं ये बात कहना ही भूल गई ...पर अब मम्मी ने सारी हद्द पार कर दी| उनकी वजह से आपकी तबियत ख़राब हुई....और अगर इस बार मैंने आपको खो दिया तो i swear पापा मैं उन्हें कभी माफ़ नहीं करुँगी और कभी उनसे बात नहीं करुँगी| प्लीज पापा आप जल्दी से ठीक हो जाओ.....प्लीज ....प्लीज!!!" ये कहते-कहते नेहा रो पड़ी!
ये सब सुनने के बाद मैं रो पड़ी.... मेरी वजह से मेरी बेटी इतने साल अपने पापा के प्यार से महरूम रही! ये बात मुझे अंदर ही अंदर खाने लगी और ये दर लगने लगा की अगर मैंने इनको (अपने पति) को खो दिया तो ये परिवार जिसे आपने इतने प्यार से बाँधा है वो बिखर जाएगा| मुझसे नेहा के आँसूं बर्दाश्त नहीं हुए तो मैं उठ के उसके पास गई और उसके कंधे पे हाथ रख के उसे उठाया और बिस्तर पर ला कर लिटा दिया| ना तो मैं उस समय कुछ कहने की हालत में थी और ना ही नेहा! मैंने उसका सर थप-थापा के सुलाने की कोशिश की तो उसने मेरा हाथ झटक दिया और आयुष की तरफ मुँह कर के लेट गई| मैं अपना मन मसोस कर लेट गई....पर एक पल के लिए भी सो न सकी, सारी रात नेहा की कही बातें दिमाग में गूँजती रही| सुबह हुई तो अपने सामने "बड़की अम्मा और अजय " को देख मैं हैरान रह गई! मैंने तुरंत उनके पाँव छुए और उन्होंने बड़े प्यार से मुझे अपने गले लगा लिया और इनका हाल चाल पूछा| इतने में आयुष बाथरूम से निकला तो बाथरूम से भागा-भागा अपनी दादी जी के गले लग गया| नेहा भी उस समय कमरे में थी पर न जाने क्यों झिझक रही थी| वो बहुत छोटे-छोटे क़दमों से आगे बढ़ी और अपनी दादी के पाँव छुए पर उस समय अम्मा का ध्यान आयुष पर था तो उन्होंने उसे देखा नहीं| नेहा अपना सर झुकाये वापस सोफे पर बैठ गई| मैंने तुरंत माँ (सासु माँ) को फोन कर दिया|
अमा जा के इनके पास बैठ गईं और सर पर हाथ फेरने लगीं| आँखों में आंसूं लिए मेरी तरफ देख के बोलीं; "बेटी ...तूने भी मुझे मानु की इस हालत के बारे में नहीं बताया?" मेरा सर झुक गया क्योंकि इस हफदडफडी में मुझे याद ही नहीं रहा| मैंने तो अपने माँ-पिताजी तक को नहीं बताया था| शायद उन्हें मेरी हालत समझ आ गई.... तभी अजय ने सवाल पूछा; "भाभी... मानु भैया को हुआ क्या?"
"मैं नहीं जाती... तू बोल जो बोलना है|" नेहा ने अकड़ते हुए जवाब दिया|
"प्लीज दीदी ...प्लीज......" आयुष ने बड़ी भोली सी शकल बनाते हुए कहा| पर नेहा टस से मस नहीं हुई आखिर मुझे ही बात संभालनी पड़ी वरना दोनों लड़ाई शुरू कर देते|
"आयुष....जो सीक्रेट बात तुम करने वाले हो मुझे पहले से पता है!" मैंने थोड़ा सा नाटक किया| (Bluffing)
"आपको कैसे पता?.... ये तो पापा और मेरा सीक्रेट है!" उसने बड़ी हैरानी से पूछा|
"बेटा....मैं आपकी माँ हूँ| उस दिन जब आप पापा से बात कर रहे थे ना, तब मैंने सब सुन लिया था|" मैंने फिर से Bluff किया|
"ठीक है.... !" शर्म से उसके गाल लाल हो गए थे! "वो...... आज उसने मुझसे बात की!" बस इतना कह के आयुष रुक गया और अपने पापा की तरफ देखने लगा| 'उसने' सुन के मुझे थोड़ा शक हुआ की जर्रूर ये कोई लड़की है! दरअसल आयुष अपने पापा पर ही गया है| इन्होने भी स्कूल में कभी किसी लड़की से बात करने की कोशिश नही की...हाँ अगर कोई लड़की सामने से बात करे तभी ये उसका जवाब देते थे|
"अच्छा...wow! क्या बोला उसने?" मैंने पूछा तो आयुष शर्मा गया|
"वो....उसने....पूछा की .....क्या मैंने होमवर्क किया है?" आयुष ने अटकते-अटकते हुए कहा, ये सुनते ही मेरी हँसी छूट गई| पर नेहा के चेहरे पर कोई भाव नही थे| वो अब भी मुझसे नाराज थी और मेरी हँसी उसे रास नही आई थी इसलिए वो चिढ़ते हुए बोली; "तो? तू स्कूल पढ़ने जाता है या girlfriends बनाने? पढ़ाई में ध्यान लगा!" आयुष का मुँह लटक गया तो मैंने उसे अपने साथ चलने को बोला और उसे ले के मैं कैंटीन आ गई|
"बेटा ये लो आपका फेवरट मिल्क शेक.... happy!" उसने कोई जवाब नहीं दिया तो मैंने ही से बात शुरू की; "बेटा....आपकी दीदी पापा को लेके थोड़ा परेशान है| देखो मुझसे भी वो बात नही करती.... जब पापा ठीक हो जायेंगे तब सब ठीक हो जायेगा| तबतक कोशिश करो की आपकी दीदी को गुस्सा ना आये पर उसे अकेला मत छोड़ना, वो आपसे बहुत ज्यादा प्यार करती है...मुझसे भी ज्यादा!" वो प्यार से मुस्कुराया और स्लुर्प...स्लुर्प... कर अपना मिल्क शेक पीने लगा| आज रात को मैं और बच्चे यहीं सोने वाले थे तो खाना खाने के बाद हम सब लेट गए| मैं सोफे पर और बच्चे नीचे| रात के बारह बजे होंगे की मुझे किसी के बोलने की आवाज आई, ये कोई और नहीं नेहा की आवाज थी| वो अपने पापा से कुछ बात कर रही थी|
अब आगे......
"पापा ..... मुझे आपको सॉरी बोलना था!" इतना कह के वो चुप हो गई.....लगा जैसे आगे बोलने के लिए हिम्मत बटोर रही हो| कुछ देर बाद फिर से बोली; "i'm sorry पापा! मैंने आपको गलत समझा..... इतने साल मम्मी के साथ रही ना इसलिए उनका रंग मुझ पर भी चढ़ गया..... जब आप हमें गाँव में छोड़के शहर आ गए थे ये तब की बात है| आप कभी-कभी फोन किया करते थे ....पर मुझसे आपकी कभी बात नहीं हुई! मुझे बहुत बुरा लगता था.... जबकि मैं जानती थी की आप मुझे सबसे ज्यादा प्यार करते हो फिर भी आप हमेशा मम्मी से ही बात करते थे| रात को मम्मी मुझे बताती थी की तेरे पापा का फोन आया था और तेरे बारे में पूछ रहे थे| तब मैं उनसे पूछा करती की पापा मुझसे बात क्यों नहीं करते तो मम्मी कहती की बेटा तू घर पर नहीं थी इसलिए तुझसे बात नही हो पाई| ये सुन के मुझे यही लगता की मम्मी आपका बचाव कर रही हैं और मैं चुप हो जाती| पर फिर कुछ दिन बाद आपका फोन आना भी बंद हो गया! मम्मी उदास रहने लगी थी .... अब चूँकि आपने मुझे मम्मी को खुश रखने की जिम्मेदारी दी थी तो मैं मम्मी को हँसाने की कोशिश किया करती| एक दिन रात को मैंने मम्मी से पुछ्ह् की अब पापा का फोन क्यों नहीं आता? तो माँ ने कहा की बेटा पापा पढ़ाई कर रहे हैं...उन्हें बहुत बड़ा आदमी बनना है ....इसलिए अभी उनसे बात नहीं हो रही| इस बार फिर मैंने उनकी बातों पर भरोसा कर लिया| पर मन में कहीं न कहीं ये लगता था की आप को हमारी परवाह नहीं है! आयुष के आने के बाद मुझे लगा था की आप जर्रूर आओगे ....पर आप नहीं आये! मैं बहुत रोई.... पर मम्मी ने मुझे चुप करा दिया, ये कह के की बेटा पापा बिजी हैं ...जल्दी ही आएंगे|
आयुष दो महीने का हो गया था....गर्मी की छुट्टियाँ मजदीक आ गई थीं, तो मैंने मम्मी से फिर पूछा की मम्मी इस बार गर्मियों की छुटियों में पापा आएंगे ना? तो माँ ने झुंझलाते हुए जवाब दिया, जब देखो पापा..पापा...पापा... करती रहती है! उन्हें पढ़ने दे .... उन्हें जिंदगी में कुछ बनना है..... कुछ हासिल करना है... यहाँ के लोगों की तरह खेतों में हल नहीं चलाना! ये सुन के मैं चुप हो गई..... आपके दुबारा आने की जो उम्मीद थी उसे भी बुझा दिया! मेरे मन ने मुझसे मम्मी की बातों का ये अर्थ निकालने पर मजबूर किया की आप हमें भूल चुके हो ..... आप पढ़ाई में इस कदर मशगूल हो गए की आपने हमें भुला दिया है| आपके मन में मम्मी के लिए जो प्यार था वो खत्म हो गया तभी तो आपने फोन करना बंद कर दिया और यही कारन है की मम्मी इतना दुखी और परेशान है और इसीलिए वो मुझ पर बरस पड़ीं| मैंने आगे बढ़ के माँ को अपने हाथों से जकड लिया और हम दोनों रोने लगीं| मैंने उस दिन ठान लिया की मैं माँ को कभी आपकी याद नहीं आने दूँगी और उस दिन से मैंने उनका ख़याल रखना शुरू कर दिया|
मैंने माँ को कभी भनक तक नहीं लगने दी की मैं आपको कितना miss करती हूँ! पूरे घर में सिर्फ एक आप ही तो थे जो मुझसे प्यार करते थे| बाकी तो कभी किसी को मेरी फ़िक्र थी ही नहीं| साल दर साल बीतते गए और फिरर वो दिन आया जब मैं आपसे मिली और आपने मुझे वो ड्रेस गिफ्ट की| उस गिफ्ट पैक में सबसे ऊपर मेरे फेवरट चिप्स का पैकेट था| तब मुझे एहसास हुआ की आप मुझे जरा भी नहीं भूले... आपको मेरी पसंद आज भी याद थी| मेरे मन में इच्छा जाएगी की आखिर ऐसी क्या वजह थी की आप को मुझसे इतने सालों तक दूर रहना पड़ा और तब मजबूरन मैंने छुप के आप दोनों की बात सुनी| सब सुनने के बाद पापा मैंने खुद को बहुत कोसा ...इतने साल मैं आपको कितना गलत समझती रही! मम्मी के साथ रह-रह के मैं भी उन्हीं की तरह हो गई थी...उन्ही की तरह सोचने लगी थी| मैं उस दिन से आपसे माफ़ी माँगना चाहती थी पर कभी हिम्मत नहीं हुई| फिर आप को और मम्मी को इस तरह खुश देख के मैं ये बात कहना ही भूल गई ...पर अब मम्मी ने सारी हद्द पार कर दी| उनकी वजह से आपकी तबियत ख़राब हुई....और अगर इस बार मैंने आपको खो दिया तो i swear पापा मैं उन्हें कभी माफ़ नहीं करुँगी और कभी उनसे बात नहीं करुँगी| प्लीज पापा आप जल्दी से ठीक हो जाओ.....प्लीज ....प्लीज!!!" ये कहते-कहते नेहा रो पड़ी!
ये सब सुनने के बाद मैं रो पड़ी.... मेरी वजह से मेरी बेटी इतने साल अपने पापा के प्यार से महरूम रही! ये बात मुझे अंदर ही अंदर खाने लगी और ये दर लगने लगा की अगर मैंने इनको (अपने पति) को खो दिया तो ये परिवार जिसे आपने इतने प्यार से बाँधा है वो बिखर जाएगा| मुझसे नेहा के आँसूं बर्दाश्त नहीं हुए तो मैं उठ के उसके पास गई और उसके कंधे पे हाथ रख के उसे उठाया और बिस्तर पर ला कर लिटा दिया| ना तो मैं उस समय कुछ कहने की हालत में थी और ना ही नेहा! मैंने उसका सर थप-थापा के सुलाने की कोशिश की तो उसने मेरा हाथ झटक दिया और आयुष की तरफ मुँह कर के लेट गई| मैं अपना मन मसोस कर लेट गई....पर एक पल के लिए भी सो न सकी, सारी रात नेहा की कही बातें दिमाग में गूँजती रही| सुबह हुई तो अपने सामने "बड़की अम्मा और अजय " को देख मैं हैरान रह गई! मैंने तुरंत उनके पाँव छुए और उन्होंने बड़े प्यार से मुझे अपने गले लगा लिया और इनका हाल चाल पूछा| इतने में आयुष बाथरूम से निकला तो बाथरूम से भागा-भागा अपनी दादी जी के गले लग गया| नेहा भी उस समय कमरे में थी पर न जाने क्यों झिझक रही थी| वो बहुत छोटे-छोटे क़दमों से आगे बढ़ी और अपनी दादी के पाँव छुए पर उस समय अम्मा का ध्यान आयुष पर था तो उन्होंने उसे देखा नहीं| नेहा अपना सर झुकाये वापस सोफे पर बैठ गई| मैंने तुरंत माँ (सासु माँ) को फोन कर दिया|
अमा जा के इनके पास बैठ गईं और सर पर हाथ फेरने लगीं| आँखों में आंसूं लिए मेरी तरफ देख के बोलीं; "बेटी ...तूने भी मुझे मानु की इस हालत के बारे में नहीं बताया?" मेरा सर झुक गया क्योंकि इस हफदडफडी में मुझे याद ही नहीं रहा| मैंने तो अपने माँ-पिताजी तक को नहीं बताया था| शायद उन्हें मेरी हालत समझ आ गई.... तभी अजय ने सवाल पूछा; "भाभी... मानु भैया को हुआ क्या?"
8 years ago#44
ये सब सुनने के बाद मैं रो पड़ी.... मेरी वजह से मेरी बेटी इतने साल अपने पापा के प्यार से महरूम रही! ये बात मुझे अंदर ही अंदर खाने लगी और ये दर लगने लगा की अगर मैंने इनको (अपने पति) को खो दिया तो ये परिवार जिसे आपने इतने प्यार से बाँधा है वो बिखर जाएगा| मुझसे नेहा के आँसूं बर्दाश्त नहीं हुए तो मैं उठ के उसके पास गई और उसके कंधे पे हाथ रख के उसे उठाया और बिस्तर पर ला कर लिटा दिया| ना तो मैं उस समय कुछ कहने की हालत में थी और ना ही नेहा! मैंने उसका सर थप-थापा के सुलाने की कोशिश की तो उसने मेरा हाथ झटक दिया और आयुष की तरफ मुँह कर के लेट गई| मैं अपना मन मसोस कर लेट गई....पर एक पल के लिए भी सो न सकी, सारी रात नेहा की कही बातें दिमाग में गूँजती रही| सुबह हुई तो अपने सामने "बड़की अम्मा और अजय " को देख मैं हैरान रह गई! मैंने तुरंत उनके पाँव छुए और उन्होंने बड़े प्यार से मुझे अपने गले लगा लिया और इनका हाल चाल पूछा| इतने में आयुष बाथरूम से निकला तो बाथरूम से भागा-भागा अपनी दादी जी के गले लग गया| नेहा भी उस समय कमरे में थी पर न जाने क्यों झिझक रही थी| वो बहुत छोटे-छोटे क़दमों से आगे बढ़ी और अपनी दादी के पाँव छुए पर उस समय अम्मा का ध्यान आयुष पर था तो उन्होंने उसे देखा नहीं| नेहा अपना सर झुकाये वापस सोफे पर बैठ गई| मैंने तुरंत माँ (सासु माँ) को फोन कर दिया|
अम्मा जा के इनके पास बैठ गईं और सर पर हाथ फेरने लगीं| आँखों में आंसूं लिए मेरी तरफ देख के बोलीं; "बेटी ...तूने भी मुझे मानु की इस हालत के बारे में नहीं बताया?" मेरा सर झुक गया क्योंकि इस हफदडफडी में मुझे याद ही नहीं रहा| मैंने तो अपने माँ-पिताजी तक को नहीं बताया था| शायद उन्हें मेरी हालत समझ आ गई.... तभी अजय ने सवाल पूछा; "भाभी... मानु भैया को हुआ क्या?"
मैंने रोते हुए उन्हें सारा सच बता दिया...ये सुन के बड़की अम्मा और अजय दोनों स्तब्ध रह गए| कोई कुछ बोल नहीं रहा था.... बड़की अम्मा इनके (मेरे पति के) सर पर हाथ फेर रही थीं| आधा घंटा बीत गया था....तभी दरवाजा खोल कर सब एक-एक कर अंदर आये| पिताजी (मेरे ससुर जी) ने अम्मा के पाँव हाथ लगाए पर अम्मा अब भी कुछ नहीं बोलीं| फिर माँ (मेरी सासु माँ) ने पाँव हाथ लगाये पर अम्मा फिर भी कुछ नहीं बोलीं| आखिर कर पिताजी (ससुर जी) ने ही उनकी चुप्पी का कारन पूछा| मुझे तो लगा की अम्मा मेरा गुस्सा उन सब पर उतार देंगी पर बात कुछ और ही नकली|
"मेरा बेटा यहाँ इस हालत में है और तुमने (ससुर जी) मुझे कुछ बताया ही नहीं? मुझे ये बात समधी जी से पता चली! इतनी जल्दी तूने पराया कर दिया?" अम्मा ने भीगी आँखों से कहा|
"नहीं भाभी ऐसा मत बोलो! मैंने भाईसाहब के फ़ोन पर कॉल किया था....फिर उन्हें सारी बात बताई पर उन्होंने बिना कुछ कहे फोन काट दिया| फिर मैंने अजय बेटा के फ़ोन पर कॉल किया था पर किसी ने फ़ोन नहीं उठाया| हारकर मैंने समधी जी को फ़ोन किया और आप तक खबर पहुँचाने को कहा|" पिताजी (ससुर जी) ने मिन्नत करते हुए कहा|
ये सब सुन कर अम्मा को तसल्ली हुई पर उन्हें गुस्सा भी बहुत आया की बड़के दादा ने ऐसा किया और उन्हें कुछ भी नहीं बताया| वो दिन सिर्फ और सिर्फ चिंता में बीत गया.... ऊपर से नेहा भी अकेला महसूस कर रही थी| मैंने अनिल से उसे कहीं बाहर ले जाने को कहा पर वो नहीं गई| अगले दिन उसका स्कूल था और उसे देख के मुझे बहुत दुःख हो रहा था| मैंने इशारे से नेहा को अपने पास बुलाया, चूँकि कमरे में सारे लोग मौजूद थे तो मैंने उसे अपने साथ चलने को कहा| माँ (सासु माँ) को जाते हुए ये कहा की मैं और नेहा थोड़ा walk लेके आ रहे हैं| "बेटा मैं.... आपसे कुछ कहूँ?" नेहा ने कुछ भी नहीं कहा पर मुझे तो उससे अपनी बात कहनी ही थी|
"बेटा.... अम्मा ने आपको देखा नहीं...वो आयुष से बात कर रही थीं ना|" पर नेहा कुछ बुदबुदाने लगी और जब मैंने उससे पूछा की आप क्या बोल रहे हो तो वो बोली; "अगर देखा भी होता तो वो मुझे उतना लाड़ तो नहीं करती जितना वो आयुष को करती हैं! उझे आयुष से जलन नहीं होती....बुरा लगता है जब कोई उसे प्यार करे और मुझे ignore करे! एक बस पापा ......." इतना कहते हुए वो रूक गई| मेरा गाला भर आया और मैंने किसी तरह खुद को संभालते हुए कहा; "बेटा....आपके पापा को कुछ नहीं होगा! भगवान कभी हमारे साथ ऐसा नहीं करेंगे... कम से कम आपके साथ तो कतई नहीं करेंगे| अच्छा आप चिप्स खाओगे?" उसने फिर कोई जवाब नहीं दिया और एक कोने में कड़ी हो के डूबते हुए सूरज को देखने लगी| मैं भी उसे अकेला नहीं छोड़ना चाहती थी तो उसके साथ कड़ी हो गई और उसे कंपनी देने लगी|
"बेटा आपको याद है वो दिन जब हम तीनों पहली बार मूवी देखने गए थे?" नेहा ने हाँ में सर हिलाते हुए कहा| "उस दिन हमने कितना enjoy किया था ना..... पहले मूवी .... फिर lunch .... उस दिन आपने पहली बार 'पापा' बोला था| आपके पापा ने आपको कभी बताया नहीं पर उन्हें सबसे ज्यादा ख़ुशी उस दिन मिली थी.... वो उस दिन बहुत-बहुत खुश थे! इतना खुश की उस दिन उन्होंने मुझे और मैंने उन्हें अपना जीवन साथी माना था!" ये सब सुनके नेहा के चेहरे पर भीनी सी मुस्कान फ़ैल गई थी!
"और आपको आपका स्कूल का पहला दिन याद है? कितना रोये थे आप..... और कैसे पापा ने आपको समझा-बुझा क स्कूल छोड़ा था|" नेहा मुस्कुराने लगी थी|
"बेटा सच.... पापा आपको मुझसे भी ज्यादा प्यार करते हैं!" ये सुन के उसे खुद पर गर्व महसूस होने लगा और मुझे लगा की उसका मन अभी कुछ हल्का हुआ है| इतने में अंदर से पिताजी (ससुर जी) ने हमें अंदर बुलाया| अगले दिन बच्चों का स्कूल था तो पिताजी और सबब के सब घर जा रहे थे| चूँकि मैं पिताजी से वचन ले चुकी थी की जब तक इन्हें (मेरे पति) को होश नहीं आता मैं यहाँ से नहीं जाऊँगी इसलिए उन्होंने मुझे साथ चलने को नहीं कहा| जबकि बड़की अम्मा और मेरी माँ ने मुझे साथ चलने को कहा परन्तु माँ (सासु माँ) ने सब को समझा दिया| अगले दो दिन मैं बस दुआ करती यही... इन्तेजार करती रही की इन्हें जल्द ही होश आ जायेगा| तीसरे दिन मैं इनके (अपने पति के) पास स्टूल पर बैठी इनके हाथ को अपने हाथ में लिए उन सुनहरे पलों को याद कर रही थी की तभी अनिल आ गया|
"दी.... खाना|" बस इतना बोल कर उसने खाना टेबल पे रख दिया और जाके सोफे पर बैठ गया ओस अपने मोबाइल पर कुछ देखने लगा| मैंने ही कौतुहलवश उससे पूछ लिया; "क्यों रे.....'दीदी' शब्द में से अब सिर्फ 'दी...' ही बोलेगा तू?" पर उसने कोई जवाब नहीं दिया| वो मुझसे नजरें तक नहीं मिला रहा था.... उसका ये रवैया तब से है जब से मैंने माँ-पिताजी को अपने द्वारा किये पाप के बारे में बताया था| घर में मेरे सास-ससुर के आलावा कोई नहीं था जो मुझसे ठीक से बात कर रहा हो| मेरे माँ-पिताजी ने तो मुझसे जैसे कन्नी ही काट ली थी! नजाने मुझे क्या सूझी मैंने बेशर्म बनते हुए बात आगे शुरू करने के लिए उससे सवाल पूछा; "अच्छा ये बता तेरा हाथ का दर्द कैसा है?" मेरा सवाल सुन कर वो मेरी तरफ अचरज भरी आँखों से देखने लगा और मुझे ताना मारते हुए बोला; "मेरा हाथ के दर्द के बारे में पूछने में आप कुछ लेट नहीं हो गए?" "हम्म्म्म..... जानती हूँ बहत लेट हो गई......" मेरी ये बात सुन कर वो जिंदगी में पहली बार मुझ पर गरज पड़ा!
"आपको किसी की भी जरा सी परवाह नहीं है! ना अपने भाई की...ना माँ-पिताजी की और ना ही जीजू की!" ये सुन कर मेरा सर शर्म से झुक गया पर अब्भी उसकी भड़ास पूरी तरह से नहीं निकली थी|
"ये देखो ....." ये कह कर उसने अपनी शर्ट कमर पर से उठाई और मुझे उसकी कमर पर सर्जरी का निशान दिखाई दिया! "ये....ये क्या?" ये देख के मैं हक्की-बक्की रह गई और मेरे मुंह से शब्द नहीं निकल रहे थे!
"मेरा हर्निया का ऑपरेशन हुआ था.... और मुझे बताने की जर्रूरत तो नहीं की ये जीजू ने ही करवाया था... और इसे अभी ज्यादा दिन भी नहीं हुए..... जब जीजू मुंबई आये थे ये तब की बात है| पता नहीं उन्हें उस दिन क्या सुझा की वापस जाते हुए मुझे मिलने आ गए| मैं और माँ हॉस्पिटल में था तो उन्होंने सुमन से पूछा और वो उन्हें मेरे पास ले आई| मुझे इस तरह देख उन्होंने तुरंत डॉक्टर सरेंडर को फोन मिलाया और XXXX हॉस्पिटल में ले गए और अगले दिन ऑपरेशन के लिए पैसे भी जमा करा दिए| मैंने जो पैसे अपने ऑपरेशन के लिए सुमन से उधार लिए थे वो भी उन्होंने चुकता किये! वो तो ऑपरेशन तक रुकना चाहते थे पर माँ ने उन्हें जबरदस्ती वापस भेज दिया क्योंकि यहाँ आपको उनकी ज्यादा जर्रूरत थी!" मैं ये सब आँखें फ़ाड़े सुन रही थी.......|
"इस बारे में किसी को कुछ नहीं पता .... यहाँ तक की पिताजी को भी इस बारे में कुछ नहीं पता...मैंने माँ को मना किया था| एक तो पहले ही मेरी पढ़ाई के बोझ तले वो इतना दबे हुए हैं की उन्हें heart problem है और अब मेरा हर्निया के बारे में सुन कर वो परेशान हो जाते| माँ और मैं तो आपको और जीजू को भी नहीं बताने वाले थे ....पर नाजाने कैसे उन्हें सब पता चल जाता था| कुछ दिन पहले मैं और सुमन ड्रिंक कर रहे थे.... नशे की हालत में उसके मुँह से निकल गया, 'यार तेरे जीजू इतने बुरे भी नहीं दीखते.... फिर उन्होंने अपने से दस साल बड़ी औरत से जिसके दो बच्चे हैं और एक अभी पेट में है उससे शादी क्यों की?' ये सुन के मेरे तन-बदन में इस कदर आग लग गई की मैंने उसे एक तमाचा जड़ दिया और रात के दो बजे उसके घर से अपना सामान ले कर निकल पड़ा| रात अपने दोस्त के घर बिताई और अगले दिन सुबह जीजू को फ़ोन किया| उन्होंने फ़ौरन २०,०००/- रूपए मेरे अकाउंट में ट्रांसफर किये और बोला की दूसरी जगह rent पर कमरा ले और मुझे आज ही तेरे Lease Agreement की copy mail कर!
बोलो पता था आपको इस बारे में? ओह्ह! पता कैसे होगा? आपने तो आमरण मौन व्रत जो धारण कर रखा था!"
मेरे पास उसकी कही किसी बात का जवाब नहीं था| मैं बस पछता रही थी ...इसके अलावा कर भी क्या सकती थी| फिर वो दुबारा मुझे याद करते हुए बोला; "खाना ठंडा हो रहा है! खा लो!" और उठ कर चला गया| मैं बस वहीँ बैठी इन्हें मन ही मन "sorry" बोलती रही! शाम को जब अनिल और सब लोग दुबारा आये तो मुझे कुछ याद आया|
अम्मा जा के इनके पास बैठ गईं और सर पर हाथ फेरने लगीं| आँखों में आंसूं लिए मेरी तरफ देख के बोलीं; "बेटी ...तूने भी मुझे मानु की इस हालत के बारे में नहीं बताया?" मेरा सर झुक गया क्योंकि इस हफदडफडी में मुझे याद ही नहीं रहा| मैंने तो अपने माँ-पिताजी तक को नहीं बताया था| शायद उन्हें मेरी हालत समझ आ गई.... तभी अजय ने सवाल पूछा; "भाभी... मानु भैया को हुआ क्या?"
अब आगे.......
मैंने रोते हुए उन्हें सारा सच बता दिया...ये सुन के बड़की अम्मा और अजय दोनों स्तब्ध रह गए| कोई कुछ बोल नहीं रहा था.... बड़की अम्मा इनके (मेरे पति के) सर पर हाथ फेर रही थीं| आधा घंटा बीत गया था....तभी दरवाजा खोल कर सब एक-एक कर अंदर आये| पिताजी (मेरे ससुर जी) ने अम्मा के पाँव हाथ लगाए पर अम्मा अब भी कुछ नहीं बोलीं| फिर माँ (मेरी सासु माँ) ने पाँव हाथ लगाये पर अम्मा फिर भी कुछ नहीं बोलीं| आखिर कर पिताजी (ससुर जी) ने ही उनकी चुप्पी का कारन पूछा| मुझे तो लगा की अम्मा मेरा गुस्सा उन सब पर उतार देंगी पर बात कुछ और ही नकली|
"मेरा बेटा यहाँ इस हालत में है और तुमने (ससुर जी) मुझे कुछ बताया ही नहीं? मुझे ये बात समधी जी से पता चली! इतनी जल्दी तूने पराया कर दिया?" अम्मा ने भीगी आँखों से कहा|
"नहीं भाभी ऐसा मत बोलो! मैंने भाईसाहब के फ़ोन पर कॉल किया था....फिर उन्हें सारी बात बताई पर उन्होंने बिना कुछ कहे फोन काट दिया| फिर मैंने अजय बेटा के फ़ोन पर कॉल किया था पर किसी ने फ़ोन नहीं उठाया| हारकर मैंने समधी जी को फ़ोन किया और आप तक खबर पहुँचाने को कहा|" पिताजी (ससुर जी) ने मिन्नत करते हुए कहा|
ये सब सुन कर अम्मा को तसल्ली हुई पर उन्हें गुस्सा भी बहुत आया की बड़के दादा ने ऐसा किया और उन्हें कुछ भी नहीं बताया| वो दिन सिर्फ और सिर्फ चिंता में बीत गया.... ऊपर से नेहा भी अकेला महसूस कर रही थी| मैंने अनिल से उसे कहीं बाहर ले जाने को कहा पर वो नहीं गई| अगले दिन उसका स्कूल था और उसे देख के मुझे बहुत दुःख हो रहा था| मैंने इशारे से नेहा को अपने पास बुलाया, चूँकि कमरे में सारे लोग मौजूद थे तो मैंने उसे अपने साथ चलने को कहा| माँ (सासु माँ) को जाते हुए ये कहा की मैं और नेहा थोड़ा walk लेके आ रहे हैं| "बेटा मैं.... आपसे कुछ कहूँ?" नेहा ने कुछ भी नहीं कहा पर मुझे तो उससे अपनी बात कहनी ही थी|
"बेटा.... अम्मा ने आपको देखा नहीं...वो आयुष से बात कर रही थीं ना|" पर नेहा कुछ बुदबुदाने लगी और जब मैंने उससे पूछा की आप क्या बोल रहे हो तो वो बोली; "अगर देखा भी होता तो वो मुझे उतना लाड़ तो नहीं करती जितना वो आयुष को करती हैं! उझे आयुष से जलन नहीं होती....बुरा लगता है जब कोई उसे प्यार करे और मुझे ignore करे! एक बस पापा ......." इतना कहते हुए वो रूक गई| मेरा गाला भर आया और मैंने किसी तरह खुद को संभालते हुए कहा; "बेटा....आपके पापा को कुछ नहीं होगा! भगवान कभी हमारे साथ ऐसा नहीं करेंगे... कम से कम आपके साथ तो कतई नहीं करेंगे| अच्छा आप चिप्स खाओगे?" उसने फिर कोई जवाब नहीं दिया और एक कोने में कड़ी हो के डूबते हुए सूरज को देखने लगी| मैं भी उसे अकेला नहीं छोड़ना चाहती थी तो उसके साथ कड़ी हो गई और उसे कंपनी देने लगी|
"बेटा आपको याद है वो दिन जब हम तीनों पहली बार मूवी देखने गए थे?" नेहा ने हाँ में सर हिलाते हुए कहा| "उस दिन हमने कितना enjoy किया था ना..... पहले मूवी .... फिर lunch .... उस दिन आपने पहली बार 'पापा' बोला था| आपके पापा ने आपको कभी बताया नहीं पर उन्हें सबसे ज्यादा ख़ुशी उस दिन मिली थी.... वो उस दिन बहुत-बहुत खुश थे! इतना खुश की उस दिन उन्होंने मुझे और मैंने उन्हें अपना जीवन साथी माना था!" ये सब सुनके नेहा के चेहरे पर भीनी सी मुस्कान फ़ैल गई थी!
"और आपको आपका स्कूल का पहला दिन याद है? कितना रोये थे आप..... और कैसे पापा ने आपको समझा-बुझा क स्कूल छोड़ा था|" नेहा मुस्कुराने लगी थी|
"बेटा सच.... पापा आपको मुझसे भी ज्यादा प्यार करते हैं!" ये सुन के उसे खुद पर गर्व महसूस होने लगा और मुझे लगा की उसका मन अभी कुछ हल्का हुआ है| इतने में अंदर से पिताजी (ससुर जी) ने हमें अंदर बुलाया| अगले दिन बच्चों का स्कूल था तो पिताजी और सबब के सब घर जा रहे थे| चूँकि मैं पिताजी से वचन ले चुकी थी की जब तक इन्हें (मेरे पति) को होश नहीं आता मैं यहाँ से नहीं जाऊँगी इसलिए उन्होंने मुझे साथ चलने को नहीं कहा| जबकि बड़की अम्मा और मेरी माँ ने मुझे साथ चलने को कहा परन्तु माँ (सासु माँ) ने सब को समझा दिया| अगले दो दिन मैं बस दुआ करती यही... इन्तेजार करती रही की इन्हें जल्द ही होश आ जायेगा| तीसरे दिन मैं इनके (अपने पति के) पास स्टूल पर बैठी इनके हाथ को अपने हाथ में लिए उन सुनहरे पलों को याद कर रही थी की तभी अनिल आ गया|
"दी.... खाना|" बस इतना बोल कर उसने खाना टेबल पे रख दिया और जाके सोफे पर बैठ गया ओस अपने मोबाइल पर कुछ देखने लगा| मैंने ही कौतुहलवश उससे पूछ लिया; "क्यों रे.....'दीदी' शब्द में से अब सिर्फ 'दी...' ही बोलेगा तू?" पर उसने कोई जवाब नहीं दिया| वो मुझसे नजरें तक नहीं मिला रहा था.... उसका ये रवैया तब से है जब से मैंने माँ-पिताजी को अपने द्वारा किये पाप के बारे में बताया था| घर में मेरे सास-ससुर के आलावा कोई नहीं था जो मुझसे ठीक से बात कर रहा हो| मेरे माँ-पिताजी ने तो मुझसे जैसे कन्नी ही काट ली थी! नजाने मुझे क्या सूझी मैंने बेशर्म बनते हुए बात आगे शुरू करने के लिए उससे सवाल पूछा; "अच्छा ये बता तेरा हाथ का दर्द कैसा है?" मेरा सवाल सुन कर वो मेरी तरफ अचरज भरी आँखों से देखने लगा और मुझे ताना मारते हुए बोला; "मेरा हाथ के दर्द के बारे में पूछने में आप कुछ लेट नहीं हो गए?" "हम्म्म्म..... जानती हूँ बहत लेट हो गई......" मेरी ये बात सुन कर वो जिंदगी में पहली बार मुझ पर गरज पड़ा!
"आपको किसी की भी जरा सी परवाह नहीं है! ना अपने भाई की...ना माँ-पिताजी की और ना ही जीजू की!" ये सुन कर मेरा सर शर्म से झुक गया पर अब्भी उसकी भड़ास पूरी तरह से नहीं निकली थी|
"ये देखो ....." ये कह कर उसने अपनी शर्ट कमर पर से उठाई और मुझे उसकी कमर पर सर्जरी का निशान दिखाई दिया! "ये....ये क्या?" ये देख के मैं हक्की-बक्की रह गई और मेरे मुंह से शब्द नहीं निकल रहे थे!
"मेरा हर्निया का ऑपरेशन हुआ था.... और मुझे बताने की जर्रूरत तो नहीं की ये जीजू ने ही करवाया था... और इसे अभी ज्यादा दिन भी नहीं हुए..... जब जीजू मुंबई आये थे ये तब की बात है| पता नहीं उन्हें उस दिन क्या सुझा की वापस जाते हुए मुझे मिलने आ गए| मैं और माँ हॉस्पिटल में था तो उन्होंने सुमन से पूछा और वो उन्हें मेरे पास ले आई| मुझे इस तरह देख उन्होंने तुरंत डॉक्टर सरेंडर को फोन मिलाया और XXXX हॉस्पिटल में ले गए और अगले दिन ऑपरेशन के लिए पैसे भी जमा करा दिए| मैंने जो पैसे अपने ऑपरेशन के लिए सुमन से उधार लिए थे वो भी उन्होंने चुकता किये! वो तो ऑपरेशन तक रुकना चाहते थे पर माँ ने उन्हें जबरदस्ती वापस भेज दिया क्योंकि यहाँ आपको उनकी ज्यादा जर्रूरत थी!" मैं ये सब आँखें फ़ाड़े सुन रही थी.......|
"इस बारे में किसी को कुछ नहीं पता .... यहाँ तक की पिताजी को भी इस बारे में कुछ नहीं पता...मैंने माँ को मना किया था| एक तो पहले ही मेरी पढ़ाई के बोझ तले वो इतना दबे हुए हैं की उन्हें heart problem है और अब मेरा हर्निया के बारे में सुन कर वो परेशान हो जाते| माँ और मैं तो आपको और जीजू को भी नहीं बताने वाले थे ....पर नाजाने कैसे उन्हें सब पता चल जाता था| कुछ दिन पहले मैं और सुमन ड्रिंक कर रहे थे.... नशे की हालत में उसके मुँह से निकल गया, 'यार तेरे जीजू इतने बुरे भी नहीं दीखते.... फिर उन्होंने अपने से दस साल बड़ी औरत से जिसके दो बच्चे हैं और एक अभी पेट में है उससे शादी क्यों की?' ये सुन के मेरे तन-बदन में इस कदर आग लग गई की मैंने उसे एक तमाचा जड़ दिया और रात के दो बजे उसके घर से अपना सामान ले कर निकल पड़ा| रात अपने दोस्त के घर बिताई और अगले दिन सुबह जीजू को फ़ोन किया| उन्होंने फ़ौरन २०,०००/- रूपए मेरे अकाउंट में ट्रांसफर किये और बोला की दूसरी जगह rent पर कमरा ले और मुझे आज ही तेरे Lease Agreement की copy mail कर!
बोलो पता था आपको इस बारे में? ओह्ह! पता कैसे होगा? आपने तो आमरण मौन व्रत जो धारण कर रखा था!"
मेरे पास उसकी कही किसी बात का जवाब नहीं था| मैं बस पछता रही थी ...इसके अलावा कर भी क्या सकती थी| फिर वो दुबारा मुझे याद करते हुए बोला; "खाना ठंडा हो रहा है! खा लो!" और उठ कर चला गया| मैं बस वहीँ बैठी इन्हें मन ही मन "sorry" बोलती रही! शाम को जब अनिल और सब लोग दुबारा आये तो मुझे कुछ याद आया|
8 years ago#45
तीसरे दिन मैं इनके (अपने पति के) पास स्टूल पर बैठी इनके हाथ को अपने हाथ में लिए उन सुनहरे पलों को याद कर रही थी की तभी अनिल आ गया|
"दी.... खाना|" बस इतना बोल कर उसने खाना टेबल पे रख दिया और जाके सोफे पर बैठ गया ओस अपने मोबाइल पर कुछ देखने लगा| मैंने ही कौतुहलवश उससे पूछ लिया; "क्यों रे.....'दीदी' शब्द में से अब सिर्फ 'दी...' ही बोलेगा तू?" पर उसने कोई जवाब नहीं दिया| वो मुझसे नजरें तक नहीं मिला रहा था.... उसका ये रवैया तब से है जब से मैंने माँ-पिताजी को अपने द्वारा किये पाप के बारे में बताया था| घर में मेरे सास-ससुर के आलावा कोई नहीं था जो मुझसे ठीक से बात कर रहा हो| मेरे माँ-पिताजी ने तो मुझसे जैसे कन्नी ही काट ली थी! नजाने मुझे क्या सूझी मैंने बेशर्म बनते हुए बात आगे शुरू करने के लिए उससे सवाल पूछा; "अच्छा ये बता तेरा हाथ का दर्द कैसा है?" मेरा सवाल सुन कर वो मेरी तरफ अचरज भरी आँखों से देखने लगा और मुझे ताना मारते हुए बोला; "मेरा हाथ के दर्द के बारे में पूछने में आप कुछ लेट नहीं हो गए?" "हम्म्म्म..... जानती हूँ बहत लेट हो गई......" मेरी ये बात सुन कर वो जिंदगी में पहली बार मुझ पर गरज पड़ा!
"आपको किसी की भी जरा सी परवाह नहीं है! ना अपने भाई की...ना माँ-पिताजी की और ना ही जीजू की!" ये सुन कर मेरा सर शर्म से झुक गया पर अब्भी उसकी भड़ास पूरी तरह से नहीं निकली थी|
"ये देखो ....." ये कह कर उसने अपनी शर्ट कमर पर से उठाई और मुझे उसकी कमर पर सर्जरी का निशान दिखाई दिया! "ये....ये क्या?" ये देख के मैं हक्की-बक्की रह गई और मेरे मुंह से शब्द नहीं निकल रहे थे!
"मेरा हर्निया का ऑपरेशन हुआ था.... और मुझे बताने की जर्रूरत तो नहीं की ये जीजू ने ही करवाया था... और इसे अभी ज्यादा दिन भी नहीं हुए..... जब जीजू मुंबई आये थे ये तब की बात है| पता नहीं उन्हें उस दिन क्या सुझा की वापस जाते हुए मुझे मिलने आ गए| मैं और माँ हॉस्पिटल में था तो उन्होंने सुमन से पूछा और वो उन्हें मेरे पास ले आई| मुझे इस तरह देख उन्होंने तुरंत डॉक्टर सरेंडर को फोन मिलाया और XXXX हॉस्पिटल में ले गए और अगले दिन ऑपरेशन के लिए पैसे भी जमा करा दिए| मैंने जो पैसे अपने ऑपरेशन के लिए सुमन से उधार लिए थे वो भी उन्होंने चुकता किये! वो तो ऑपरेशन तक रुकना चाहते थे पर माँ ने उन्हें जबरदस्ती वापस भेज दिया क्योंकि यहाँ आपको उनकी ज्यादा जर्रूरत थी!" मैं ये सब आँखें फ़ाड़े सुन रही थी.......|
"इस बारे में किसी को कुछ नहीं पता .... यहाँ तक की पिताजी को भी इस बारे में कुछ नहीं पता...मैंने माँ को मना किया था| एक तो पहले ही मेरी पढ़ाई के बोझ तले वो इतना दबे हुए हैं की उन्हें heart problem है और अब मेरा हर्निया के बारे में सुन कर वो परेशान हो जाते| माँ और मैं तो आपको और जीजू को भी नहीं बताने वाले थे ....पर नाजाने कैसे उन्हें सब पता चल जाता था| कुछ दिन पहले मैं और सुमन ड्रिंक कर रहे थे.... नशे की हालत में उसके मुँह से निकल गया, 'यार तेरे जीजू इतने बुरे भी नहीं दीखते.... फिर उन्होंने अपने से दस साल बड़ी औरत से जिसके दो बच्चे हैं और एक अभी पेट में है उससे शादी क्यों की?' ये सुन के मेरे तन-बदन में इस कदर आग लग गई की मैंने उसे एक तमाचा जड़ दिया और रात के दो बजे उसके घर से अपना सामान ले कर निकल पड़ा| रात अपने दोस्त के घर बिताई और अगले दिन सुबह जीजू को फ़ोन किया| उन्होंने फ़ौरन २०,०००/- रूपए मेरे अकाउंट में ट्रांसफर किये और बोला की दूसरी जगह rent पर कमरा ले और मुझे आज ही तेरे Lease Agreement की copy mail कर!
बोलो पता था आपको इस बारे में? ओह्ह! पता कैसे होगा? आपने तो आमरण मौन व्रत जो धारण कर रखा था!"
मेरे पास उसकी कही किसी बात का जवाब नहीं था| मैं बस पछता रही थी ...इसके अलावा कर भी क्या सकती थी| फिर वो दुबारा मुझे याद करते हुए बोला; "खाना ठंडा हो रहा है! खा लो!" और उठ कर चला गया| मैं बस वहीँ बैठी इन्हें मन ही मन "sorry" बोलती रही! शाम को जब अनिल और सब लोग दुबारा आये तो मुझे कुछ याद आया|
दरअसल आज डॉक्टर सरिता बता के गई थीं की वो दो दिन के लिए बाहर जा रही हैं| जब सब लोग आ गए तो मैंने ये बात सब को बताई तो किसी ने कोई ख़ास प्रतिक्रिया नहीं दी| मैं इन्तेजार कर-कर के थक गई थी और इनके (अपने पति के) लिए कुछ करना चाहती थी| इस तरह हाथ पर हाथ रखे बैठ कर कुछ नहीं होने वाला था! मैं बड़े ताव में आ कर उठी और बोली; "माँ (सासु माँ) हम कब तक ऐसे बैठे रहेंगे?"
"पर बेटी हम सिर्फ दुआ ही कर सकते हैं| डॉक्टर साहिबा ने कहा था न की मानु को होश अपने आप आएगा| सिवाय इन्तेजार करने के हम क्या कर सकते हैं?" माँ ने उत्तर दिया|
"मुझसे इन्हें ...इस कदर नहीं देखा जाता| मैं.......मैं|" मेरे आगे कुछ बोलने से पहले ही माँ को मेरी दशा समझ आ गई और वो बलों; "बेटी...मैं समझ सकती हूँ तुझ पर क्या बीत रही है पर बेटा हम डॉक्टर नहीं हैं! तू सब्र रख और भगवान पर भरोसा रख|"
"माँ.... मैं एक बात कहना चाहती हूँ| जैसे Eye Specialist होता है, आँखों के इलाज के लिए और Heart Specialist होता है हृदय के रोगों के लिए तो क्या इन (मेरे पति) के इलाज के लिए कोई specialist डॉक्टर नहीं है? कोई clinic .... कोई हॉस्पिटल.... कोई वैध... कोई हकीम ... कोई तो होगा?" ये कहते-कहते में आँखें भर आईं| माँ दौड़ी-दौड़ी मेरे पास आई और मुझे अपने सीने से लगा कर चुप कराने लगी|
"माँ..... एक second opinion लेनी में क्या हर्ज है?" मैंने बिलखते हुए कहा| माँ ने पिताजी (ससुर जी) की तरफ देखा और मूक भाषा में मिन्नत की| पिताजी ने हाँ में सर हिला कर अपनी अनुमति दी!
"बेटी.... डॉक्टर सरिता को आने दो हम उनसे बात करते हैं|" पिताजी ने मुझे आश्वासन दिया| तभी अनिल एकदम से बोल उठा; "पिताजी क्यों न हम डॉक्टर सुरेंदर से पूछें?" {यदि आप सभी को याद ओ ओ डॉक्टर सुरेंदर वही हैं जिनकी गाड़ी से अनिल का accident हुआ था|} और इससे पहले की कोई कुछ कहता अनिल ने तुरंत ही डॉक्टर सुरेंदर को फ़ोन मिला दिया और उनसे बात करने लगा| बातचीत के बाद अनिल बोला की वो (सुरेंदर जी) इस बारे में पता कर के बताएँगे| करीब दो घंटे बाद उनका फ़ोन आया और उन्होंने बताया की बैंगलोर में एक specialized हॉस्पिटल है| उनका दावा है की उनका success rate 75% तक है| हमारे लिए तो ये ऐसे था जैसे अँधेरे कमरे में उम्मीद कोई किरण निकल आई हो| इससे पहले कोई कुछ कहता मैं उत्साह में आ कर बोल उठी; "पिताजी (ससुर जी) हमें इनको (मेरे पति को) वहाँ ले जाना चाहिए!" पर तभी मेरे पिताजी मुझ पर भड़क उठे; "गोद में उठा के ले जाएँ? मानु की हालत देख रही है ना तू?" ये सुन के मुझे होश आया की इस स्थिति में इन्हें (मेरे पति को) बैंगलोर कैसे ले जा सकते हैं?
पर इसका जवाब अनिल के पास था| वो बोला; "पिताजी... डॉक्टर सुरेंदर ने कहा है की air ambulance के जरिये हम जीजू को बैंगलोर ले जा सकते हैं| पर ये बहुत महंगा है ... तकरीबन 1.5 लाख से 2 लाख तक का खर्च होगा!" ये सुन कर तो मैं भी थोड़ा सोच में पड़ गई ... पर मेरा मन कह रहा था की पिताजी (ससुर जी) ये खर्च करने से नहीं चुकेंगे और ऐसा हुआ भी| उन्होंने बिना देर किये कहा; "अनिल बेटा... तू ऐसा कर बैंगलोर जा कर पहले इस हॉस्पिटल के बारे में पता लगा तब तक मैं इधर पैसा का इंंतजाम करता हूँ| प्राइवेट हॉस्पिटल है तो खर्च तो बहुत होगा और जब तक इन्तेजाम होता है तब तक हो सकता है डॉक्टर सरिता भी आ जाएं तो उनसे भी एक बार पूछ लेंगे|" अनिल तुरंत निकलने के लिए तैयार हो गया| पिताजी ने उसे सुबह जाने के लिए कहा तो जैसे-तैसे वो मान गया| अगले दिन सुबह अनिल और डॉक्टर सुरेंदर जी की बात हो गई| डॉक्टर सुरेंदर ने कहा की वो डायरेक्ट बैंगलोर मिलेंगे और अनिल भी उन्हें सीधा बैंगलोर ही मिलने वाला था| उन्होंने मुझे एक Link मेल किया था… मैंने सोचा की एक बार मैं भी बात कर लूँ! तो मैंने उन्हें फोन मिलाया;
"हेलो सुरेंदर जी बोल रहे हैं!"
"हाँ जी बोल रहा हूँ... आप कौन?"
"जी मैं संगीता.... अनिल की बहन|"
"ओह्ह...जी नमस्ते|"
"सुरेंदर जी अम्म्म.. मुझे आपसे कुछ पूछना था... actually आपने जिस हॉस्पिटल के बारे में बताया वो बैंगलोर में है| क्या यहाँ दिल्ली में कोई हॉस्पिटल नहीं?"
"संगीता जी... दरअसल हमारे doctor's journal में ये article आया था| मेरा एक दोस्त है जो बैंगलोर में रहता है| दिल्ली में मेरा कोई contact नहीं है... still i'll try my best .... meanwhile हम बंगलोरे में एक बार हॉस्पिटल चेक कर लेते हैं|
"जी.... and thank you .... very much!"
"अरे संगीता जी थैंक यू कैसा.... आप अनिल की दीदी हैं तो मेरी भी दीदी जैसी हुई ना| you don't worry."
मेरी सुरेंदर जी से बात हुई तो मन को थोड़ी तसल्ली हुई|
"दी.... खाना|" बस इतना बोल कर उसने खाना टेबल पे रख दिया और जाके सोफे पर बैठ गया ओस अपने मोबाइल पर कुछ देखने लगा| मैंने ही कौतुहलवश उससे पूछ लिया; "क्यों रे.....'दीदी' शब्द में से अब सिर्फ 'दी...' ही बोलेगा तू?" पर उसने कोई जवाब नहीं दिया| वो मुझसे नजरें तक नहीं मिला रहा था.... उसका ये रवैया तब से है जब से मैंने माँ-पिताजी को अपने द्वारा किये पाप के बारे में बताया था| घर में मेरे सास-ससुर के आलावा कोई नहीं था जो मुझसे ठीक से बात कर रहा हो| मेरे माँ-पिताजी ने तो मुझसे जैसे कन्नी ही काट ली थी! नजाने मुझे क्या सूझी मैंने बेशर्म बनते हुए बात आगे शुरू करने के लिए उससे सवाल पूछा; "अच्छा ये बता तेरा हाथ का दर्द कैसा है?" मेरा सवाल सुन कर वो मेरी तरफ अचरज भरी आँखों से देखने लगा और मुझे ताना मारते हुए बोला; "मेरा हाथ के दर्द के बारे में पूछने में आप कुछ लेट नहीं हो गए?" "हम्म्म्म..... जानती हूँ बहत लेट हो गई......" मेरी ये बात सुन कर वो जिंदगी में पहली बार मुझ पर गरज पड़ा!
"आपको किसी की भी जरा सी परवाह नहीं है! ना अपने भाई की...ना माँ-पिताजी की और ना ही जीजू की!" ये सुन कर मेरा सर शर्म से झुक गया पर अब्भी उसकी भड़ास पूरी तरह से नहीं निकली थी|
"ये देखो ....." ये कह कर उसने अपनी शर्ट कमर पर से उठाई और मुझे उसकी कमर पर सर्जरी का निशान दिखाई दिया! "ये....ये क्या?" ये देख के मैं हक्की-बक्की रह गई और मेरे मुंह से शब्द नहीं निकल रहे थे!
"मेरा हर्निया का ऑपरेशन हुआ था.... और मुझे बताने की जर्रूरत तो नहीं की ये जीजू ने ही करवाया था... और इसे अभी ज्यादा दिन भी नहीं हुए..... जब जीजू मुंबई आये थे ये तब की बात है| पता नहीं उन्हें उस दिन क्या सुझा की वापस जाते हुए मुझे मिलने आ गए| मैं और माँ हॉस्पिटल में था तो उन्होंने सुमन से पूछा और वो उन्हें मेरे पास ले आई| मुझे इस तरह देख उन्होंने तुरंत डॉक्टर सरेंडर को फोन मिलाया और XXXX हॉस्पिटल में ले गए और अगले दिन ऑपरेशन के लिए पैसे भी जमा करा दिए| मैंने जो पैसे अपने ऑपरेशन के लिए सुमन से उधार लिए थे वो भी उन्होंने चुकता किये! वो तो ऑपरेशन तक रुकना चाहते थे पर माँ ने उन्हें जबरदस्ती वापस भेज दिया क्योंकि यहाँ आपको उनकी ज्यादा जर्रूरत थी!" मैं ये सब आँखें फ़ाड़े सुन रही थी.......|
"इस बारे में किसी को कुछ नहीं पता .... यहाँ तक की पिताजी को भी इस बारे में कुछ नहीं पता...मैंने माँ को मना किया था| एक तो पहले ही मेरी पढ़ाई के बोझ तले वो इतना दबे हुए हैं की उन्हें heart problem है और अब मेरा हर्निया के बारे में सुन कर वो परेशान हो जाते| माँ और मैं तो आपको और जीजू को भी नहीं बताने वाले थे ....पर नाजाने कैसे उन्हें सब पता चल जाता था| कुछ दिन पहले मैं और सुमन ड्रिंक कर रहे थे.... नशे की हालत में उसके मुँह से निकल गया, 'यार तेरे जीजू इतने बुरे भी नहीं दीखते.... फिर उन्होंने अपने से दस साल बड़ी औरत से जिसके दो बच्चे हैं और एक अभी पेट में है उससे शादी क्यों की?' ये सुन के मेरे तन-बदन में इस कदर आग लग गई की मैंने उसे एक तमाचा जड़ दिया और रात के दो बजे उसके घर से अपना सामान ले कर निकल पड़ा| रात अपने दोस्त के घर बिताई और अगले दिन सुबह जीजू को फ़ोन किया| उन्होंने फ़ौरन २०,०००/- रूपए मेरे अकाउंट में ट्रांसफर किये और बोला की दूसरी जगह rent पर कमरा ले और मुझे आज ही तेरे Lease Agreement की copy mail कर!
बोलो पता था आपको इस बारे में? ओह्ह! पता कैसे होगा? आपने तो आमरण मौन व्रत जो धारण कर रखा था!"
मेरे पास उसकी कही किसी बात का जवाब नहीं था| मैं बस पछता रही थी ...इसके अलावा कर भी क्या सकती थी| फिर वो दुबारा मुझे याद करते हुए बोला; "खाना ठंडा हो रहा है! खा लो!" और उठ कर चला गया| मैं बस वहीँ बैठी इन्हें मन ही मन "sorry" बोलती रही! शाम को जब अनिल और सब लोग दुबारा आये तो मुझे कुछ याद आया|
अब आगे.........
दरअसल आज डॉक्टर सरिता बता के गई थीं की वो दो दिन के लिए बाहर जा रही हैं| जब सब लोग आ गए तो मैंने ये बात सब को बताई तो किसी ने कोई ख़ास प्रतिक्रिया नहीं दी| मैं इन्तेजार कर-कर के थक गई थी और इनके (अपने पति के) लिए कुछ करना चाहती थी| इस तरह हाथ पर हाथ रखे बैठ कर कुछ नहीं होने वाला था! मैं बड़े ताव में आ कर उठी और बोली; "माँ (सासु माँ) हम कब तक ऐसे बैठे रहेंगे?"
"पर बेटी हम सिर्फ दुआ ही कर सकते हैं| डॉक्टर साहिबा ने कहा था न की मानु को होश अपने आप आएगा| सिवाय इन्तेजार करने के हम क्या कर सकते हैं?" माँ ने उत्तर दिया|
"मुझसे इन्हें ...इस कदर नहीं देखा जाता| मैं.......मैं|" मेरे आगे कुछ बोलने से पहले ही माँ को मेरी दशा समझ आ गई और वो बलों; "बेटी...मैं समझ सकती हूँ तुझ पर क्या बीत रही है पर बेटा हम डॉक्टर नहीं हैं! तू सब्र रख और भगवान पर भरोसा रख|"
"माँ.... मैं एक बात कहना चाहती हूँ| जैसे Eye Specialist होता है, आँखों के इलाज के लिए और Heart Specialist होता है हृदय के रोगों के लिए तो क्या इन (मेरे पति) के इलाज के लिए कोई specialist डॉक्टर नहीं है? कोई clinic .... कोई हॉस्पिटल.... कोई वैध... कोई हकीम ... कोई तो होगा?" ये कहते-कहते में आँखें भर आईं| माँ दौड़ी-दौड़ी मेरे पास आई और मुझे अपने सीने से लगा कर चुप कराने लगी|
"माँ..... एक second opinion लेनी में क्या हर्ज है?" मैंने बिलखते हुए कहा| माँ ने पिताजी (ससुर जी) की तरफ देखा और मूक भाषा में मिन्नत की| पिताजी ने हाँ में सर हिला कर अपनी अनुमति दी!
"बेटी.... डॉक्टर सरिता को आने दो हम उनसे बात करते हैं|" पिताजी ने मुझे आश्वासन दिया| तभी अनिल एकदम से बोल उठा; "पिताजी क्यों न हम डॉक्टर सुरेंदर से पूछें?" {यदि आप सभी को याद ओ ओ डॉक्टर सुरेंदर वही हैं जिनकी गाड़ी से अनिल का accident हुआ था|} और इससे पहले की कोई कुछ कहता अनिल ने तुरंत ही डॉक्टर सुरेंदर को फ़ोन मिला दिया और उनसे बात करने लगा| बातचीत के बाद अनिल बोला की वो (सुरेंदर जी) इस बारे में पता कर के बताएँगे| करीब दो घंटे बाद उनका फ़ोन आया और उन्होंने बताया की बैंगलोर में एक specialized हॉस्पिटल है| उनका दावा है की उनका success rate 75% तक है| हमारे लिए तो ये ऐसे था जैसे अँधेरे कमरे में उम्मीद कोई किरण निकल आई हो| इससे पहले कोई कुछ कहता मैं उत्साह में आ कर बोल उठी; "पिताजी (ससुर जी) हमें इनको (मेरे पति को) वहाँ ले जाना चाहिए!" पर तभी मेरे पिताजी मुझ पर भड़क उठे; "गोद में उठा के ले जाएँ? मानु की हालत देख रही है ना तू?" ये सुन के मुझे होश आया की इस स्थिति में इन्हें (मेरे पति को) बैंगलोर कैसे ले जा सकते हैं?
पर इसका जवाब अनिल के पास था| वो बोला; "पिताजी... डॉक्टर सुरेंदर ने कहा है की air ambulance के जरिये हम जीजू को बैंगलोर ले जा सकते हैं| पर ये बहुत महंगा है ... तकरीबन 1.5 लाख से 2 लाख तक का खर्च होगा!" ये सुन कर तो मैं भी थोड़ा सोच में पड़ गई ... पर मेरा मन कह रहा था की पिताजी (ससुर जी) ये खर्च करने से नहीं चुकेंगे और ऐसा हुआ भी| उन्होंने बिना देर किये कहा; "अनिल बेटा... तू ऐसा कर बैंगलोर जा कर पहले इस हॉस्पिटल के बारे में पता लगा तब तक मैं इधर पैसा का इंंतजाम करता हूँ| प्राइवेट हॉस्पिटल है तो खर्च तो बहुत होगा और जब तक इन्तेजाम होता है तब तक हो सकता है डॉक्टर सरिता भी आ जाएं तो उनसे भी एक बार पूछ लेंगे|" अनिल तुरंत निकलने के लिए तैयार हो गया| पिताजी ने उसे सुबह जाने के लिए कहा तो जैसे-तैसे वो मान गया| अगले दिन सुबह अनिल और डॉक्टर सुरेंदर जी की बात हो गई| डॉक्टर सुरेंदर ने कहा की वो डायरेक्ट बैंगलोर मिलेंगे और अनिल भी उन्हें सीधा बैंगलोर ही मिलने वाला था| उन्होंने मुझे एक Link मेल किया था… मैंने सोचा की एक बार मैं भी बात कर लूँ! तो मैंने उन्हें फोन मिलाया;
"हेलो सुरेंदर जी बोल रहे हैं!"
"हाँ जी बोल रहा हूँ... आप कौन?"
"जी मैं संगीता.... अनिल की बहन|"
"ओह्ह...जी नमस्ते|"
"सुरेंदर जी अम्म्म.. मुझे आपसे कुछ पूछना था... actually आपने जिस हॉस्पिटल के बारे में बताया वो बैंगलोर में है| क्या यहाँ दिल्ली में कोई हॉस्पिटल नहीं?"
"संगीता जी... दरअसल हमारे doctor's journal में ये article आया था| मेरा एक दोस्त है जो बैंगलोर में रहता है| दिल्ली में मेरा कोई contact नहीं है... still i'll try my best .... meanwhile हम बंगलोरे में एक बार हॉस्पिटल चेक कर लेते हैं|
"जी.... and thank you .... very much!"
"अरे संगीता जी थैंक यू कैसा.... आप अनिल की दीदी हैं तो मेरी भी दीदी जैसी हुई ना| you don't worry."
मेरी सुरेंदर जी से बात हुई तो मन को थोड़ी तसल्ली हुई|
8 years ago#46
डॉक्टर सुरेंदर ने कहा की वो डायरेक्ट बैंगलोर मिलेंगे और अनिल भी उन्हें सीधा बैंगलोर ही मिलने वाला था| उन्होंने मुझे एक Link मेल किया था… मैंने सोचा की एक बार मैं भी बात कर लूँ! तो मैंने उन्हें फोन मिलाया;
"हेलो सुरेंदर जी बोल रहे हैं!"
"हाँ जी बोल रहा हूँ... आप कौन?"
"जी मैं संगीता.... अनिल की बहन|"
"ओह्ह...जी नमस्ते|"
"सुरेंदर जी अम्म्म.. मुझे आपसे कुछ पूछना था... actually आपने जिस हॉस्पिटल के बारे में बताया वो बैंगलोर में है| क्या यहाँ दिल्ली में कोई हॉस्पिटल नहीं?"
"संगीता जी... दरअसल हमारे doctor's journal में ये article आया था| मेरा एक दोस्त है जो बैंगलोर में रहता है| दिल्ली में मेरा कोई contact नहीं है... still i'll try my best .... meanwhile हम बंगलोरे में एक बार हॉस्पिटल चेक कर लेते हैं|
"जी.... and thank you .... very much!"
"अरे संगीता जी थैंक यू कैसा.... आप अनिल की दीदी हैं तो मेरी भी दीदी जैसी हुई ना| you don't worry."
मेरी सुरेंदर जी से बात हुई तो मन को थोड़ी तसल्ली हुई|
एक उम्मीद जिसके सहारे इस जीवन की नैय्या पार हो सकती थी! जैसे ही मैं मुड़ी तो पीछे मेरी 'माँ' नेहा खड़ी थी! वो एक डीएम से बोल पड़ी; "हुँह... आप... पापा अगर आपकी जगह झोटे तो आपको ठीक करने के लिए करोड़ों रूपए फूँक देते! और आप... आपको तो पैसे बचाने हैं! इतने पैसे बचा के करोगे क्या?" ये सब उसने मुझे टोंट मरते हुए कहा|
"बेटा ऐसा नहीं है, मैं तो......." मेरे आगे कुछ कहने से पहले ही 'मेरी माँ' ने अपना 'फरमान' सुना दिया!
"मुझे सब पता है..... आप .... ये प्यार मोहब्बत... ये सब बस दिखावा है... और कुछ नहीं| जो लोग प्यार में पड़ते हैं उनका हाल पापा जैसा होता है| खेर मैं आपको कुछ बताने आई थी| मैंने decide किया है की मैं कभी शादी नहीं करुँगी!"
"बेटा....ये तू क्या कह रही है!" मैंने उसे समझाना चाहा पर अभी उसकी बात पूरी नहीं हुई थी|
"मैं ता उम्र पापा की सेवा करुँगी! कभी शादी नहीं करुँगी! ये प्यार-व्यार कुछ नहीं होता.... वैसे भी मुझे आपकी वजह से पापा का प्यार तो मिला नहीं.... बची हुई जिंदगी मैं पापा के साथ ही गुजरूँगी|" आगे कुछ कहने से पहले माँ (सासु माँ) आ गईं| म्हे लगा की वो अपना ये 'फैसला' माँ को भी सुनाएगी पर शायद उसमें इतनी हिम्मत नहीं थी| उसने topic चेंज करते हुए कहा; "दादी जी... मामू आ गए?" माँ ने उसे कहा की अनिल नीचे उसका इन्तेजार कर रहा है| नेहा बिना आगे कुछ कहे नीचे भाग गई!
अपनी बेटी की मुंह से ये सब सुन कर मैं टूट गई.... अब तक उसने मुझे दोषी ही बनाया था और आज तो उसने मुझे सजा ही सुना दी| मैं फूट-फूट के रोने लगी.... माँ को कुछ समझ नहीं आया तो वो मुझे चुप कराने लगीं| मैंने रो-रो कर माँ से अपनी बात कही; "माँ..... अब.....अब जान नहीं बची मुझ में....टूट चुकी हूँ! मैं... मेरी किस्मत ऐसी है! ना तो मैं एक अच्छी बेटी साबित हो सकी और ना ही अच्छी पत्नी! ........... और अब तो मैं एक अच्छी माँ भी साबित नहीं हो सकी! मैं....बहुत अभागी हूँ...... ऐसा ...ऐसा देवता जैसा पति मिला और मैंने उसकी कदर तक ना की! इन्होने हर कदम पर मेरे साथ चलना चाहा और मैं इनके साथ चलने से कतराती रही|माँ..... आप लोग क्यों मेरी तरफदारी करते हैं.....मैं इस लायक ही नहीं! सच कहते हैं पिताजी मुझे मर ही जाना चाहिए था! इस हँसते-खेलते परिवार को मेरी ही नजर लग गई माँ...... मेरी बुरी किस्मत इस घर को ही निगल ना जाए....प्लीज माँ .... मुझे .... मुझे थोड़ा सा जहर ला दो.... मुझे मरने दो.... मैं ... " आगे कुछ कहने से माँ ने मुझे रोक दिया और मेरे आँसूं पोछते हुए बोलीं; "बेटी..... हम सब मानु से बहुत प्यार करते हैं ओ मानु तुझसे बहुत प्यार करता है तो इस हिसाब से हम तुझसे भी बहुत प्यार करते हैं! तेरी तरफदारी करना हक़ है हमारा आखिर शादी के बाद तू हमारी बेटी बन गई ना? उसी तरह मानु तेरे पिताजी का बेटा बन गया.... अब अगर उसकी वजह से तुझे कुछ तकलीफ हो जाती तो हम दोनों (सासु माँ और ससुर जी) उसका जीना बेहाल कर देते| और फिर तेरी कोई गलती नहीं है..... हाँ मैं समझ सकती हूँ की नेहा तुझसे नाराज है पर उसकी नाराजगी उसके पापा के ठीक होने पर खत्म हो जायेगी| तू चिंता मत कर...हिम्मत बांधे रख और ये हमेशा याद रख की इस वक़्त तू ही वो 'खूँटा' है जिससे ये पूरा परिवार बंधा है| अगर तू ने ही हार मान ली तो यहाँ कौन है जो इस समय में आगे आएगा| इन बूढी हड्डियों में अब हिम्मत नहीं की वो बेटे के साथ बहु को भी तकलीफ में देखे|
एक तू ही है जो बच्चों को संभाल रही है| आयुष तो अभी बहुत छोटा है और नेहा से तर्क करने की ताकत सिर्फ तुझ में है| मैं उससे बात करुँगी... तू फ़िक्र ना कर|"
माँ ने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की थी पर मेरा दिल आज बहुत बेचैन था! माँ के सामने तो मैंने जैसे-तैसे खुद को रोक लिया पर माँ के जाने के बाद मेरे आँसूं फिर बहने लगी... मैं इनके सामने बैठ गई और इनका हाथ अपने हाथों में ले कर इनसे बात करने लगी; "आप क्यों मुझ पर इतना गुस्सा निकाल रहे हो? इतना ही गुस्सा है तो मेरी जान ले लो! पर इस तरह मुझ पर जुल्म तो मत करो! इतना प्यार करते हो मुझसे ...फिर इतनी नाराजगी क्यों? एक बार बस एक बार अपनी आँखें खोल दो... प्लीज ....i beg of you ..... !!! प्लीज .....i promise .... i promise मैं आज के बाद आपसे कभी नाराज नहीं हूँगी! कभी आपसे बात करना बंद नहीं करुँगी! प्लीज.... मन जाओ.... अच्छा मेरे लिए ना सही तो अपनी बेटी नेहा के लिए....आयुष के लिए ....प्लीज..... जानते हो नेहा ने प्रण किया है की वो कभी शादी नहीं करेगी! मेरे कारन सात साल....उसे आपका प्यार नहीं मिल पाया! कम से कम उसके लिए ही ..............." पर मेरी कही किसी भी आत का उन पर (मेरे पति) कोई असर नहीं पड़ा| वो अब भी उसी तरह मूक लेटे हुए थे! सारी रात मैं बस रोती रही ... बिलखती रही.... और सच पूछो तो उस वक़्त मुझे एहसास हुआ की मेरी आँख से गिरे एक कतरे आँसूं को देख ये इतने परेशान हो जाय करते थे की घर-भर अपने सर पर उठा लिया करते थे... और आज मैं यहाँ बिलख-बिलख के रो रही हूँ ... इनसे मिन्नतें कर रही हूँ की आप वापस आ जाओ.... मेरे आँसुओं की क्या कीमत थी, उस दिन मुझे ज्ञात हुआ! उस रात शायद भगवान को मुझ पर तरस आ गया हो...या फिर ये कहें की उन्होंने नेहा की दुआ कबूल कर ली और....................
"हेलो सुरेंदर जी बोल रहे हैं!"
"हाँ जी बोल रहा हूँ... आप कौन?"
"जी मैं संगीता.... अनिल की बहन|"
"ओह्ह...जी नमस्ते|"
"सुरेंदर जी अम्म्म.. मुझे आपसे कुछ पूछना था... actually आपने जिस हॉस्पिटल के बारे में बताया वो बैंगलोर में है| क्या यहाँ दिल्ली में कोई हॉस्पिटल नहीं?"
"संगीता जी... दरअसल हमारे doctor's journal में ये article आया था| मेरा एक दोस्त है जो बैंगलोर में रहता है| दिल्ली में मेरा कोई contact नहीं है... still i'll try my best .... meanwhile हम बंगलोरे में एक बार हॉस्पिटल चेक कर लेते हैं|
"जी.... and thank you .... very much!"
"अरे संगीता जी थैंक यू कैसा.... आप अनिल की दीदी हैं तो मेरी भी दीदी जैसी हुई ना| you don't worry."
मेरी सुरेंदर जी से बात हुई तो मन को थोड़ी तसल्ली हुई|
अब आगे.........
एक उम्मीद जिसके सहारे इस जीवन की नैय्या पार हो सकती थी! जैसे ही मैं मुड़ी तो पीछे मेरी 'माँ' नेहा खड़ी थी! वो एक डीएम से बोल पड़ी; "हुँह... आप... पापा अगर आपकी जगह झोटे तो आपको ठीक करने के लिए करोड़ों रूपए फूँक देते! और आप... आपको तो पैसे बचाने हैं! इतने पैसे बचा के करोगे क्या?" ये सब उसने मुझे टोंट मरते हुए कहा|
"बेटा ऐसा नहीं है, मैं तो......." मेरे आगे कुछ कहने से पहले ही 'मेरी माँ' ने अपना 'फरमान' सुना दिया!
"मुझे सब पता है..... आप .... ये प्यार मोहब्बत... ये सब बस दिखावा है... और कुछ नहीं| जो लोग प्यार में पड़ते हैं उनका हाल पापा जैसा होता है| खेर मैं आपको कुछ बताने आई थी| मैंने decide किया है की मैं कभी शादी नहीं करुँगी!"
"बेटा....ये तू क्या कह रही है!" मैंने उसे समझाना चाहा पर अभी उसकी बात पूरी नहीं हुई थी|
"मैं ता उम्र पापा की सेवा करुँगी! कभी शादी नहीं करुँगी! ये प्यार-व्यार कुछ नहीं होता.... वैसे भी मुझे आपकी वजह से पापा का प्यार तो मिला नहीं.... बची हुई जिंदगी मैं पापा के साथ ही गुजरूँगी|" आगे कुछ कहने से पहले माँ (सासु माँ) आ गईं| म्हे लगा की वो अपना ये 'फैसला' माँ को भी सुनाएगी पर शायद उसमें इतनी हिम्मत नहीं थी| उसने topic चेंज करते हुए कहा; "दादी जी... मामू आ गए?" माँ ने उसे कहा की अनिल नीचे उसका इन्तेजार कर रहा है| नेहा बिना आगे कुछ कहे नीचे भाग गई!
अपनी बेटी की मुंह से ये सब सुन कर मैं टूट गई.... अब तक उसने मुझे दोषी ही बनाया था और आज तो उसने मुझे सजा ही सुना दी| मैं फूट-फूट के रोने लगी.... माँ को कुछ समझ नहीं आया तो वो मुझे चुप कराने लगीं| मैंने रो-रो कर माँ से अपनी बात कही; "माँ..... अब.....अब जान नहीं बची मुझ में....टूट चुकी हूँ! मैं... मेरी किस्मत ऐसी है! ना तो मैं एक अच्छी बेटी साबित हो सकी और ना ही अच्छी पत्नी! ........... और अब तो मैं एक अच्छी माँ भी साबित नहीं हो सकी! मैं....बहुत अभागी हूँ...... ऐसा ...ऐसा देवता जैसा पति मिला और मैंने उसकी कदर तक ना की! इन्होने हर कदम पर मेरे साथ चलना चाहा और मैं इनके साथ चलने से कतराती रही|माँ..... आप लोग क्यों मेरी तरफदारी करते हैं.....मैं इस लायक ही नहीं! सच कहते हैं पिताजी मुझे मर ही जाना चाहिए था! इस हँसते-खेलते परिवार को मेरी ही नजर लग गई माँ...... मेरी बुरी किस्मत इस घर को ही निगल ना जाए....प्लीज माँ .... मुझे .... मुझे थोड़ा सा जहर ला दो.... मुझे मरने दो.... मैं ... " आगे कुछ कहने से माँ ने मुझे रोक दिया और मेरे आँसूं पोछते हुए बोलीं; "बेटी..... हम सब मानु से बहुत प्यार करते हैं ओ मानु तुझसे बहुत प्यार करता है तो इस हिसाब से हम तुझसे भी बहुत प्यार करते हैं! तेरी तरफदारी करना हक़ है हमारा आखिर शादी के बाद तू हमारी बेटी बन गई ना? उसी तरह मानु तेरे पिताजी का बेटा बन गया.... अब अगर उसकी वजह से तुझे कुछ तकलीफ हो जाती तो हम दोनों (सासु माँ और ससुर जी) उसका जीना बेहाल कर देते| और फिर तेरी कोई गलती नहीं है..... हाँ मैं समझ सकती हूँ की नेहा तुझसे नाराज है पर उसकी नाराजगी उसके पापा के ठीक होने पर खत्म हो जायेगी| तू चिंता मत कर...हिम्मत बांधे रख और ये हमेशा याद रख की इस वक़्त तू ही वो 'खूँटा' है जिससे ये पूरा परिवार बंधा है| अगर तू ने ही हार मान ली तो यहाँ कौन है जो इस समय में आगे आएगा| इन बूढी हड्डियों में अब हिम्मत नहीं की वो बेटे के साथ बहु को भी तकलीफ में देखे|
एक तू ही है जो बच्चों को संभाल रही है| आयुष तो अभी बहुत छोटा है और नेहा से तर्क करने की ताकत सिर्फ तुझ में है| मैं उससे बात करुँगी... तू फ़िक्र ना कर|"
माँ ने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की थी पर मेरा दिल आज बहुत बेचैन था! माँ के सामने तो मैंने जैसे-तैसे खुद को रोक लिया पर माँ के जाने के बाद मेरे आँसूं फिर बहने लगी... मैं इनके सामने बैठ गई और इनका हाथ अपने हाथों में ले कर इनसे बात करने लगी; "आप क्यों मुझ पर इतना गुस्सा निकाल रहे हो? इतना ही गुस्सा है तो मेरी जान ले लो! पर इस तरह मुझ पर जुल्म तो मत करो! इतना प्यार करते हो मुझसे ...फिर इतनी नाराजगी क्यों? एक बार बस एक बार अपनी आँखें खोल दो... प्लीज ....i beg of you ..... !!! प्लीज .....i promise .... i promise मैं आज के बाद आपसे कभी नाराज नहीं हूँगी! कभी आपसे बात करना बंद नहीं करुँगी! प्लीज.... मन जाओ.... अच्छा मेरे लिए ना सही तो अपनी बेटी नेहा के लिए....आयुष के लिए ....प्लीज..... जानते हो नेहा ने प्रण किया है की वो कभी शादी नहीं करेगी! मेरे कारन सात साल....उसे आपका प्यार नहीं मिल पाया! कम से कम उसके लिए ही ..............." पर मेरी कही किसी भी आत का उन पर (मेरे पति) कोई असर नहीं पड़ा| वो अब भी उसी तरह मूक लेटे हुए थे! सारी रात मैं बस रोती रही ... बिलखती रही.... और सच पूछो तो उस वक़्त मुझे एहसास हुआ की मेरी आँख से गिरे एक कतरे आँसूं को देख ये इतने परेशान हो जाय करते थे की घर-भर अपने सर पर उठा लिया करते थे... और आज मैं यहाँ बिलख-बिलख के रो रही हूँ ... इनसे मिन्नतें कर रही हूँ की आप वापस आ जाओ.... मेरे आँसुओं की क्या कीमत थी, उस दिन मुझे ज्ञात हुआ! उस रात शायद भगवान को मुझ पर तरस आ गया हो...या फिर ये कहें की उन्होंने नेहा की दुआ कबूल कर ली और....................
8 years ago#47
माँ ने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की थी पर मेरा दिल आज बहुत बेचैन था! माँ के सामने तो मैंने जैसे-तैसे खुद को रोक लिया पर माँ के जाने के बाद मेरे आँसूं फिर बहने लगी... मैं इनके सामने बैठ गई और इनका हाथ अपने हाथों में ले कर इनसे बात करने लगी; "आप क्यों मुझ पर इतना गुस्सा निकाल रहे हो? इतना ही गुस्सा है तो मेरी जान ले लो! पर इस तरह मुझ पर जुल्म तो मत करो! इतना प्यार करते हो मुझसे ...फिर इतनी नाराजगी क्यों? एक बार बस एक बार अपनी आँखें खोल दो... प्लीज ....i beg of you ..... !!! प्लीज .....i promise .... i promise मैं आज के बाद आपसे कभी नाराज नहीं हूँगी! कभी आपसे बात करना बंद नहीं करुँगी! प्लीज.... मन जाओ.... अच्छा मेरे लिए ना सही तो अपनी बेटी नेहा के लिए....आयुष के लिए ....प्लीज..... जानते हो नेहा ने प्रण किया है की वो कभी शादी नहीं करेगी! मेरे कारन सात साल....उसे आपका प्यार नहीं मिल पाया! कम से कम उसके लिए ही ..............." पर मेरी कही किसी भी आत का उन पर (मेरे पति) कोई असर नहीं पड़ा| वो अब भी उसी तरह मूक लेटे हुए थे! सारी रात मैं बस रोती रही ... बिलखती रही.... और सच पूछो तो उस वक़्त मुझे एहसास हुआ की मेरी आँख से गिरे एक कतरे आँसूं को देख ये इतने परेशान हो जाय करते थे की घर-भर अपने सर पर उठा लिया करते थे... और आज मैं यहाँ बिलख-बिलख के रो रही हूँ ... इनसे मिन्नतें कर रही हूँ की आप वापस आ जाओ.... मेरे आँसुओं की क्या कीमत थी, उस दिन मुझे ज्ञात हुआ! उस रात शायद भगवान को मुझ पर तरस आ गया हो...या फिर ये कहें की उन्होंने नेहा की दुआ कबूल कर ली और....................
इनका (मेरे पति का) हाथ अपने हाथों में लिए, रोते-रोते इनसे मिन्नत करते-करते कब मुझे नींद आ गई पता ही नहीं चला| हाँ इतना याद है की मैं एक सपना देख रही थी जिसमें ये मेरे से दूर जा रहे थे और मैं इन्हें रोकने के लिए बस रोये जा रही थी और बोल रही थी; "प्लीज मत जाओ....मुझे अकेला छोड़ के मत जाओ!" सपना मेरे लिए बहत डरावना था| तभी मुझे महसूस हुआ जैसे किसी ने मेरी हथेली को दबाया हो! ये महसूस होते ही मेरी आँखें तुरंत खुली और मैंने इनकी देखा तो इनके चेहरे पर शिकन के भाव दिखे और इनके कुछ बुदबुदाने का एहसास हुआ! आवाज इतनी हलकी थी की मैं सुन ना सकी तो मैं अपना कान इनके होठों के नजदीक ले गई और मुझे ये सुनाई दिया; "i'm ...........sorry ............" ये सुन कर तो मुझे कुछ समझ नहीं आया....मैंने बिना देर किये Nurse की Call Bell बजा दी और उसके आने तक इनसे रो-रो कर बात करने लगी; "जानू.... प्लीज ..... कुछ मत बोलो....मैं यहीं हूँ आपके पास! आप चिंता मत करो.... मैं यहीं हूँ!" मुझे याद ही नहीं था की मैंने नेहा से 'Promise' किया था और मुझे एक डर सताने लगा की कहीं इन्हें मेरी वजह से कुछ हो गया तो मैं मर ही जाऊँगी| मैं इनके माथे को सहलाने लगी ताकि इन्हें थोड़ा relief मुझे| इतने मैं नर्स 'राजी' आ गई और इनकी ये हालत देख उसने तुरंत डॉक्टर को intercom किया और उनके आने तक वो vitals वगेरह चेक करने लगी| डॉक्टर भी भागे-भागे आये और मुझे बाहर जाने को कहा| मैंने बाहर आते ही तुरंत पिताजी (ससुर जी) को फोन मिलाया और उन्हें सारी बात बताई| इधर नर्स 'राजी' ने बाहर आकर मुझे आवाज दी और अंदर बुलाया| मैं बहुत डरते-डरते अंदर गई की कहीं कुछ गलत तो नहीं हो गया.... और मैं कुछ भी negative सुनने की हालत में नहीं थी| अगर उस वक़्त मुझे कोई गलत खबर मिलती तो मैं खड़े-खड़े ही अपने प्राण त्याग देती! पर भगवान का लाख-लाख शुकर है की ऐसा कुछ नहीं हुआ| मेरे आदर आने पर डॉक्टर ने मुझे कहा की ये आपका नाम ले रहे थे| आप इन्हीं के पास रहिये| इनका B.P. बढ़ा हुआ है| मैं इनके पास गई और इनका हाथ अपने हाथों में ले लिया|
इन्होने तब तक मेरा नाम लेना बंद नहीं किया जबतक इन्होने मेरे हाथ का स्पर्श अपने हाथों में महसूस नहीं किया| मैं मन ही मन बस प्रार्थना कर रही थी की बस इन्हें पूरी तरह होश आ जाए और इधर ये मेरा हाथ दबाये जा रहे थे| मुझे वो पल याद आया जब मैं इनसे मिलने इनके घर पहलीबार आई थी| उस दिन मेरे जाने पर इन्होने इसी तरह मेरा हाथ दबाया था ऑटोरिक्शा में भी इन्होने मेरा हाथ इसी कदर पकड़ा था जैसे ये मुझे खुद से अलग नहीं होने देंगे| मुझे डर लगने लगा की कहीं मैं इन्हें खो ना दूँ इसलिए मैं भी इनका हाथ उसी तरह दबा रही थी और मन ही मन कह रही थी की मैं आपको कुछ नहीं होने दूँगी| शायद इन्होने मेरे मन की बात पढ़ ली और ये थोड़ा relax होने लगे! डॉक्टर को भी इनका B.P. नार्मल होता हुआ दिखाई दिया और उन्होंने मेरी तरफ देख के कहा; "he’s alright…. I’ve given him an injection. I’ll call dr. sarita right now and tell her bout the good news.” इतना कह के वो बाहर जाने लगे, मैं उनसे बात करने बाहर जाना चाहती थी पर इन्होने मेरा हाथ नहीं छोड़ा| तो मैं भी इन्ही के सिराहने बैठ गई और इनके सर पर हाथ फेरने लगी| मेरी नजर घडी पर गई तो रात के दो बजे थे.... हाथ फेरते-फेरते कब नींद आई पता नहीं चली| करीब पौना घंटे बाद आँख खुली जब माँ-पिताजी और बच्चे आ गए| सब ने आकर हम दोनों को घेर लिया था|
मैंने दबी हुई आवाज में उन्हें सब बताया| ये सुन कर सब के चेहरों पर जो ख़ुशी झलकी उसे बताने के लिए मेरे पास शब्द नहीं| बच्चे चहक उठे .... बड़े सब भगवन को शुक्रिया करने लगे| माँ (सासु माँ) ने मेरे पास आकर मेरे सर पर हाथ रखा और "सदा सुहागन रहो" का आशीर्वाद दिया| नेहा बेड के दूसरी तरफ आई और अपने पापा के गाल पर kiss किया और मुस्कुराने लगी| आज इतने दिनों बाद उसके चेहरे पर मुस्कान देख के मेरा दिल भी भाव०विभोर हो था और मेरी आँख से भी आँसूं छलक आये|कमरे में सब मौजूद थे....पर अनिल कहीं दिख नहीं रहा था| मैंने माँ (सासु माँ) से पूछा की अनिल कहाँ है तो उन्होंने बताया की वो तो ट्रैन पकड़ के निकल गया! मैं हैरान थी की इतनी जल्दी उसे कौन सी ट्रैन मिल गई, माँ ने बताया की उसे "कर्नाटका एक्सप्रेस" वाली ट्रैन 09:30 बजे छूटने वाली थी| वो इतना उतावला था की बिना टिकट लिए ही चढ़ गया| मैंने माँ से कहा की वो अनिल को फोन कर दें और वो वापस आ जाए तो मेरे पिताजी मुझ पर बिगड़ गए; "बिलकुल नहीं! बहनजी जब तक मानु को पूरी तरह होश नहीं आता आप अनिल को फोन मत करें| वैसे भी वो बिना कुछ पता किये वापस नहीं आएगा|" मैं जानती थी की पिताजी को इनकी (मेरे पति की) बहुत चिंता है और वो कोई भी risk नहीं लेना चाहते| हाँ इनकी जगह अगर मैं बिस्तर पड़ी होती तो शायद वो ये risk ले भी लेते! पिताजी (ससुर जी) ने भी बहुत समझाया पर मेरे माँ-पिताजी इस बात पर अड़े रहे की वो अनिल को तब तक वापस नहीं बुलाएँगे जब तक इन्हें पूरी तरह होश नहीं आ जाता| वैसे भी एक बार जानकारी हासिल करने में कोई हर्ज नहीं... आखिर सासु माँ और ससुर जी मान गए|वो पूरी रात कोई नहीं सोया| सब जाग रहे थे और प्रार्थना कर रहे थे! सिर्फ एक आयुष था जो सो गया था.....अब वो था तो एक बच्चा ही! नेहा बेड के दूसरी तरफ कुर्सी ले कर बैठ गई थी और इनका दूसरा हाथ पकड़ के सहला रही थी| वो मन ही अं कुछ बुदबुदा रही थी .... मैं बस उसके होठों की थिरकन देखने लगी और कुछ देर बबाद एहसास हुआ की वो 'महामृत्युंजय मन्त्र' बोल रही थी और उसकी नजरें टकटकी बांधें अपने पापा को ही देख रही थी| नर्स 'राजी' इन्हें दुबारा चेक करे आई और मेरी तरफ मुस्कुरा कर हाँ में गर्दन हिलाई| मतलब की इकि तबियत में सुधार है! पांच बजे पिताजी सब के लिए चाय ले आये और तब तक ना मैंने इनका हाथ छोड़ा था और ना ही नेहा ने! हम दोनों में तो जैसे होड़ लगी थी की कौन इनसे ज्यादा प्यार करता है....देखा जाए तो नेहा ही ज्यादा प्यार करती थी!
एक जिंदगी के लिए कितने लोग दुआयें माँग रहे थे....ऐसा देवता जैसे पति है मेरे!
सुबह के नौ बजे थे, डॉक्टर सरिता भी आ चुकी थीं और सारे लोग कमरे में ही बैठे थे| डॉक्टर सरिता सब को क्या-क्या एहतियात बरतनी है उसके बारे में सब बता रही थी| उनके अनुसार तो अब कोई घबराने की बात नहीं थी| पर सब के दिलों को चैन तब मिलता जब वे इन्हें होश में देखते! जब इन्हें होश आया तो सब के सब फिर से हमें घेर कर खड़े हो गए! सबको अपने पास देख के इनके (मेरे पति के) चेहरे पर मुस्कान आई....हाय! क्या कातिल उस्काण थी वो! ऐसा लगा मानो एक अरसे बाद उनकी मुस्कान देख रही हूँ! इन्हें मुस्कुराता हुआ देख सबके दिल को इत्मीनान हुआ और मेरी माँ और सासु माँ ने इनकी नजर उतारी और भगवान को शुक्रिया अदा किया| नेहा तो बेड पर चढ़ गई और आके अपने पापा के गले लग गई और रोने लगी| रोते-रोते बोली; "i love you पापा" उसकी ये बात सुन कर ये अपने हमेशा वाले अंदाज में बोले; "awwwwwwww मेरा बच्चा!" ये सुनने के बाद ही नेहा के चेहरे पर मस्कान आई! हॉस्पिटल का बेड थोड़ा ऊँचा था तो आयुष उस पर चढ़ नहीं पा अहा था| वो भरसक प्रयास कर रहा था पर फिर ही छाड़ नहीं पा रहा था| अंत में उसे अपनने दादा जी को ही इशारा किया और बोला; "दादा जी...मुझे पापा ...." बस इसके आगे कुछ बोलने से पहले ही पिताजी ने उसे गोद में उठाया और उसके पापा की पास छोड़ दिया| वो घुटनों के बल छलके आया और नेहा के साथ साथ उसने भी अपने पापा को झप्पी डाल दी, पर वो रोया नहीं! बच्चों के गले लगने से इनका ध्यान उनपर चला गया और मेरा हाथ छूट गया| मैं उठ के डॉक्टर सरिता के पास चली गई जो ये सब देख कर काफी emotional हो गईं, चूँकि सबका ध्यान इनपर था तो किसी को उनके आँसूं नहीं दिखे| मैंने उन्हें दिल से थैंक्स बोला तो वो बस मुस्कुरा दीं|
आखिरकार जब सब ने हम दोनों को आशीर्वाद दे दिया तब सबसे पहला सवाल आयुष ने पूछा; आंटी हम पापा को घर कब ले जा सकते हैं?" उसक सवाल सं सब हँस पड़े थे| इतने दिनों बाद सबको हँसता देख मेरे दिल को थोड़ा सुकून आया| डॉक्टर सरिता ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया; "बेटा...दो-तीनं दिन अभी आपके पापा को यहाँ observation के लिए रुकना होगा| उसके बाद आप उन्हें ले जा सकते हो|" ये सुन के आयुष खुश हो गया और इधर-उधर नाचने लगा| उसका dance देख सब खुश हो गए और हँस पड़े| ख़ुशी का मौहाल बन चूका था ..... ये (मेरे पति) यही ज्यादा बात नहीं कर रहे थे| शरीर काफी कमजोर हो चूका था| बहत धीरे-धीरे बात कर रहे थे..... तभी माँ उठ के मेरे पास आईं और बोलीं; "बेटी अब तो घर चल... थोड़ा आराम कर ले... जब से मानु हॉस्पिटल आया है तो तब से घर नहीं गई|" ये सु कर इनके चेहरे पर परेशानी की शिकन पड़ने लगी और मैं इन्हें कतई परेशान नहीं करना चाहती थी तो मैं ने माँ की बात ये कह कर ताल दी; "माँ अब तो मैं इन्ही की साथ गृह-प्रवेश करुँगी|" ये सुन कर माँ हँस पड़ी और इनके हेहरे पर भी मुसस्काण आ गई| आयुष जो हमारे पास बेड पर बैठा था उसने मेरी बात को थोड़ा और मजाक में बदल दिया ये कह के; "दादी तो इस्सका मतलब की इस बार पापा चावल वाले लोटे को लात मार कर घर के नदर आयेगे?" उसके इस अचकन मजाक को सुन सभी जोर से हँस पड़े और कमरे में हंसी गूंजने लगी| एक परिवार जो तकरीबन बीस दिन से, मेरे कारन दुःख भोग रहा था वो आज... finally हँस रहा था अब भला मुझे इससे ज्यादा क्या चाहिए था!
अब आगे..........
इनका (मेरे पति का) हाथ अपने हाथों में लिए, रोते-रोते इनसे मिन्नत करते-करते कब मुझे नींद आ गई पता ही नहीं चला| हाँ इतना याद है की मैं एक सपना देख रही थी जिसमें ये मेरे से दूर जा रहे थे और मैं इन्हें रोकने के लिए बस रोये जा रही थी और बोल रही थी; "प्लीज मत जाओ....मुझे अकेला छोड़ के मत जाओ!" सपना मेरे लिए बहत डरावना था| तभी मुझे महसूस हुआ जैसे किसी ने मेरी हथेली को दबाया हो! ये महसूस होते ही मेरी आँखें तुरंत खुली और मैंने इनकी देखा तो इनके चेहरे पर शिकन के भाव दिखे और इनके कुछ बुदबुदाने का एहसास हुआ! आवाज इतनी हलकी थी की मैं सुन ना सकी तो मैं अपना कान इनके होठों के नजदीक ले गई और मुझे ये सुनाई दिया; "i'm ...........sorry ............" ये सुन कर तो मुझे कुछ समझ नहीं आया....मैंने बिना देर किये Nurse की Call Bell बजा दी और उसके आने तक इनसे रो-रो कर बात करने लगी; "जानू.... प्लीज ..... कुछ मत बोलो....मैं यहीं हूँ आपके पास! आप चिंता मत करो.... मैं यहीं हूँ!" मुझे याद ही नहीं था की मैंने नेहा से 'Promise' किया था और मुझे एक डर सताने लगा की कहीं इन्हें मेरी वजह से कुछ हो गया तो मैं मर ही जाऊँगी| मैं इनके माथे को सहलाने लगी ताकि इन्हें थोड़ा relief मुझे| इतने मैं नर्स 'राजी' आ गई और इनकी ये हालत देख उसने तुरंत डॉक्टर को intercom किया और उनके आने तक वो vitals वगेरह चेक करने लगी| डॉक्टर भी भागे-भागे आये और मुझे बाहर जाने को कहा| मैंने बाहर आते ही तुरंत पिताजी (ससुर जी) को फोन मिलाया और उन्हें सारी बात बताई| इधर नर्स 'राजी' ने बाहर आकर मुझे आवाज दी और अंदर बुलाया| मैं बहुत डरते-डरते अंदर गई की कहीं कुछ गलत तो नहीं हो गया.... और मैं कुछ भी negative सुनने की हालत में नहीं थी| अगर उस वक़्त मुझे कोई गलत खबर मिलती तो मैं खड़े-खड़े ही अपने प्राण त्याग देती! पर भगवान का लाख-लाख शुकर है की ऐसा कुछ नहीं हुआ| मेरे आदर आने पर डॉक्टर ने मुझे कहा की ये आपका नाम ले रहे थे| आप इन्हीं के पास रहिये| इनका B.P. बढ़ा हुआ है| मैं इनके पास गई और इनका हाथ अपने हाथों में ले लिया|
इन्होने तब तक मेरा नाम लेना बंद नहीं किया जबतक इन्होने मेरे हाथ का स्पर्श अपने हाथों में महसूस नहीं किया| मैं मन ही मन बस प्रार्थना कर रही थी की बस इन्हें पूरी तरह होश आ जाए और इधर ये मेरा हाथ दबाये जा रहे थे| मुझे वो पल याद आया जब मैं इनसे मिलने इनके घर पहलीबार आई थी| उस दिन मेरे जाने पर इन्होने इसी तरह मेरा हाथ दबाया था ऑटोरिक्शा में भी इन्होने मेरा हाथ इसी कदर पकड़ा था जैसे ये मुझे खुद से अलग नहीं होने देंगे| मुझे डर लगने लगा की कहीं मैं इन्हें खो ना दूँ इसलिए मैं भी इनका हाथ उसी तरह दबा रही थी और मन ही मन कह रही थी की मैं आपको कुछ नहीं होने दूँगी| शायद इन्होने मेरे मन की बात पढ़ ली और ये थोड़ा relax होने लगे! डॉक्टर को भी इनका B.P. नार्मल होता हुआ दिखाई दिया और उन्होंने मेरी तरफ देख के कहा; "he’s alright…. I’ve given him an injection. I’ll call dr. sarita right now and tell her bout the good news.” इतना कह के वो बाहर जाने लगे, मैं उनसे बात करने बाहर जाना चाहती थी पर इन्होने मेरा हाथ नहीं छोड़ा| तो मैं भी इन्ही के सिराहने बैठ गई और इनके सर पर हाथ फेरने लगी| मेरी नजर घडी पर गई तो रात के दो बजे थे.... हाथ फेरते-फेरते कब नींद आई पता नहीं चली| करीब पौना घंटे बाद आँख खुली जब माँ-पिताजी और बच्चे आ गए| सब ने आकर हम दोनों को घेर लिया था|
मैंने दबी हुई आवाज में उन्हें सब बताया| ये सुन कर सब के चेहरों पर जो ख़ुशी झलकी उसे बताने के लिए मेरे पास शब्द नहीं| बच्चे चहक उठे .... बड़े सब भगवन को शुक्रिया करने लगे| माँ (सासु माँ) ने मेरे पास आकर मेरे सर पर हाथ रखा और "सदा सुहागन रहो" का आशीर्वाद दिया| नेहा बेड के दूसरी तरफ आई और अपने पापा के गाल पर kiss किया और मुस्कुराने लगी| आज इतने दिनों बाद उसके चेहरे पर मुस्कान देख के मेरा दिल भी भाव०विभोर हो था और मेरी आँख से भी आँसूं छलक आये|कमरे में सब मौजूद थे....पर अनिल कहीं दिख नहीं रहा था| मैंने माँ (सासु माँ) से पूछा की अनिल कहाँ है तो उन्होंने बताया की वो तो ट्रैन पकड़ के निकल गया! मैं हैरान थी की इतनी जल्दी उसे कौन सी ट्रैन मिल गई, माँ ने बताया की उसे "कर्नाटका एक्सप्रेस" वाली ट्रैन 09:30 बजे छूटने वाली थी| वो इतना उतावला था की बिना टिकट लिए ही चढ़ गया| मैंने माँ से कहा की वो अनिल को फोन कर दें और वो वापस आ जाए तो मेरे पिताजी मुझ पर बिगड़ गए; "बिलकुल नहीं! बहनजी जब तक मानु को पूरी तरह होश नहीं आता आप अनिल को फोन मत करें| वैसे भी वो बिना कुछ पता किये वापस नहीं आएगा|" मैं जानती थी की पिताजी को इनकी (मेरे पति की) बहुत चिंता है और वो कोई भी risk नहीं लेना चाहते| हाँ इनकी जगह अगर मैं बिस्तर पड़ी होती तो शायद वो ये risk ले भी लेते! पिताजी (ससुर जी) ने भी बहुत समझाया पर मेरे माँ-पिताजी इस बात पर अड़े रहे की वो अनिल को तब तक वापस नहीं बुलाएँगे जब तक इन्हें पूरी तरह होश नहीं आ जाता| वैसे भी एक बार जानकारी हासिल करने में कोई हर्ज नहीं... आखिर सासु माँ और ससुर जी मान गए|वो पूरी रात कोई नहीं सोया| सब जाग रहे थे और प्रार्थना कर रहे थे! सिर्फ एक आयुष था जो सो गया था.....अब वो था तो एक बच्चा ही! नेहा बेड के दूसरी तरफ कुर्सी ले कर बैठ गई थी और इनका दूसरा हाथ पकड़ के सहला रही थी| वो मन ही अं कुछ बुदबुदा रही थी .... मैं बस उसके होठों की थिरकन देखने लगी और कुछ देर बबाद एहसास हुआ की वो 'महामृत्युंजय मन्त्र' बोल रही थी और उसकी नजरें टकटकी बांधें अपने पापा को ही देख रही थी| नर्स 'राजी' इन्हें दुबारा चेक करे आई और मेरी तरफ मुस्कुरा कर हाँ में गर्दन हिलाई| मतलब की इकि तबियत में सुधार है! पांच बजे पिताजी सब के लिए चाय ले आये और तब तक ना मैंने इनका हाथ छोड़ा था और ना ही नेहा ने! हम दोनों में तो जैसे होड़ लगी थी की कौन इनसे ज्यादा प्यार करता है....देखा जाए तो नेहा ही ज्यादा प्यार करती थी!
एक जिंदगी के लिए कितने लोग दुआयें माँग रहे थे....ऐसा देवता जैसे पति है मेरे!
सुबह के नौ बजे थे, डॉक्टर सरिता भी आ चुकी थीं और सारे लोग कमरे में ही बैठे थे| डॉक्टर सरिता सब को क्या-क्या एहतियात बरतनी है उसके बारे में सब बता रही थी| उनके अनुसार तो अब कोई घबराने की बात नहीं थी| पर सब के दिलों को चैन तब मिलता जब वे इन्हें होश में देखते! जब इन्हें होश आया तो सब के सब फिर से हमें घेर कर खड़े हो गए! सबको अपने पास देख के इनके (मेरे पति के) चेहरे पर मुस्कान आई....हाय! क्या कातिल उस्काण थी वो! ऐसा लगा मानो एक अरसे बाद उनकी मुस्कान देख रही हूँ! इन्हें मुस्कुराता हुआ देख सबके दिल को इत्मीनान हुआ और मेरी माँ और सासु माँ ने इनकी नजर उतारी और भगवान को शुक्रिया अदा किया| नेहा तो बेड पर चढ़ गई और आके अपने पापा के गले लग गई और रोने लगी| रोते-रोते बोली; "i love you पापा" उसकी ये बात सुन कर ये अपने हमेशा वाले अंदाज में बोले; "awwwwwwww मेरा बच्चा!" ये सुनने के बाद ही नेहा के चेहरे पर मस्कान आई! हॉस्पिटल का बेड थोड़ा ऊँचा था तो आयुष उस पर चढ़ नहीं पा अहा था| वो भरसक प्रयास कर रहा था पर फिर ही छाड़ नहीं पा रहा था| अंत में उसे अपनने दादा जी को ही इशारा किया और बोला; "दादा जी...मुझे पापा ...." बस इसके आगे कुछ बोलने से पहले ही पिताजी ने उसे गोद में उठाया और उसके पापा की पास छोड़ दिया| वो घुटनों के बल छलके आया और नेहा के साथ साथ उसने भी अपने पापा को झप्पी डाल दी, पर वो रोया नहीं! बच्चों के गले लगने से इनका ध्यान उनपर चला गया और मेरा हाथ छूट गया| मैं उठ के डॉक्टर सरिता के पास चली गई जो ये सब देख कर काफी emotional हो गईं, चूँकि सबका ध्यान इनपर था तो किसी को उनके आँसूं नहीं दिखे| मैंने उन्हें दिल से थैंक्स बोला तो वो बस मुस्कुरा दीं|
आखिरकार जब सब ने हम दोनों को आशीर्वाद दे दिया तब सबसे पहला सवाल आयुष ने पूछा; आंटी हम पापा को घर कब ले जा सकते हैं?" उसक सवाल सं सब हँस पड़े थे| इतने दिनों बाद सबको हँसता देख मेरे दिल को थोड़ा सुकून आया| डॉक्टर सरिता ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया; "बेटा...दो-तीनं दिन अभी आपके पापा को यहाँ observation के लिए रुकना होगा| उसके बाद आप उन्हें ले जा सकते हो|" ये सुन के आयुष खुश हो गया और इधर-उधर नाचने लगा| उसका dance देख सब खुश हो गए और हँस पड़े| ख़ुशी का मौहाल बन चूका था ..... ये (मेरे पति) यही ज्यादा बात नहीं कर रहे थे| शरीर काफी कमजोर हो चूका था| बहत धीरे-धीरे बात कर रहे थे..... तभी माँ उठ के मेरे पास आईं और बोलीं; "बेटी अब तो घर चल... थोड़ा आराम कर ले... जब से मानु हॉस्पिटल आया है तो तब से घर नहीं गई|" ये सु कर इनके चेहरे पर परेशानी की शिकन पड़ने लगी और मैं इन्हें कतई परेशान नहीं करना चाहती थी तो मैं ने माँ की बात ये कह कर ताल दी; "माँ अब तो मैं इन्ही की साथ गृह-प्रवेश करुँगी|" ये सुन कर माँ हँस पड़ी और इनके हेहरे पर भी मुसस्काण आ गई| आयुष जो हमारे पास बेड पर बैठा था उसने मेरी बात को थोड़ा और मजाक में बदल दिया ये कह के; "दादी तो इस्सका मतलब की इस बार पापा चावल वाले लोटे को लात मार कर घर के नदर आयेगे?" उसके इस अचकन मजाक को सुन सभी जोर से हँस पड़े और कमरे में हंसी गूंजने लगी| एक परिवार जो तकरीबन बीस दिन से, मेरे कारन दुःख भोग रहा था वो आज... finally हँस रहा था अब भला मुझे इससे ज्यादा क्या चाहिए था!
8 years ago#48
सुबह के नौ बजे थे, डॉक्टर सरिता भी आ चुकी थीं और सारे लोग कमरे में ही बैठे थे| डॉक्टर सरिता सब को क्या-क्या एहतियात बरतनी है उसके बारे में सब बता रही थी| उनके अनुसार तो अब कोई घबराने की बात नहीं थी| पर सब के दिलों को चैन तब मिलता जब वे इन्हें होश में देखते! जब इन्हें होश आया तो सब के सब फिर से हमें घेर कर खड़े हो गए! सबको अपने पास देख के इनके (मेरे पति के) चेहरे पर मुस्कान आई....हाय! क्या कातिल उस्काण थी वो! ऐसा लगा मानो एक अरसे बाद उनकी मुस्कान देख रही हूँ! इन्हें मुस्कुराता हुआ देख सबके दिल को इत्मीनान हुआ और मेरी माँ और सासु माँ ने इनकी नजर उतारी और भगवान को शुक्रिया अदा किया| नेहा तो बेड पर चढ़ गई और आके अपने पापा के गले लग गई और रोने लगी| रोते-रोते बोली; "i love you पापा" उसकी ये बात सुन कर ये अपने हमेशा वाले अंदाज में बोले; "awwwwwwww मेरा बच्चा!" ये सुनने के बाद ही नेहा के चेहरे पर मस्कान आई! हॉस्पिटल का बेड थोड़ा ऊँचा था तो आयुष उस पर चढ़ नहीं पा अहा था| वो भरसक प्रयास कर रहा था पर फिर ही छाड़ नहीं पा रहा था| अंत में उसे अपनने दादा जी को ही इशारा किया और बोला; "दादा जी...मुझे पापा ...." बस इसके आगे कुछ बोलने से पहले ही पिताजी ने उसे गोद में उठाया और उसके पापा की पास छोड़ दिया| वो घुटनों के बल छलके आया और नेहा के साथ साथ उसने भी अपने पापा को झप्पी डाल दी, पर वो रोया नहीं! बच्चों के गले लगने से इनका ध्यान उनपर चला गया और मेरा हाथ छूट गया| मैं उठ के डॉक्टर सरिता के पास चली गई जो ये सब देख कर काफी emotional हो गईं, चूँकि सबका ध्यान इनपर था तो किसी को उनके आँसूं नहीं दिखे| मैंने उन्हें दिल से थैंक्स बोला तो वो बस मुस्कुरा दीं|
आखिरकार जब सब ने हम दोनों को आशीर्वाद दे दिया तब सबसे पहला सवाल आयुष ने पूछा; आंटी हम पापा को घर कब ले जा सकते हैं?" उसक सवाल सं सब हँस पड़े थे| इतने दिनों बाद सबको हँसता देख मेरे दिल को थोड़ा सुकून आया| डॉक्टर सरिता ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया; "बेटा...दो-तीनं दिन अभी आपके पापा को यहाँ observation के लिए रुकना होगा| उसके बाद आप उन्हें ले जा सकते हो|" ये सुन के आयुष खुश हो गया और इधर-उधर नाचने लगा| उसका dance देख सब खुश हो गए और हँस पड़े| ख़ुशी का मौहाल बन चूका था ..... ये (मेरे पति) यही ज्यादा बात नहीं कर रहे थे| शरीर काफी कमजोर हो चूका था| बहत धीरे-धीरे बात कर रहे थे..... तभी माँ उठ के मेरे पास आईं और बोलीं; "बेटी अब तो घर चल... थोड़ा आराम कर ले... जब से मानु हॉस्पिटल आया है तो तब से घर नहीं गई|" ये सु कर इनके चेहरे पर परेशानी की शिकन पड़ने लगी और मैं इन्हें कतई परेशान नहीं करना चाहती थी तो मैं ने माँ की बात ये कह कर ताल दी; "माँ अब तो मैं इन्ही की साथ गृह-प्रवेश करुँगी|" ये सुन कर माँ हँस पड़ी और इनके हेहरे पर भी मुसस्काण आ गई| आयुष जो हमारे पास बेड पर बैठा था उसने मेरी बात को थोड़ा और मजाक में बदल दिया ये कह के; "दादी तो इस्सका मतलब की इस बार पापा चावल वाले लोटे को लात मार कर घर के नदर आयेगे?" उसके इस अचकन मजाक को सुन सभी जोर से हँस पड़े और कमरे में हंसी गूंजने लगी| एक परिवार जो तकरीबन बीस दिन से, मेरे कारन दुःख भोग रहा था वो आज... finally हँस रहा था अब भला मुझे इससे ज्यादा क्या चाहिए था!
नेहा और आयुष इनके पास बैठे थे और सारे लोग भी वहीँ बैठे थे... तो मुझे इनसे बात करने का समय नहीं मिल रहा था| इधर नहा जिद्द करने लगी की वो तीन दिन तक स्कूल नहीं जायेगी और अपने पापा के पास ही रहेगी| सबने उसे प्यार से समझाया अपर वो नहीं मान रही थी..... इन्होने भी कोशिश की पर नेहा जिद्द पर अड़ गई! पिताजी (नेहा के नाना जी) को बहुत गुस्सा आया और उन्होंने उसे डाँट दिया| उनकी डाँट से वो सहम गई और अपने पापा के पास आके उनके गले लग गई और अपना मुँह उनके सीने में छुपा लिया| आखिर मुझे ही उसका पक्ष लेना पड़ा; "रहने दो ना पिताजी.... मेरी बेटी बहुत होशियार है! वो तीन दिन की पढ़ाई को बर्बाद नहीं जाने देगी! है ना नेहा?" तब जा कर नेहा ने मेरी तरफ देखा और हाँ में सर हिला के जवाब दिया| पर पिताजी के गुस्से का सामना मुझे करना पड़ा; "तू बहुत तरफदारी करने लगी है इसकी? सर पर चढ़ाती जा रही है इसे? मानु बेटा बीमार क्या पड़ा तुम दोनों ने अपनी मनमानी शुरू कर दी?" मेरी क्लास लगती देख इन्हें (मेरे पति) को भी बीच में आना पड़ा; "पिताजी........ ये मेरी लाड़ली है! " बस इतना सुन्ना था की पिताजी चुप हो गए और मैं भी हैरान उन्हें देखती रही की मेरी इतनी बड़ी दलील सुन्न के भी उन्हें संतोष नहीं मिला और इनके कहे सिर्फ पांच शब्द और पिताजी को तसल्ली हो गई? ऐसा प्रभाव था इनका पिताजी पर!
सबको इन पर बहुत प्यार आ रहा था... और ये सब देख के मुझे एक अजीब से सुख का आनंद मिल रहा था| अगले तीन दिन तक सब ने हमें एक पल का समय भी नहीं दिया की हम अकेले में कुछ बात कर सकें| अब तो रात को माँ (सासु माँ), मेरी माँ या बड़की अम्मा वहीँ रूकती| दिन में कभी पिताजी (ससुर जी) तो कभी मेरे पिताजी तो कभी अजय होता| अगले दिन तो अनिल भी आ गया था और उसेन आते ही इनके (मेरे पति के) पाँव छुए! हम दोनों (मैं और मेरे पति) अस एक दूसरे को देख के ही आहें भरते रहते थे... जब माँ (सासु माँ) होती तो मैं जा कर इनके सिराहने बैठ जाती और ये मेरा आठ पकड़ लेते और हम बिना कुछ बोले बस एक दूसरे की तरफ देखते रहते| जैसे मन ही मन एक दूसरे का हाल पूछ रहे हों! हम दोनों के मन ही मैं बहुत सी बातें थीं जो हम एक दूसरे से करना चाहते थे .... ओ मेरे मन में जो सबसे अदा सवाल था वो था की आखिर इन्होने मुझे "Sorry" क्यों बोला?
घर में ये सब से बात कर रहे थे .... जैसे सबसे बात करने के लिए इनके पास कोई न कोई topic हो! मेरे पिताजी (ससुर जी) से अपने काम के बारे में पूछते, माँ (सासु माँ) से उनके favorite serial C.I.D के बारे में पूछते, मेरे पिताजी से खेती-बाड़ी के बारे में पूछते, और मेरी माँ..... उन्हें तो इन्होने एक नै hobby की आदत डाल दी थी! वो थी "experimental cooking" ही..ही...ही... आय दिन माँ कुछ न कुछ अलग बनती रहती थी....!!! बड़की अम्मा और अजय से सबका हाल-चाल लेते रहते थे..... पर मुझसे ये सिर्फ और सिर्फ इशारों में ही बात करते थे|
अगले दिन की बात है नर्स राजी इन्हें चेक करे आईं थी तब उन्हें देख कर इनके मुख पर मुस्कान फ़ैल गई| दोनों ने बड़े अच्छे से "Hi" "Hello" की..... हाँ जब ये हंस कर उनसे बात करते तो मुझे बड़ा अजीब सा लगता था| अचानक मेरी नजर पिताजी (मेरे ससुर जी) पर पड़ी तो देखा वो इन्हें घूर के देख रहे थे| थोड़ा बहुत गुस्सा और जलन तो मुझे भी हो रही थी.... पर मैंने अपने भावों को किसी तरह छुपा लिया था| उस समय वहां केवल माँ (सासु माँ) और पिताजी (ससुर जी) थे, नर्स के जाने के बाद पिताजी ने इन्हें टोका| "तू बड़ा हँस-हँस के बात कर रहा था? बहु सामने है फिर भी?" उन्होंने गुस्सा नहीं किया था बस टोका भर था!
ये सुन कर इन्हें (मेरे पति को) हंसी आ गई! और तब माँ इनके बचाव में आ गेन और उन्होंने सारी confusion दूर की! माँ नर्स राजी को जानती थीं .... और मैंने कभी ध्यान नहं दिया पर जब भी नर्स माँ के सामने आती तो माँ उनसे बात करती| उस वक़्त मेरा ध्यान तो केवल इन पर था इसलिए मैंने कभी ध्यान नहीं दिया| दरअसल राजी इन्हीं की दोस्त थी! शादी से कुछ महीने पहले पिताजी को कुछ काम से शहर जाना पड़ा था| उन दिनों माँ की तबियत ठीक न होने के कारन नर्स राजी ने माँ की देखभाल की थी| पिताजी को ये बात पता नहीं थी क्योंकि लड़कियों के मामले में पिताजी ने इन पर (मेरे पति पर) हमेशा से लगाम राखी थी| उन्हें ये सब जरा भी पसंद नहीं था और वैसे में मेरे पति इतने सीधे थे की आजतक मेरे आलावा कभी किसी लड़की के चक्कर में पड़े ही नहीं| वैसे ये सब उस समय तो मैं हजम कर गई थी..... क्योंकि मेरी चिंता बस इन्हें घर ले जाने की थी! शाम तक अनिल भी आ गया था और आते ही उसने इनके पाँव छुए और फिर ये दोनों भी बातों में लग गए|
इधर इनकी आवाज सुनने के लिए मैं मरी जा रही थी| बस इनके मुंह से "जानू" ही तो सुन्ना चाहती थी! खेर discharge होने से पहले डॉक्टर इ सभी को हिदायत दी की इन्हें कोई भी mental shock नही दिया जाए| घर में ख़ुशी का माहोल हो और कोई भी टेंशन ना दी जाए| दवाइयों के बारे में मुझे और नेहा को सब कुछ समझा दिया गया था| शाम को सात बजे हम सब घर पहुंचे| घर पहुँच के माँ ने इनकी आरती उतारी और सब ने हाथ जोड़ कर प्रार्थना की| इनका शरीर अब भी कमजोर था तो मैं इन्हें अपने कमरे में ले आई और ये bedpost का सहारा ले कर बैठ गए| सब ने इन्हें घेर लिया और आस पड़ोस के लोग भी मिलने आये| मेरे पास टी चैन से बैठ कर इनके पास बातें करने का जरा भी मौका नहीं था| रात को खाना खाने के बाद सब अपने कमरे में चले गए| मेरे माँ-पिताजी आयुष और नेहा के कमरे में सोये थे और आयुष उन्ही के पास सोने वाला था| सोने में इन्हें कोई तकलीफ ना हो इसलिए नेहा आज माँ-पिताजी (सास-ससुर जी) के पास सोई थी| बड़की अम्मा और जय घर नहीं ठहरे थे वो हमारे किसी रिश्तेदार के यहाँ सोये थे| कारन ये था की दरअसल वो इसी बहाने से यहाँ आये थे की किसी रिश्तेदार से मिलने जा रहे हैं|
सब को अपने कमरे में जाते-जाते रात के दस बज गए थे| जब मैं कमरे में आई और मैंने लाइट जलाई तो देखा ये अभी भी जाग रहे थे| मेरे कुछ कहने से पहले ही ये बोल पड़े; "Sorry !!!" इनका Sorry सुन कर मन में जो सवाल था वो बाहर आ ही गया; "जब से आप को होश आया है तब से कई बार आप दबे होठों से मुझे Sorry बोल रहे हो? आखिर क्यों? गलती....." मेरे आगे कुछ बोलने से पहले ही ये बोल पड़े; "जान....Sorry इसलिए बोल रहा हूँ की उस दिन मैं उस कमीने बदजात की जान नहीं ले पाया! Sorry इसलिए बोल रहा हूँ की तुम्हारी वो दर्द भरी लेखनी पढ़ कर तुम्हारे दर्द को महसूस तो किया पर उस दर्द को कम करने के लिए कुछ नहीं कर पाया! Sorry इसलिए बोल रहा हूँ की इतने दिन तुमसे कोई बात नहीं की और तुम्हें तड़पाता रहा, वो भी ये जानते हुए की तुम माँ बनने वाली हो! Sorry इसलिए ............." उनके आगे बोलने से पहले मैंने उनकी बात काट दी! "पर आप की कोई गलती नहीं थी.... आप तो जी तोड़ कोशिश कर रहे थे की मैं हँसूँ-बोलूं पर एक मैं थी जो आपसे ....आपसे अपना दर्द छुपा रही थी| उनसे जो बिना किसी के बोले उसके दिल के दर्द को भांप जाते हैं..... आपने कुछ भी गलत नहीं किया| सब मेरी गलती है..... ना मैं आपको इस बच्चे के लिए force करती और ना..........” इतना सुन कर ही इन्हें बहुत गुस्सा आया और ये बड़े जोर से मुझ पर चिल्लाये; "For God sake stop blaming yourself for everything!” उनका गुस्सा देख कर तो मैं दहल गई और मुझे डर लगने लगा की कहीं इनकी तबियत फिर ख़राब न हो जाए! तभी नेहा जो की दरवाजे के पास कड़ी थी बोल पड़ी; "मम्मी....फिर से?" बस इतना कह कर वो अपने पापा के पास आई और उनसे लिपट गई और रोने लगी| इन्होने बहुत प्यार से उसे चुप कराया और फिर दोनों बाप-बेटी लेट गए| मैंने दरवाजा बंद किया, बत्ती बुझाई और मैं भी आ कर लेट गई| मैंने भी नेहा की कमर पर हाथ रखा पर कुछ देर बाद उसने मेरा हाथ हटा दिया....दुःख हुआ... पर चुप रही बस एक इत्मीनान था की कम से कम ये घर आ चुके हैं .... एक उम्मीद थी की ये अब जल्द से जल्द ठीक हो जायेंगे! इसी उम्मीद के साथ कब आँखें बंद हुई पता ही नहीं चला!
आखिरकार जब सब ने हम दोनों को आशीर्वाद दे दिया तब सबसे पहला सवाल आयुष ने पूछा; आंटी हम पापा को घर कब ले जा सकते हैं?" उसक सवाल सं सब हँस पड़े थे| इतने दिनों बाद सबको हँसता देख मेरे दिल को थोड़ा सुकून आया| डॉक्टर सरिता ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया; "बेटा...दो-तीनं दिन अभी आपके पापा को यहाँ observation के लिए रुकना होगा| उसके बाद आप उन्हें ले जा सकते हो|" ये सुन के आयुष खुश हो गया और इधर-उधर नाचने लगा| उसका dance देख सब खुश हो गए और हँस पड़े| ख़ुशी का मौहाल बन चूका था ..... ये (मेरे पति) यही ज्यादा बात नहीं कर रहे थे| शरीर काफी कमजोर हो चूका था| बहत धीरे-धीरे बात कर रहे थे..... तभी माँ उठ के मेरे पास आईं और बोलीं; "बेटी अब तो घर चल... थोड़ा आराम कर ले... जब से मानु हॉस्पिटल आया है तो तब से घर नहीं गई|" ये सु कर इनके चेहरे पर परेशानी की शिकन पड़ने लगी और मैं इन्हें कतई परेशान नहीं करना चाहती थी तो मैं ने माँ की बात ये कह कर ताल दी; "माँ अब तो मैं इन्ही की साथ गृह-प्रवेश करुँगी|" ये सुन कर माँ हँस पड़ी और इनके हेहरे पर भी मुसस्काण आ गई| आयुष जो हमारे पास बेड पर बैठा था उसने मेरी बात को थोड़ा और मजाक में बदल दिया ये कह के; "दादी तो इस्सका मतलब की इस बार पापा चावल वाले लोटे को लात मार कर घर के नदर आयेगे?" उसके इस अचकन मजाक को सुन सभी जोर से हँस पड़े और कमरे में हंसी गूंजने लगी| एक परिवार जो तकरीबन बीस दिन से, मेरे कारन दुःख भोग रहा था वो आज... finally हँस रहा था अब भला मुझे इससे ज्यादा क्या चाहिए था!
अब आगे.......
नेहा और आयुष इनके पास बैठे थे और सारे लोग भी वहीँ बैठे थे... तो मुझे इनसे बात करने का समय नहीं मिल रहा था| इधर नहा जिद्द करने लगी की वो तीन दिन तक स्कूल नहीं जायेगी और अपने पापा के पास ही रहेगी| सबने उसे प्यार से समझाया अपर वो नहीं मान रही थी..... इन्होने भी कोशिश की पर नेहा जिद्द पर अड़ गई! पिताजी (नेहा के नाना जी) को बहुत गुस्सा आया और उन्होंने उसे डाँट दिया| उनकी डाँट से वो सहम गई और अपने पापा के पास आके उनके गले लग गई और अपना मुँह उनके सीने में छुपा लिया| आखिर मुझे ही उसका पक्ष लेना पड़ा; "रहने दो ना पिताजी.... मेरी बेटी बहुत होशियार है! वो तीन दिन की पढ़ाई को बर्बाद नहीं जाने देगी! है ना नेहा?" तब जा कर नेहा ने मेरी तरफ देखा और हाँ में सर हिला के जवाब दिया| पर पिताजी के गुस्से का सामना मुझे करना पड़ा; "तू बहुत तरफदारी करने लगी है इसकी? सर पर चढ़ाती जा रही है इसे? मानु बेटा बीमार क्या पड़ा तुम दोनों ने अपनी मनमानी शुरू कर दी?" मेरी क्लास लगती देख इन्हें (मेरे पति) को भी बीच में आना पड़ा; "पिताजी........ ये मेरी लाड़ली है! " बस इतना सुन्ना था की पिताजी चुप हो गए और मैं भी हैरान उन्हें देखती रही की मेरी इतनी बड़ी दलील सुन्न के भी उन्हें संतोष नहीं मिला और इनके कहे सिर्फ पांच शब्द और पिताजी को तसल्ली हो गई? ऐसा प्रभाव था इनका पिताजी पर!
सबको इन पर बहुत प्यार आ रहा था... और ये सब देख के मुझे एक अजीब से सुख का आनंद मिल रहा था| अगले तीन दिन तक सब ने हमें एक पल का समय भी नहीं दिया की हम अकेले में कुछ बात कर सकें| अब तो रात को माँ (सासु माँ), मेरी माँ या बड़की अम्मा वहीँ रूकती| दिन में कभी पिताजी (ससुर जी) तो कभी मेरे पिताजी तो कभी अजय होता| अगले दिन तो अनिल भी आ गया था और उसेन आते ही इनके (मेरे पति के) पाँव छुए! हम दोनों (मैं और मेरे पति) अस एक दूसरे को देख के ही आहें भरते रहते थे... जब माँ (सासु माँ) होती तो मैं जा कर इनके सिराहने बैठ जाती और ये मेरा आठ पकड़ लेते और हम बिना कुछ बोले बस एक दूसरे की तरफ देखते रहते| जैसे मन ही मन एक दूसरे का हाल पूछ रहे हों! हम दोनों के मन ही मैं बहुत सी बातें थीं जो हम एक दूसरे से करना चाहते थे .... ओ मेरे मन में जो सबसे अदा सवाल था वो था की आखिर इन्होने मुझे "Sorry" क्यों बोला?
घर में ये सब से बात कर रहे थे .... जैसे सबसे बात करने के लिए इनके पास कोई न कोई topic हो! मेरे पिताजी (ससुर जी) से अपने काम के बारे में पूछते, माँ (सासु माँ) से उनके favorite serial C.I.D के बारे में पूछते, मेरे पिताजी से खेती-बाड़ी के बारे में पूछते, और मेरी माँ..... उन्हें तो इन्होने एक नै hobby की आदत डाल दी थी! वो थी "experimental cooking" ही..ही...ही... आय दिन माँ कुछ न कुछ अलग बनती रहती थी....!!! बड़की अम्मा और अजय से सबका हाल-चाल लेते रहते थे..... पर मुझसे ये सिर्फ और सिर्फ इशारों में ही बात करते थे|
अगले दिन की बात है नर्स राजी इन्हें चेक करे आईं थी तब उन्हें देख कर इनके मुख पर मुस्कान फ़ैल गई| दोनों ने बड़े अच्छे से "Hi" "Hello" की..... हाँ जब ये हंस कर उनसे बात करते तो मुझे बड़ा अजीब सा लगता था| अचानक मेरी नजर पिताजी (मेरे ससुर जी) पर पड़ी तो देखा वो इन्हें घूर के देख रहे थे| थोड़ा बहुत गुस्सा और जलन तो मुझे भी हो रही थी.... पर मैंने अपने भावों को किसी तरह छुपा लिया था| उस समय वहां केवल माँ (सासु माँ) और पिताजी (ससुर जी) थे, नर्स के जाने के बाद पिताजी ने इन्हें टोका| "तू बड़ा हँस-हँस के बात कर रहा था? बहु सामने है फिर भी?" उन्होंने गुस्सा नहीं किया था बस टोका भर था!
ये सुन कर इन्हें (मेरे पति को) हंसी आ गई! और तब माँ इनके बचाव में आ गेन और उन्होंने सारी confusion दूर की! माँ नर्स राजी को जानती थीं .... और मैंने कभी ध्यान नहं दिया पर जब भी नर्स माँ के सामने आती तो माँ उनसे बात करती| उस वक़्त मेरा ध्यान तो केवल इन पर था इसलिए मैंने कभी ध्यान नहीं दिया| दरअसल राजी इन्हीं की दोस्त थी! शादी से कुछ महीने पहले पिताजी को कुछ काम से शहर जाना पड़ा था| उन दिनों माँ की तबियत ठीक न होने के कारन नर्स राजी ने माँ की देखभाल की थी| पिताजी को ये बात पता नहीं थी क्योंकि लड़कियों के मामले में पिताजी ने इन पर (मेरे पति पर) हमेशा से लगाम राखी थी| उन्हें ये सब जरा भी पसंद नहीं था और वैसे में मेरे पति इतने सीधे थे की आजतक मेरे आलावा कभी किसी लड़की के चक्कर में पड़े ही नहीं| वैसे ये सब उस समय तो मैं हजम कर गई थी..... क्योंकि मेरी चिंता बस इन्हें घर ले जाने की थी! शाम तक अनिल भी आ गया था और आते ही उसने इनके पाँव छुए और फिर ये दोनों भी बातों में लग गए|
इधर इनकी आवाज सुनने के लिए मैं मरी जा रही थी| बस इनके मुंह से "जानू" ही तो सुन्ना चाहती थी! खेर discharge होने से पहले डॉक्टर इ सभी को हिदायत दी की इन्हें कोई भी mental shock नही दिया जाए| घर में ख़ुशी का माहोल हो और कोई भी टेंशन ना दी जाए| दवाइयों के बारे में मुझे और नेहा को सब कुछ समझा दिया गया था| शाम को सात बजे हम सब घर पहुंचे| घर पहुँच के माँ ने इनकी आरती उतारी और सब ने हाथ जोड़ कर प्रार्थना की| इनका शरीर अब भी कमजोर था तो मैं इन्हें अपने कमरे में ले आई और ये bedpost का सहारा ले कर बैठ गए| सब ने इन्हें घेर लिया और आस पड़ोस के लोग भी मिलने आये| मेरे पास टी चैन से बैठ कर इनके पास बातें करने का जरा भी मौका नहीं था| रात को खाना खाने के बाद सब अपने कमरे में चले गए| मेरे माँ-पिताजी आयुष और नेहा के कमरे में सोये थे और आयुष उन्ही के पास सोने वाला था| सोने में इन्हें कोई तकलीफ ना हो इसलिए नेहा आज माँ-पिताजी (सास-ससुर जी) के पास सोई थी| बड़की अम्मा और जय घर नहीं ठहरे थे वो हमारे किसी रिश्तेदार के यहाँ सोये थे| कारन ये था की दरअसल वो इसी बहाने से यहाँ आये थे की किसी रिश्तेदार से मिलने जा रहे हैं|
सब को अपने कमरे में जाते-जाते रात के दस बज गए थे| जब मैं कमरे में आई और मैंने लाइट जलाई तो देखा ये अभी भी जाग रहे थे| मेरे कुछ कहने से पहले ही ये बोल पड़े; "Sorry !!!" इनका Sorry सुन कर मन में जो सवाल था वो बाहर आ ही गया; "जब से आप को होश आया है तब से कई बार आप दबे होठों से मुझे Sorry बोल रहे हो? आखिर क्यों? गलती....." मेरे आगे कुछ बोलने से पहले ही ये बोल पड़े; "जान....Sorry इसलिए बोल रहा हूँ की उस दिन मैं उस कमीने बदजात की जान नहीं ले पाया! Sorry इसलिए बोल रहा हूँ की तुम्हारी वो दर्द भरी लेखनी पढ़ कर तुम्हारे दर्द को महसूस तो किया पर उस दर्द को कम करने के लिए कुछ नहीं कर पाया! Sorry इसलिए बोल रहा हूँ की इतने दिन तुमसे कोई बात नहीं की और तुम्हें तड़पाता रहा, वो भी ये जानते हुए की तुम माँ बनने वाली हो! Sorry इसलिए ............." उनके आगे बोलने से पहले मैंने उनकी बात काट दी! "पर आप की कोई गलती नहीं थी.... आप तो जी तोड़ कोशिश कर रहे थे की मैं हँसूँ-बोलूं पर एक मैं थी जो आपसे ....आपसे अपना दर्द छुपा रही थी| उनसे जो बिना किसी के बोले उसके दिल के दर्द को भांप जाते हैं..... आपने कुछ भी गलत नहीं किया| सब मेरी गलती है..... ना मैं आपको इस बच्चे के लिए force करती और ना..........” इतना सुन कर ही इन्हें बहुत गुस्सा आया और ये बड़े जोर से मुझ पर चिल्लाये; "For God sake stop blaming yourself for everything!” उनका गुस्सा देख कर तो मैं दहल गई और मुझे डर लगने लगा की कहीं इनकी तबियत फिर ख़राब न हो जाए! तभी नेहा जो की दरवाजे के पास कड़ी थी बोल पड़ी; "मम्मी....फिर से?" बस इतना कह कर वो अपने पापा के पास आई और उनसे लिपट गई और रोने लगी| इन्होने बहुत प्यार से उसे चुप कराया और फिर दोनों बाप-बेटी लेट गए| मैंने दरवाजा बंद किया, बत्ती बुझाई और मैं भी आ कर लेट गई| मैंने भी नेहा की कमर पर हाथ रखा पर कुछ देर बाद उसने मेरा हाथ हटा दिया....दुःख हुआ... पर चुप रही बस एक इत्मीनान था की कम से कम ये घर आ चुके हैं .... एक उम्मीद थी की ये अब जल्द से जल्द ठीक हो जायेंगे! इसी उम्मीद के साथ कब आँखें बंद हुई पता ही नहीं चला!
8 years ago#49
सब को अपने कमरे में जाते-जाते रात के दस बज गए थे| जब मैं कमरे में आई और मैंने लाइट जलाई तो देखा ये अभी भी जाग रहे थे| मेरे कुछ कहने से पहले ही ये बोल पड़े; "Sorry !!!" इनका Sorry सुन कर मन में जो सवाल था वो बाहर आ ही गया; "जब से आप को होश आया है तब से कई बार आप दबे होठों से मुझे Sorry बोल रहे हो? आखिर क्यों? गलती....." मेरे आगे कुछ बोलने से पहले ही ये बोल पड़े; "जान....Sorry इसलिए बोल रहा हूँ की उस दिन मैं उस कमीने बदजात की जान नहीं ले पाया! Sorry इसलिए बोल रहा हूँ की तुम्हारी वो दर्द भरी लेखनी पढ़ कर तुम्हारे दर्द को महसूस तो किया पर उस दर्द को कम करने के लिए कुछ नहीं कर पाया! Sorry इसलिए बोल रहा हूँ की इतने दिन तुमसे कोई बात नहीं की और तुम्हें तड़पाता रहा, वो भी ये जानते हुए की तुम माँ बनने वाली हो! Sorry इसलिए ............." उनके आगे बोलने से पहले मैंने उनकी बात काट दी! "पर आप की कोई गलती नहीं थी.... आप तो जी तोड़ कोशिश कर रहे थे की मैं हँसूँ-बोलूं पर एक मैं थी जो आपसे ....आपसे अपना दर्द छुपा रही थी| उनसे जो बिना किसी के बोले उसके दिल के दर्द को भांप जाते हैं..... आपने कुछ भी गलत नहीं किया| सब मेरी गलती है..... ना मैं आपको इस बच्चे के लिए force करती और ना..........” इतना सुन कर ही इन्हें बहुत गुस्सा आया और ये बड़े जोर से मुझ पर चिल्लाये; "For God sake stop blaming yourself for everything!” उनका गुस्सा देख कर तो मैं दहल गई और मुझे डर लगने लगा की कहीं इनकी तबियत फिर ख़राब न हो जाए! तभी नेहा जो की दरवाजे के पास कड़ी थी बोल पड़ी; "मम्मी....फिर से?" बस इतना कह कर वो अपने पापा के पास आई और उनसे लिपट गई और रोने लगी| इन्होने बहुत प्यार से उसे चुप कराया और फिर दोनों बाप-बेटी लेट गए| मैंने दरवाजा बंद किया, बत्ती बुझाई और मैं भी आ कर लेट गई| मैंने भी नेहा की कमर पर हाथ रखा पर कुछ देर बाद उसने मेरा हाथ हटा दिया....दुःख हुआ... पर चुप रही बस एक इत्मीनान था की कम से कम ये घर आ चुके हैं .... एक उम्मीद थी की ये अब जल्द से जल्द ठीक हो जायेंगे! इसी उम्मीद के साथ कब आँखें बंद हुई पता ही नहीं चला!
सुबह पाँच बजे मेरी आँख खुली तो महसूस किया की ये (मेरे पति) Bedpost का सहारा ले कर बैठे हैं, नेहा का सर इनकी गोद में है और ये मेरे सर पर हाथ फेर रहे थे| क्या सुखद एहसास था वो मेरे लिए..... मैं उठी तो इन्होने मुझे लेटे रहने के लिए बोला पर मैं नहीं मानी| मेरा मन किया की आज इन्हें सुबह वाली Good Morning Kiss दूँ पर मेरी 'माँ' नेहा जो वहाँ थी, वो भी एकदम से उठ गई, आखिर उसके स्कूल जाने का टाइम जो हो रहा था|
“Good Morning बेटा!" इन्होने उसके माथे को चूमते हुए कहा| जवाब में नेहा ने इनके गाल को चूमते हुए Good Morning कहा! पर जब इन्होने नेहा को तैयार होने के लिए कहा तो वो ना नुकुर करने लगी| मैं उसकी इस न-नुकुर का कारन जानती थी .... दरअसल उसे मुझपर भरोसा नहीं था| उसे लग रहा था की मैं कुछ न कुछ ऐसा करुँगी की इनकी तबियत फिर से ख़राब हो जाएगी|
पर इनका भी अपना स्टाइल है! जिसके आगे बच्चों और मेरी कतई नही चलती! इन्होने बहुत लाड-दुलार के बाद नेहा को स्कूल जाने के लिए मना लिया| पर उसने एक शर्त राखी; "Promise me पापा की आप किसी को गुस्सा नही करोगे फिर चाहे कोई आप को कितना भी provoke करे (ये उसने मेरी तरफ देखते हुए कहा|), आप टाइम से खाना खाओगे और टाइम से दवाई लोगे और हाँ proper rest करोगे|" ये सब सुनने के बाद मेरे और इनके चेहरे पर मुस्कराहट आ गई और इन्होने हँसते हुए जवाब दिया; "मेरी माँ! आप बस स्कूल जा रहे हो.... दूसरे continent नही जो इतनी साड़ी हिदायतें देकर जा रहे हो| और फिर यहाँ आपकी मम्मी हैं .... आपके दादा-दादी हैं...नाना-नानी हैं ... सब तो हैं यहाँ फिर आपको किस बात की चिंता? यहन कौन है जो मझे PROVOKE करेगा?" अब मुझे किसी भी हालत पर ये टॉपिक शुरू होने से बचाना था वरना मुझे पता था की नेहा की डाँट जर्रूर पड़ेगी तो मैंने कहा; "नेहा बीटा.... जल्दी से तैयार हो जाओ ...लेट हो रहा है|" जबकि उस समय सिर्फ साढ़े पाँच ही बजे थे!| बच्चे तो तैयार हो कर स्कूल चले गए इधर इन्होने मुझे बुला कर 'सभा' का फरमान दिया| जब बड़की अम्मा और अजय आ गए तो सबजने अपनी-अपनी चाय का कप थामे हमारे कमरे में आ गए और सब घेर कर बैठ गए| कमरे में हीटर की गर्माहट ने माहोल आरामदायक बना दिया था| ऐसा लग रहा था जैसे President of America Parliament को Address कर रहे हों| सब बड़ी उत्सुकता से इन्हें देख रहे थे| मैं भी हैरान थी की आखिर इन्हें कौन सी बात करनी है|
(आगे इन्होने जो बोला उसका एक-एक शब्द मैं जैसा का तैसा लिख रही हूँ!)
"मुझे आप सभी से कुछ कहना है................ मैं आप सभी से हाथ जोड़ कर क्षमा चाहता हूँ की मेरे कारन आप सभी को ये तकलीफ उठानी पड़ी!"
ये सुन कर सभी एक साथ बोल पड़े; "नहीं...नहीं... बेटा....ये तू क्या बोला रहा है ....." पर इन्होने ने अपनी बात जारी रखी ......
"मैं जानता हूँ की मेरी इस हालत का जिम्मेदार इन्होने (मेरी तरफ इशारा करते हुए) खुद को ही ठहराया होगा! ये इनकी आदत है...मेरी हर गलती का जिमेदार ये खुद को मानती हैं और मेरे सारे गम अपने सर लाद लेती हैं| जानता हूँ की ये हर जीवन साथी का ये फ़र्ज़ पर मैं नहीं चाहता की मेरी वजह से आप संगीता से नफरत करें....और उसे मेरी गलतियों की सजा दें! उस हादसे के बारे में सोच-सोच कर मेरा खून खौल ने लगा था.... दिल में आग लगी हुई थी.... बहुत गुस्सा आ रहा था मुझे| अपनी गुस्से की आग में मैं खुद ही जल रहा था| पता नहीं क्या ऊल-जुलूल हरकतें कर रहा था .... कभी दुबै जाने के बारे में सोच रहा था तो कभी कुछ... ऐसा लगा जैसे दिमाग ने सोचने समझने की ताकत ही खो दी थी| दवाइयाँ खाना बंद कर दिया और अपनी ये हालत बना ली! इसलिए मैं आप सभी से हाथ जोड़ के माफ़ी माँगता हूँ| और पिताजी (मेरे पिताजी) इन्होने मुझसे आपकी या किसी की भी शिकायत नहीं की! मैं जानता हूँ की सबसे ज्यादा आप मुझे प्यार करते हो तो सबसे ज्यादा डाँटा भी आपने ही होगा!"
ये सुन कर पिताजी कुछ नहीं बोले बस मुस्कुरा दिए| तभी इन्होने (मेरे पति) मुझे उनके (मेरे पिताजी) के पाँव छूने को कहा| मैंने उनके पाँव छुए और उन्होंने मुझे माफ़ करते हुए कहा; "खुश रहो बेटी!" मैं ने आगे बढ़ कर माँ (अपनी माँ) के पाँव छुए तो उन्होंने भी मुझे प्यार से आशीर्वाद दिया| जब मैं बड़की अम्मा के पास पहुंची और उनके पाँव छूने लगी तब ये बोले; "अम्मा....मैं जानता हूँ आपने संगीता को कुछ नहीं बोला होगा है ना?" अम्मा ने मुस्कुराते हुए मुझे आशीर्वाद दिया और कहा; "बेटा तू तो जानता ही है सब....मैं इसे कुछ कहती भी तो किस हक़ से!"
"क्यों अम्मा... आप मेरी बड़ी माँ हो आपका पूरा हक़ बनता है की आप हमें डांटें चाहे तो मार भी लो!" मैंने कहा|
"नहीं बेटी..... मेरे अपने खून की गलतियों के आगे मैं कुछ नहीं कह सकती|" अम्मा कहते हुए रो पड़ी तो माइन आगे बढ़ के उन्हें संभाला और कान में खुस-फुसा के कहा; "आप अगर रोओगे तो ये भी रो पड़ेंगे|" अम्मा ने अपने आँसूं पोछे और खुद को संभाला| मैं जानती थी की अम्मा की बात इन्हें कहीं न कहीं लगी अवश्य होगी.... आर मुझे कैसे भी अभी सब कुछ सम्भालना था|
"और माँ-पिताजी..... आप ने तो संगीता को नहीं कोसा ना?" इन्होने पूछा|
इसपर माँ (सासु माँ) बोली; "भई गलती तेरी..... तो भला हम अपनी बेटी को क्यों कोसेंगे? मुझे पता था की ये तेरी ही करतूत है और इल्जाम हमारी बेटी अपने सर ले रही है|" इस पर मेरे पिताजी ने इनका पक्ष लेते हुए मुस्कुरा कर कहा; "समधन जी ये आपने सही कही! हमारे ही लड़के में खोट है?" ये सुन कर सब हँसने लगे.....!!!
नाश्ते का समय हुआ तो सब बाहर बैठक में आ रहे थे तभी मेरे पिताजी आकर इनके पास बैठ गए और इनके कंधे पर हाथ रख कर बोले; "संगीता....तू सच में बहुत नसीब वाली है की तुझे ऐसा पति मिला जो तेरी साड़ी गलतियां अपने सर ले लेता है!"
"पर पिताजी...ऐसा कुछ नहीं है...गलती मेरी ही थी!" इन्होने फिर से अपनी बात दोहराई और तब तक मेरी माँ भी वहीँ आ कर कड़ी हो गईं|
"बेटा मेरे एक सवाल का जवाब दे, ऐसी कौन सी पत्नी होती है जो अपना दुःख-दर्द अपने ही पति से छुपाये?" पिताजी का सवाल सुनकर मुझे पता था की इनके पास कोई जवाब नहीं होगा पर हुआ इसका ठीक उल्टा ही! इन्होने बड़े तपाक से जवाब दिया; "वही पत्नी जो ये जानती है की उसका दुःख-दर्द सुन उसके पति की तबियत ख़राब हो जायेगी!" और ये कहते हुए उन्होंने मेरी माँ की तरफ देखा जैसे कह रहे हों की माँ आपने पिताजी से अनिल के हर्निया की बात छुपा कर कोई पाप नही किया| इस बार इनका जवाब सुन पिताजी चुप हो गए... और मुस्कुरा दिए और बोले; "बेटा तुझसे बातों में कोई नही जीत सकता! तेरे पास हर बात का जवाब है|" इतना कह कर पिताजी ने इनको आशीर्वाद दिया और बाहर बैठक में आ गए| आजतक ऐसे नहीं हुआ...कम से कम मेरे सामने तो कतई नही हुआ की कोई पिताजी को इस तरह चुप करा दे| पर मैं जानती थी की इनका प्रभाव पिताजी पर बहुत ज्यादा है! शायद ये इन्हीं का प्रभाव था की अब दोनों घरों में औरतें यानी मेरी माँ और सासु माँ बोलने लगीं थी!
ये सब देख मेरा दिल भर आया था ... मन तो किया की इनके सीने से लग कर रो पडूँ पर किसी तरह खुद को संभाला| इतने में अनिल आ गया और बोला; "दी... वो नाश्ते के लिए आपको बाहर बुला रहे हैं|" इतना कह कर वो बाहर चला गया| उसने आज भी मुझे दीदी की जगह 'दी....' कह के बुलाया था| मुझे बुरा तो लगा था पर मैं चुप यही पर इन्हें कुह शक हो गया| इन्होने मुझसे पूछा; "जब से अनिल आया है....तब से ये 'दी...' कह रहा है? ये का आजकल का trend है?" मैंने मुस्कुराते हुए कहा; "हाँ जी.... अब नई पीढ़ी है... शुक्र है दीदी का इसने 'दी...' कर दिया वरना मुझे तो लगा था की ये उसका कहीं 'DUDE' न बना दे...ही..ही..ही..ही.."
"अच्छा जी...ज़माना इतना बदल गया है? हम तो जैसे बूढ़े हो गए हैं!" इन्होने शिकायत की...शायद इन्हें शक हो गया था की मैं कुह बात छुपा रही हूँ| मैं बाहर आ कर नाश्ता बनाने में लग गई.... मैंने और इन्होने नाश्ता कमरे में ही किया क्योंकि वो कमरा काफी गर्म था और इनको exposure से खतरा था वरना जरा सी ठंडी हवा इन्हें लगी और हो गया इनका Sinus शुरू! घडी में करीब सवा बारह बजे होंगे, ससुर जी, अजय और पिताजी बाहर गए थे टहलने और माँ, सासु माँ और बड़की अम्मा अंदर कमरे में बैठीं बातें कर रहीं थी, की इन्होने मुझे कहा की अनिल को बुला दो| मैंने भी बिना कुछ सोचे उसे बुला दिया और मैं अपना काम करने लगी| तभी मेरे दिमाग में बिजली कौंधी और मैं भाग कर कमरे के पास आई और दरवाजे में कान लगा कर सुनने लगी|
"अनिल.... यार या तो तू थोड़ा मोडररन हो गया है या फिर बात कुछ और है?"
"मैं समझा नहीं जीजा जी?" अनिल ने असमंजस में पूछा|
"मैंने notice किया की तू आजकल अपनी दीदी को 'दी...' कह कर बुलाने लगा है! उसे तेरे मुंह से 'दीदी' सुन्ना अच्छा लगता है ना की 'दी...' उसके लिए ना सही कम से कम मेरे लिए ही उसे दीदी कह दिया कर?" इन्होने अनिल से request की वो भी सिर्फ मेरी ख़ुशी के लिए| अनिल चुप हो गया ....और मुझे पता था की ये उसकी चुप्पी जर्रूर पकड़ लेंगे|
"मतलब बात कुछ और है?" इन्होने उसके मन की बात भांप ली थी| आखिर अनिल ने शुरू से ले कर अंत तक की सारी बातें बता दी| मेरा दिल जोर से धड़कनें लगा था क्योंकि मुझे दर लगने लगा थी की कहीं इनकी तबियत फिर से ख़राब न हो जाए! पर इन्होने अनिल को समझाना शुरू किया; "यार ऐसा कुछ नहीं है.... तुझे लगता है की तेरी दीदी तुझे भूल गई? तुझे पता भी है की वो तेरे लिए रोज दुआ करती है, माँ-पिताजी की लम्बी आयु के लिए प्रार्थना करती है! शादी के बाद उसके ऊपर इस घर की भी जिम्मेदारी बढ़ गई है| तू तो जानता ही है की कितनी मुश्किल से ये सब संभला था...फिर स दिन वो सब.....She was emotionally broken ... तू सोच नहीं सकता की उस पर क्या बीती थी! वो बेचारी टूट गई थी.... बहुत घबरा गई थी... आयुष के लिए ... .उसे लगा था की हम आयुष को खो देंगे! घबरा चुकी थी ..... ऐसे में मैं भी उस पर दबाव बना रहा था की हँसो-बोलो ....तो वो और क्या करती? हम दोनों के बीच काफी तनाव आ चूका था.... देख मैं उसकी तरफ से माफ़ी माँगता हुँ!"
"जीजा जी आप माफ़ी क्यों माँग रहे हो.... उन्होंने मुझे नहीं पूछा कोई बात नहीं...वो Loan के बारे में भूल गईं कोई बात नही..... पर उनके कारन आपकी ये हालत हुई ये मुझसे बर्दाश्त नहीं होता! वो जानती हैं की आप उन से कितना प्यार करते हो और फिर भी आपसे ऐसा सलूक किया? मैं पूछता हूँ की गलती क्या थी आपकी? अगर आप दीदी की जगह होते और वो आपको हँसने-बोलने को कहतीं तो क्या आप उन्हीं पर बिगड़ जाते?" अनिल ने बड़े तर्क से उनसे बात की थी|
"नहीं...बिलकुल नहीं| पर अगर मुझे ये पता चलता की वो मुझे मेरे ही परिवार से अलग कर रही है वो भी सिर्फ मेरी तस्सल्ली भर के लिए तो हाँ मैं जर्रूर नाराज होता| उन्हें गुस्सा आया क्योंकि मैंने उन्हें इस परिवार से अलग करने की कोशिश की| मैं चाहता था की हम सब दुबई settle हो जाएं पर माँ-पिताजी ने जाने से मन कर दिया| हारकर मुझे ये तय करना पड़ा की मैं, आयुष, नेहा और संगीता ही दुबई जायेंगे| नौकरी तक ढूंढ ली थी| तो ऐसी बात पर किसी गुस्सा नहीं आएगा?"
"आपने ये सब उनके लिए किया था ना? अपने लिए तो नहीं? फिर?"
"देख भाई...अब या तो तू इस मुद्दे पर बहस कर ले या फिर लड़ाई कर ले....मेरे लिए She is always right!"
"देखा जीजा जी..... आपके लिए वो हमेशा सही हैं और उनके लिए आप गलत? क्या combination है! खेर आपके लिए मैं उन्हें माफ़ कर देता हूँ| पर मेरी एक शर्त है?"
"क्या?"
"आप मुझे बेटा कह कर बुलाओगे? जब दीदी मुझे बेटा कहती हैं तो मुझे अच्छा लगता है आखिर बड़ी बहन माँ सामान ही तो होती है और फिर इस हिसाब से आप तो पिता समा हुए|"
"ठीक है बेटा पर...तुझे अपनी दीदी को दिल से माफ़ करना होगा|" और उन्होंने मुझे आवाज दी और मैं एक दम से अंदर आ गई| मुझे देख के दोनों समझ गए की मैं उनकी सारी बातें सुन रही थी|मुझे देख कर अनिल खड़ा हुआ और बोला; "Sorry दीदी... मेरे बुरे बर्ताब के लिए मुझे माफ़ कर दो| मैं जीजा जी....." बस आगे बोलने से पहले वो रो पड़ा| मैंने उसे गले लगाया और सर पर हाथ फेरा| पर उसका रोना अभी कम नही हुआ था तो इन्होने मजाक में बोला; "बेटा जब माँ के गले लग कर रो लो तो इधर भी आ जाना, इधर भी खेती गीली कर देना|" उनकी बात सुन कर हम दोनों हंस पड़े और अनिल जा कर उनके गले लग गया| कूकर की सीटी बजी तो मं दौड़ी-दौड़ी बाहर आई और गैस बंद की| खाना लघभग बन चूका था और अनिल बच्चों को लेने जा चूका था| स्कूल से आते ही नेहा और आयुष भागे-भागे कमरे में आये और बस्ता पहने हुए ही दोनों आ कर अपने पापा के गले लग गए और उनका हाल-चाल पूछने लगे| काफी लाड-दुलार के बाद बच्चों ने उन्हें छोड़ा| ऐसा लगा जैसे बच्चों ने एक अरसे बाद अपने पापा को देखा हो| खेर अब खाने का समय हो चूका था तो बच्चे जिद्द करने लगे की हमें पापा के साथ खाना खाना है| पर मैंने इन्हें कमरे के अंदर रहने की सलाह दी थी, कारन दो; पहला की इस तरह हम दोनों को साथ रहने का थोड़ा समय मिलता था और दूसरा बाहर का कमरा बहुत ठंडा था और अंदर का कमरा गर्म! अब आप इसे मेरा selfish नेचर कहो या इनके लिए मेरी care!
मैं चाहती थी की पहले ये खाना खा लें पर इन्होने जिद्द की, कि पहले बड़ों को खिलाओ फिर हम दोनों साथ खाएंगे| शायद ये कुछ private पल इन्हें भी पसंद थे! खेर सब को खिलने के बाद मैं हम दोनों का खाना ले कर कमरे में आ गई| उस समय नेहा और आयुष अपने कमरे में पढ़ रहे थे| डॉक्टर साहिबा कि हिदायत थी कि इन्हें खाने के लिए खाना ऐसा दिया जाए जिसे शरीर आसानी से digest कर सके| अब ऐसा खाना स्वाद तो कतई नहीं होता| उस दिन घर पर राजमा बने थे जो इन्हें बहुत पसंद हैं| मुझे पता था कि इन्हें वो बेस्वाद खाना खाने में कितनी दिक्कत हो रही है, इलिये मैं एक कटोरी में उनके लिए राजमा ले आई| अभी मैंने उन्हें एक चम्मच खिलाया ही था कि नेहा कमरे में आ गई और मुझसे कटोरी छीन ली और बड़ी जोर से मुझ पर चिल्लाई; "मम्मी! फिर से पापा को बीमार करना चाहते हो? डॉक्टर आंटी ने मना किया है ना?" मुझे उस समय अपनी बेवकूफी याद आई और शर्म भी आई| शोर सुन आयुष भी अंदर आ गया और नेहा के हाथ से कटोरी छीन के कमरे में इधर-उधर भागने लगा| नेहा भी उसके पीछे भागने लगी.... मैं अपना मन मसोस कर रह गई! मुझे पता था कि इन्हें बहुत गुस्सा आ रहा होगा इसलिए मैंने बात संभाली; "आयुष...बेटा चोट लग जाएगी! नेहा आयुष से कटोरी ले कर किचन में रख आओ|” पता नहीं कैसे पर ये अपना गुस्सा control कर गए! खाना तो इन्होने खा लिया और कुछ देर बाद बोले; "नेहा को बुलाओ.... नहीं रुको... नेहा........|" इनकी एक ही आवाज में नेहा अंदर दौड़ी-दौड़ी आई| मुझे पता था कि आज उसकी क्लास लगने वाली है इसलिए मैं हूप-छाप बाहर जाने लगी वरना नेहा सोचती कि मैंने ही उसकी शिकायत की है| पर इन्होने मुझे रोक लिया और वहीँ बैठ जाने को कहा|
"नेहा...बेटा क्या बात है? आप अपनी मम्मी से बहुत बदतमीजी से पेश आ रहे हो आज कल? वो तो बस मेरे मुँह का टास्ते बदलना चाहती थी इसलिए उन्होंने मुझे राजमा खिलाये! आप तो उन पर ऐसे चिल्लाये जैसे उन्होंने मुझे जहर खिला दिया हो? क्या यही सब सिखाया है मैंने आपको? " ये सुन कर नेहा ने अपना सर झुका लिया और खामोश हो गई|
"इतना सब होने के बाद भी आप ने मम्मी को इतनी जल्दी माफ़ कर दिया?" नेहा ने सवाल पूछा|
"बेटा आपकी मम्मी की कोई गलती नहीं थी.... गलती मेरी थी|" ये सुन कर आखिर नेहा के अंदर दबा हुआ ज्वालामुखी फुट पड़ा और उसने अपने sorry से ले कर मेरे साथ हुई उसकी बात सब उन्हें सुना डाली| ये सब सुन कर इनका दिल भर आया पर फिर भी अपने आपको बहुत अच्छे से संभाल कर बोले; "बेटा आपकी मम्मी गलत नहीं हैं...उन्होंने कुछ नहीं किया? वो मुझसे बहुत प्यार करती हैं! आपसे भी ज्यादा .... मेरे अच्छे future के लिए उन्होंने मुझे खुद से दूर किया था, ताकि मैं अपनी जिंदगी में कुछ बन जाऊँ...... अपनी जिंदगी संवार सकूँ|"
"तो क्या वो बस एक बार आपसे पूछ नहीं सकती थीं? बिना आपसे कुछ पूछे ही उन्होंने अपना फैसला आपको सुना दिया? बिना किसी गलती के आपको सजा दे डाली| मैं जानती हूँ आप बाकियों की तरह नहीं जो अपनी जिम्मेदारियों को नहीं उठाते| मुझे पूरा विश्वास है की आप माँ और अपना career दोनों एक साथ संभाल लेते| क्यों उन्होंने ने मुझे आपसे दूर किया? क्या उन्हें पता नहीं था की आपके आलावा मुझे वहां पर प्यार करने वाला कोई नहीं था?" नेहा ने एक-एक शब्द वही बोला था जो इन्होने मुझसे उस दिन कहा था, इसलिए ये थोड़ा हैरान थे| इन्हें लगा की मैंने नेहा को सब बताया है पर तभी नेहा बोल पड़ी; "उस दिन जब मेरे लिए फ्रॉक लाये थे तब उस gift pack में सबसे ऊपर आपने चिप्स का पैकेट रखा था| मेरी इस पसंद के बारे में आपके इलावा कोई नहीं जानता इसलिए मजबूरन मैं आपसे पूछना चाहते थी की इतने साल आप मुझसे मिलने गाँव क्यों नहीं आये? पर तभी मैंने आपकी और माँ की बातें सुन ली|"
इन्होने बड़े इत्मीनान से नेहा से सवाल किया; "बेटा मेरा भी आपके लिए एक सवाल है? अगर आपको सर्दी-खाँसी हो जाए और डॉक्टर आपको हिदायत दे की आपको आयुष से दूर रहना है ताकि उसे ये infection ना हो जाए तो क्या आप तब भी उसके साथ खेलोगे?"
"बिलकुल नहीं|" नेहा ने जवाब दिया|
"पर क्यों? आपको तो मामूली सा सर्दी-जुखाम है! भला आयुष को सर्दी खाँसी के अलावा क्या होगा? दो-तीन दिन दवाई खायेगा और फिर ठीक हो जायेगा!"
"पर पापा इस बिमारी से उसे थोड़ा बहुत कष्ट तो होगा ही और वो दो-तीन दिन स्कूल नहीं जा पायेगा और उसकी पढ़ाई का नुक्सान होगा! और मैं उसकी बहन हूँ उसका बुरा कैसा चाहूँगी?"
ये थोड़ा सा मुस्कुराये और बोले; "बेटा आपने तो सर्दी-खाँसी जैसी मामूली बिमारी के चलते आयुष को खुद से दूर कर दिया और मेरे तो CBSE Boards के exam थे वो भी आयुष के पैदा होने के ठीक एक महीने बाद! अब बताओ इसमें आपकी मम्मी की क्या गलती? अगर आप मम्मी की जगह होते तो क्या आप अपने स्वार्थ के लिए मेरा एक साल बर्बाद होने देते?" ये सुन कर नेहा एक दम चुप हो गई|
"हाँ एक गलती आपकी मम्मी से हुई, वो ये की उन्हें मुझसे एक बार बात करनी चाहिए थी| मेरे exams मार्च में थे और मैं आप से मिलने अक्टूबर holidays में आ सकता था| और एक गलती मुझसे भी हुई... की मुझे आपकी मम्मी की बात का इतना बुरा नहीं मन्ना चाहिए था की मैं आपसे भी नाराज हो जाऊँ? इसलिए मैं आज आपको SORRY बोलता हूँ की मैंने आपसे भी इतना rude behave किया|
जिस माँ को आप नफरत करते हो आपको पता है की मेरे लिए उन्होंने कितनी कुर्बानी दी हैं? आपके नाना-नानी तक को छोड़ दिया सिर्फ मेरे लिए? आप बोलो क्या कभी आप ऐसा करोगे?" नेहा ने ना में सर हिलाया| उस की आँखें भर आईं थी पर वो सर झुकाये सब सुन रही थी|
"मैंने और आपकी मम्मी ने प्लान किया था की जब उनकी डिलीवरी होगी तब मैं उनके साथ रहूँगा पर मेरी पढ़ाई के लिए उन्होंने ये सब कुर्बान कर दिया और मुझे खुद से अलग कर दिया| पर आयुष के जीवन के वो '*" साल जो मैं नहीं देख पाया....जिन्हें मैं महसूस नहीं कर पाया...उसे गोद में नहीं खिला पाया .... उसका मेरी गोद में सुसु करना...ये सब मैंने miss कर दिया क्योंकि आपकी मम्मी की उस एक बात को मैंने अपने दिल से इस कदर लगा लिया था! उसी कारन आपकी मम्मी को ये बच्चा चाहिए था ताकि मैं उस सुख को भोग सकूँ! सिर्फ मेरे लिए ...वो ये बच्चा चाहती थीं! इससे ज्यादा कोई किसी के लिए क्या कर सकता है?" ये सब सुन नेहा खामोश हो गई थी उस की आँखें छलक आईं थीं.... "बेटा I guess you owe your mummy an apology?” बस ये सुन कर नेहा उठी और मेरे पाँव छुए और बोली; "sorry मम्मी... मैंने आपको बहुत गलत समझा| मुझे माफ़ कर दो प्लीज!" माने उस के सर पर हाथ फेरा और कहा; "its okay बेटा.... कोई बात नहीं!" फिर वो जा कर अपने पापा के गले लगी और रो पड़ी.... बहुत जोर से रोइ... इन्होने उसे बहुत प्यार किया और तब जा कर वो चुप हुई|
"अच्छा बेटा आप है ना ... छुप-छुप कर बातें मत सुना करो! bad manners! मैं आपसे कोई बात नहीं छुपाता ना?" इन्होने कहा|
"sorry पापा! आगे से ऐसा कुछ नहीं करुँगी|"
"और आप देवी जी (अर्थात मैं) आप भी जरा कम कान लगाया करो!" वो कुछ देर पहले मैंने इनकी और अनिल की बातें सुनी थी ये उसी के लिए था ही..ही..ही...
सब कुछ सामान्य हो गया था....पर अभी भी कुछ था जो छूट गया था..... रात को खाना खाने के बाद सभी हमारे कमरे में बैठे थे और हँसी-मजाक चल रहा था| तभी मेरे पिताजी ने अपने जाने की बात कही| उस समय इनके आठ में लैपटॉप था| जैसे ही पिताजी ने जाने की बात कही ये मुस्कुराये और बोले; "इतनी जल्दी जा रहे हो आप?"
तभी बीच में अनिल बोल पड़ा; "सारे जा रहे हैं जीजू!" दरअसल उसका भी मन नहीं था जाने का|
"हम्म्म..... ठीक है.... बेटा अपना मोबाइल चेक कर!" इन्होने अनिल से कहा| अनिल ने अपना मोबाइल चेक किया तो देख कर दंग रह गया और जोर से चिल्लाया; "पिताजी!!! जीजू ने फ्लाइट की टिकट्स बुक करा दी हैं!" ये सुन कर तो मैं भी चौंक गई... उस कमरे में बैठा हर कोई चौंक गया सिवाय इनके जो मंद-मंद मुस्कुराये जा रहे थे! बड़की अम्मा बोलीं; "मुन्ना ये क्या?"
"अम्मा.... माँ-पिताजी को तो हवाई यात्रा करा दी, अब बारी थी मेरी बड़ी माँ की और सास-ससुर की| अब ऐसा मौका दुबारा कहाँ मिलेगा?” इन्होने मुस्कुराते हुए कहा| अम्मा ने पिताजी (मेरे ससुर जी) की तरफ देखा ओ पिताजी बोले; "हभी.... आप ही का लड़का है ... अब मैं कैसे इसे मना करूँ! जो काम बाप ना कर सका वो बेटे ने कर दिया! शाबाश!"
"अरे समधी जी, हवाई जहाज की टिकट तो बहुत महंगी होती है!" मेरे पिताजी ने कहा|
"पर पिताजी आप सबसे महंगी तो नहीं?" इन्होने अपना तर्क दिया| सब ने बहुत कोशिश की पर ये टस से मस नहीं हुए| आखिर कर सब को फ्लाइट से ही जाना पड़ा| सब बहुत खुश थे .... बहुत-बहुत खुश| शायद ही मैंने कभी ऐसी ख़ुशी एक साथ सब के चेहरे पर देखि हो!
आज रात बड़की अम्मा और अजय यहीं ठहरने वाले थे.... सब के सोने का प्रबंध किसी तरह हो गया था| आयुष और नेहा आज सब के साथ सोये थे और finally हम दोनों आज रात अकेले थे| मैंने झट से दवाजा लॉक किया| आखिर वो पल आ ही गया जिसका मुझे बेसब्री से इन्तेजार था!
अब आगे ........
सुबह पाँच बजे मेरी आँख खुली तो महसूस किया की ये (मेरे पति) Bedpost का सहारा ले कर बैठे हैं, नेहा का सर इनकी गोद में है और ये मेरे सर पर हाथ फेर रहे थे| क्या सुखद एहसास था वो मेरे लिए..... मैं उठी तो इन्होने मुझे लेटे रहने के लिए बोला पर मैं नहीं मानी| मेरा मन किया की आज इन्हें सुबह वाली Good Morning Kiss दूँ पर मेरी 'माँ' नेहा जो वहाँ थी, वो भी एकदम से उठ गई, आखिर उसके स्कूल जाने का टाइम जो हो रहा था|
“Good Morning बेटा!" इन्होने उसके माथे को चूमते हुए कहा| जवाब में नेहा ने इनके गाल को चूमते हुए Good Morning कहा! पर जब इन्होने नेहा को तैयार होने के लिए कहा तो वो ना नुकुर करने लगी| मैं उसकी इस न-नुकुर का कारन जानती थी .... दरअसल उसे मुझपर भरोसा नहीं था| उसे लग रहा था की मैं कुछ न कुछ ऐसा करुँगी की इनकी तबियत फिर से ख़राब हो जाएगी|
पर इनका भी अपना स्टाइल है! जिसके आगे बच्चों और मेरी कतई नही चलती! इन्होने बहुत लाड-दुलार के बाद नेहा को स्कूल जाने के लिए मना लिया| पर उसने एक शर्त राखी; "Promise me पापा की आप किसी को गुस्सा नही करोगे फिर चाहे कोई आप को कितना भी provoke करे (ये उसने मेरी तरफ देखते हुए कहा|), आप टाइम से खाना खाओगे और टाइम से दवाई लोगे और हाँ proper rest करोगे|" ये सब सुनने के बाद मेरे और इनके चेहरे पर मुस्कराहट आ गई और इन्होने हँसते हुए जवाब दिया; "मेरी माँ! आप बस स्कूल जा रहे हो.... दूसरे continent नही जो इतनी साड़ी हिदायतें देकर जा रहे हो| और फिर यहाँ आपकी मम्मी हैं .... आपके दादा-दादी हैं...नाना-नानी हैं ... सब तो हैं यहाँ फिर आपको किस बात की चिंता? यहन कौन है जो मझे PROVOKE करेगा?" अब मुझे किसी भी हालत पर ये टॉपिक शुरू होने से बचाना था वरना मुझे पता था की नेहा की डाँट जर्रूर पड़ेगी तो मैंने कहा; "नेहा बीटा.... जल्दी से तैयार हो जाओ ...लेट हो रहा है|" जबकि उस समय सिर्फ साढ़े पाँच ही बजे थे!| बच्चे तो तैयार हो कर स्कूल चले गए इधर इन्होने मुझे बुला कर 'सभा' का फरमान दिया| जब बड़की अम्मा और अजय आ गए तो सबजने अपनी-अपनी चाय का कप थामे हमारे कमरे में आ गए और सब घेर कर बैठ गए| कमरे में हीटर की गर्माहट ने माहोल आरामदायक बना दिया था| ऐसा लग रहा था जैसे President of America Parliament को Address कर रहे हों| सब बड़ी उत्सुकता से इन्हें देख रहे थे| मैं भी हैरान थी की आखिर इन्हें कौन सी बात करनी है|
(आगे इन्होने जो बोला उसका एक-एक शब्द मैं जैसा का तैसा लिख रही हूँ!)
"मुझे आप सभी से कुछ कहना है................ मैं आप सभी से हाथ जोड़ कर क्षमा चाहता हूँ की मेरे कारन आप सभी को ये तकलीफ उठानी पड़ी!"
ये सुन कर सभी एक साथ बोल पड़े; "नहीं...नहीं... बेटा....ये तू क्या बोला रहा है ....." पर इन्होने ने अपनी बात जारी रखी ......
"मैं जानता हूँ की मेरी इस हालत का जिम्मेदार इन्होने (मेरी तरफ इशारा करते हुए) खुद को ही ठहराया होगा! ये इनकी आदत है...मेरी हर गलती का जिमेदार ये खुद को मानती हैं और मेरे सारे गम अपने सर लाद लेती हैं| जानता हूँ की ये हर जीवन साथी का ये फ़र्ज़ पर मैं नहीं चाहता की मेरी वजह से आप संगीता से नफरत करें....और उसे मेरी गलतियों की सजा दें! उस हादसे के बारे में सोच-सोच कर मेरा खून खौल ने लगा था.... दिल में आग लगी हुई थी.... बहुत गुस्सा आ रहा था मुझे| अपनी गुस्से की आग में मैं खुद ही जल रहा था| पता नहीं क्या ऊल-जुलूल हरकतें कर रहा था .... कभी दुबै जाने के बारे में सोच रहा था तो कभी कुछ... ऐसा लगा जैसे दिमाग ने सोचने समझने की ताकत ही खो दी थी| दवाइयाँ खाना बंद कर दिया और अपनी ये हालत बना ली! इसलिए मैं आप सभी से हाथ जोड़ के माफ़ी माँगता हूँ| और पिताजी (मेरे पिताजी) इन्होने मुझसे आपकी या किसी की भी शिकायत नहीं की! मैं जानता हूँ की सबसे ज्यादा आप मुझे प्यार करते हो तो सबसे ज्यादा डाँटा भी आपने ही होगा!"
ये सुन कर पिताजी कुछ नहीं बोले बस मुस्कुरा दिए| तभी इन्होने (मेरे पति) मुझे उनके (मेरे पिताजी) के पाँव छूने को कहा| मैंने उनके पाँव छुए और उन्होंने मुझे माफ़ करते हुए कहा; "खुश रहो बेटी!" मैं ने आगे बढ़ कर माँ (अपनी माँ) के पाँव छुए तो उन्होंने भी मुझे प्यार से आशीर्वाद दिया| जब मैं बड़की अम्मा के पास पहुंची और उनके पाँव छूने लगी तब ये बोले; "अम्मा....मैं जानता हूँ आपने संगीता को कुछ नहीं बोला होगा है ना?" अम्मा ने मुस्कुराते हुए मुझे आशीर्वाद दिया और कहा; "बेटा तू तो जानता ही है सब....मैं इसे कुछ कहती भी तो किस हक़ से!"
"क्यों अम्मा... आप मेरी बड़ी माँ हो आपका पूरा हक़ बनता है की आप हमें डांटें चाहे तो मार भी लो!" मैंने कहा|
"नहीं बेटी..... मेरे अपने खून की गलतियों के आगे मैं कुछ नहीं कह सकती|" अम्मा कहते हुए रो पड़ी तो माइन आगे बढ़ के उन्हें संभाला और कान में खुस-फुसा के कहा; "आप अगर रोओगे तो ये भी रो पड़ेंगे|" अम्मा ने अपने आँसूं पोछे और खुद को संभाला| मैं जानती थी की अम्मा की बात इन्हें कहीं न कहीं लगी अवश्य होगी.... आर मुझे कैसे भी अभी सब कुछ सम्भालना था|
"और माँ-पिताजी..... आप ने तो संगीता को नहीं कोसा ना?" इन्होने पूछा|
इसपर माँ (सासु माँ) बोली; "भई गलती तेरी..... तो भला हम अपनी बेटी को क्यों कोसेंगे? मुझे पता था की ये तेरी ही करतूत है और इल्जाम हमारी बेटी अपने सर ले रही है|" इस पर मेरे पिताजी ने इनका पक्ष लेते हुए मुस्कुरा कर कहा; "समधन जी ये आपने सही कही! हमारे ही लड़के में खोट है?" ये सुन कर सब हँसने लगे.....!!!
नाश्ते का समय हुआ तो सब बाहर बैठक में आ रहे थे तभी मेरे पिताजी आकर इनके पास बैठ गए और इनके कंधे पर हाथ रख कर बोले; "संगीता....तू सच में बहुत नसीब वाली है की तुझे ऐसा पति मिला जो तेरी साड़ी गलतियां अपने सर ले लेता है!"
"पर पिताजी...ऐसा कुछ नहीं है...गलती मेरी ही थी!" इन्होने फिर से अपनी बात दोहराई और तब तक मेरी माँ भी वहीँ आ कर कड़ी हो गईं|
"बेटा मेरे एक सवाल का जवाब दे, ऐसी कौन सी पत्नी होती है जो अपना दुःख-दर्द अपने ही पति से छुपाये?" पिताजी का सवाल सुनकर मुझे पता था की इनके पास कोई जवाब नहीं होगा पर हुआ इसका ठीक उल्टा ही! इन्होने बड़े तपाक से जवाब दिया; "वही पत्नी जो ये जानती है की उसका दुःख-दर्द सुन उसके पति की तबियत ख़राब हो जायेगी!" और ये कहते हुए उन्होंने मेरी माँ की तरफ देखा जैसे कह रहे हों की माँ आपने पिताजी से अनिल के हर्निया की बात छुपा कर कोई पाप नही किया| इस बार इनका जवाब सुन पिताजी चुप हो गए... और मुस्कुरा दिए और बोले; "बेटा तुझसे बातों में कोई नही जीत सकता! तेरे पास हर बात का जवाब है|" इतना कह कर पिताजी ने इनको आशीर्वाद दिया और बाहर बैठक में आ गए| आजतक ऐसे नहीं हुआ...कम से कम मेरे सामने तो कतई नही हुआ की कोई पिताजी को इस तरह चुप करा दे| पर मैं जानती थी की इनका प्रभाव पिताजी पर बहुत ज्यादा है! शायद ये इन्हीं का प्रभाव था की अब दोनों घरों में औरतें यानी मेरी माँ और सासु माँ बोलने लगीं थी!
ये सब देख मेरा दिल भर आया था ... मन तो किया की इनके सीने से लग कर रो पडूँ पर किसी तरह खुद को संभाला| इतने में अनिल आ गया और बोला; "दी... वो नाश्ते के लिए आपको बाहर बुला रहे हैं|" इतना कह कर वो बाहर चला गया| उसने आज भी मुझे दीदी की जगह 'दी....' कह के बुलाया था| मुझे बुरा तो लगा था पर मैं चुप यही पर इन्हें कुह शक हो गया| इन्होने मुझसे पूछा; "जब से अनिल आया है....तब से ये 'दी...' कह रहा है? ये का आजकल का trend है?" मैंने मुस्कुराते हुए कहा; "हाँ जी.... अब नई पीढ़ी है... शुक्र है दीदी का इसने 'दी...' कर दिया वरना मुझे तो लगा था की ये उसका कहीं 'DUDE' न बना दे...ही..ही..ही..ही.."
"अच्छा जी...ज़माना इतना बदल गया है? हम तो जैसे बूढ़े हो गए हैं!" इन्होने शिकायत की...शायद इन्हें शक हो गया था की मैं कुह बात छुपा रही हूँ| मैं बाहर आ कर नाश्ता बनाने में लग गई.... मैंने और इन्होने नाश्ता कमरे में ही किया क्योंकि वो कमरा काफी गर्म था और इनको exposure से खतरा था वरना जरा सी ठंडी हवा इन्हें लगी और हो गया इनका Sinus शुरू! घडी में करीब सवा बारह बजे होंगे, ससुर जी, अजय और पिताजी बाहर गए थे टहलने और माँ, सासु माँ और बड़की अम्मा अंदर कमरे में बैठीं बातें कर रहीं थी, की इन्होने मुझे कहा की अनिल को बुला दो| मैंने भी बिना कुछ सोचे उसे बुला दिया और मैं अपना काम करने लगी| तभी मेरे दिमाग में बिजली कौंधी और मैं भाग कर कमरे के पास आई और दरवाजे में कान लगा कर सुनने लगी|
"अनिल.... यार या तो तू थोड़ा मोडररन हो गया है या फिर बात कुछ और है?"
"मैं समझा नहीं जीजा जी?" अनिल ने असमंजस में पूछा|
"मैंने notice किया की तू आजकल अपनी दीदी को 'दी...' कह कर बुलाने लगा है! उसे तेरे मुंह से 'दीदी' सुन्ना अच्छा लगता है ना की 'दी...' उसके लिए ना सही कम से कम मेरे लिए ही उसे दीदी कह दिया कर?" इन्होने अनिल से request की वो भी सिर्फ मेरी ख़ुशी के लिए| अनिल चुप हो गया ....और मुझे पता था की ये उसकी चुप्पी जर्रूर पकड़ लेंगे|
"मतलब बात कुछ और है?" इन्होने उसके मन की बात भांप ली थी| आखिर अनिल ने शुरू से ले कर अंत तक की सारी बातें बता दी| मेरा दिल जोर से धड़कनें लगा था क्योंकि मुझे दर लगने लगा थी की कहीं इनकी तबियत फिर से ख़राब न हो जाए! पर इन्होने अनिल को समझाना शुरू किया; "यार ऐसा कुछ नहीं है.... तुझे लगता है की तेरी दीदी तुझे भूल गई? तुझे पता भी है की वो तेरे लिए रोज दुआ करती है, माँ-पिताजी की लम्बी आयु के लिए प्रार्थना करती है! शादी के बाद उसके ऊपर इस घर की भी जिम्मेदारी बढ़ गई है| तू तो जानता ही है की कितनी मुश्किल से ये सब संभला था...फिर स दिन वो सब.....She was emotionally broken ... तू सोच नहीं सकता की उस पर क्या बीती थी! वो बेचारी टूट गई थी.... बहुत घबरा गई थी... आयुष के लिए ... .उसे लगा था की हम आयुष को खो देंगे! घबरा चुकी थी ..... ऐसे में मैं भी उस पर दबाव बना रहा था की हँसो-बोलो ....तो वो और क्या करती? हम दोनों के बीच काफी तनाव आ चूका था.... देख मैं उसकी तरफ से माफ़ी माँगता हुँ!"
"जीजा जी आप माफ़ी क्यों माँग रहे हो.... उन्होंने मुझे नहीं पूछा कोई बात नहीं...वो Loan के बारे में भूल गईं कोई बात नही..... पर उनके कारन आपकी ये हालत हुई ये मुझसे बर्दाश्त नहीं होता! वो जानती हैं की आप उन से कितना प्यार करते हो और फिर भी आपसे ऐसा सलूक किया? मैं पूछता हूँ की गलती क्या थी आपकी? अगर आप दीदी की जगह होते और वो आपको हँसने-बोलने को कहतीं तो क्या आप उन्हीं पर बिगड़ जाते?" अनिल ने बड़े तर्क से उनसे बात की थी|
"नहीं...बिलकुल नहीं| पर अगर मुझे ये पता चलता की वो मुझे मेरे ही परिवार से अलग कर रही है वो भी सिर्फ मेरी तस्सल्ली भर के लिए तो हाँ मैं जर्रूर नाराज होता| उन्हें गुस्सा आया क्योंकि मैंने उन्हें इस परिवार से अलग करने की कोशिश की| मैं चाहता था की हम सब दुबई settle हो जाएं पर माँ-पिताजी ने जाने से मन कर दिया| हारकर मुझे ये तय करना पड़ा की मैं, आयुष, नेहा और संगीता ही दुबई जायेंगे| नौकरी तक ढूंढ ली थी| तो ऐसी बात पर किसी गुस्सा नहीं आएगा?"
"आपने ये सब उनके लिए किया था ना? अपने लिए तो नहीं? फिर?"
"देख भाई...अब या तो तू इस मुद्दे पर बहस कर ले या फिर लड़ाई कर ले....मेरे लिए She is always right!"
"देखा जीजा जी..... आपके लिए वो हमेशा सही हैं और उनके लिए आप गलत? क्या combination है! खेर आपके लिए मैं उन्हें माफ़ कर देता हूँ| पर मेरी एक शर्त है?"
"क्या?"
"आप मुझे बेटा कह कर बुलाओगे? जब दीदी मुझे बेटा कहती हैं तो मुझे अच्छा लगता है आखिर बड़ी बहन माँ सामान ही तो होती है और फिर इस हिसाब से आप तो पिता समा हुए|"
"ठीक है बेटा पर...तुझे अपनी दीदी को दिल से माफ़ करना होगा|" और उन्होंने मुझे आवाज दी और मैं एक दम से अंदर आ गई| मुझे देख के दोनों समझ गए की मैं उनकी सारी बातें सुन रही थी|मुझे देख कर अनिल खड़ा हुआ और बोला; "Sorry दीदी... मेरे बुरे बर्ताब के लिए मुझे माफ़ कर दो| मैं जीजा जी....." बस आगे बोलने से पहले वो रो पड़ा| मैंने उसे गले लगाया और सर पर हाथ फेरा| पर उसका रोना अभी कम नही हुआ था तो इन्होने मजाक में बोला; "बेटा जब माँ के गले लग कर रो लो तो इधर भी आ जाना, इधर भी खेती गीली कर देना|" उनकी बात सुन कर हम दोनों हंस पड़े और अनिल जा कर उनके गले लग गया| कूकर की सीटी बजी तो मं दौड़ी-दौड़ी बाहर आई और गैस बंद की| खाना लघभग बन चूका था और अनिल बच्चों को लेने जा चूका था| स्कूल से आते ही नेहा और आयुष भागे-भागे कमरे में आये और बस्ता पहने हुए ही दोनों आ कर अपने पापा के गले लग गए और उनका हाल-चाल पूछने लगे| काफी लाड-दुलार के बाद बच्चों ने उन्हें छोड़ा| ऐसा लगा जैसे बच्चों ने एक अरसे बाद अपने पापा को देखा हो| खेर अब खाने का समय हो चूका था तो बच्चे जिद्द करने लगे की हमें पापा के साथ खाना खाना है| पर मैंने इन्हें कमरे के अंदर रहने की सलाह दी थी, कारन दो; पहला की इस तरह हम दोनों को साथ रहने का थोड़ा समय मिलता था और दूसरा बाहर का कमरा बहुत ठंडा था और अंदर का कमरा गर्म! अब आप इसे मेरा selfish नेचर कहो या इनके लिए मेरी care!
मैं चाहती थी की पहले ये खाना खा लें पर इन्होने जिद्द की, कि पहले बड़ों को खिलाओ फिर हम दोनों साथ खाएंगे| शायद ये कुछ private पल इन्हें भी पसंद थे! खेर सब को खिलने के बाद मैं हम दोनों का खाना ले कर कमरे में आ गई| उस समय नेहा और आयुष अपने कमरे में पढ़ रहे थे| डॉक्टर साहिबा कि हिदायत थी कि इन्हें खाने के लिए खाना ऐसा दिया जाए जिसे शरीर आसानी से digest कर सके| अब ऐसा खाना स्वाद तो कतई नहीं होता| उस दिन घर पर राजमा बने थे जो इन्हें बहुत पसंद हैं| मुझे पता था कि इन्हें वो बेस्वाद खाना खाने में कितनी दिक्कत हो रही है, इलिये मैं एक कटोरी में उनके लिए राजमा ले आई| अभी मैंने उन्हें एक चम्मच खिलाया ही था कि नेहा कमरे में आ गई और मुझसे कटोरी छीन ली और बड़ी जोर से मुझ पर चिल्लाई; "मम्मी! फिर से पापा को बीमार करना चाहते हो? डॉक्टर आंटी ने मना किया है ना?" मुझे उस समय अपनी बेवकूफी याद आई और शर्म भी आई| शोर सुन आयुष भी अंदर आ गया और नेहा के हाथ से कटोरी छीन के कमरे में इधर-उधर भागने लगा| नेहा भी उसके पीछे भागने लगी.... मैं अपना मन मसोस कर रह गई! मुझे पता था कि इन्हें बहुत गुस्सा आ रहा होगा इसलिए मैंने बात संभाली; "आयुष...बेटा चोट लग जाएगी! नेहा आयुष से कटोरी ले कर किचन में रख आओ|” पता नहीं कैसे पर ये अपना गुस्सा control कर गए! खाना तो इन्होने खा लिया और कुछ देर बाद बोले; "नेहा को बुलाओ.... नहीं रुको... नेहा........|" इनकी एक ही आवाज में नेहा अंदर दौड़ी-दौड़ी आई| मुझे पता था कि आज उसकी क्लास लगने वाली है इसलिए मैं हूप-छाप बाहर जाने लगी वरना नेहा सोचती कि मैंने ही उसकी शिकायत की है| पर इन्होने मुझे रोक लिया और वहीँ बैठ जाने को कहा|
"नेहा...बेटा क्या बात है? आप अपनी मम्मी से बहुत बदतमीजी से पेश आ रहे हो आज कल? वो तो बस मेरे मुँह का टास्ते बदलना चाहती थी इसलिए उन्होंने मुझे राजमा खिलाये! आप तो उन पर ऐसे चिल्लाये जैसे उन्होंने मुझे जहर खिला दिया हो? क्या यही सब सिखाया है मैंने आपको? " ये सुन कर नेहा ने अपना सर झुका लिया और खामोश हो गई|
"इतना सब होने के बाद भी आप ने मम्मी को इतनी जल्दी माफ़ कर दिया?" नेहा ने सवाल पूछा|
"बेटा आपकी मम्मी की कोई गलती नहीं थी.... गलती मेरी थी|" ये सुन कर आखिर नेहा के अंदर दबा हुआ ज्वालामुखी फुट पड़ा और उसने अपने sorry से ले कर मेरे साथ हुई उसकी बात सब उन्हें सुना डाली| ये सब सुन कर इनका दिल भर आया पर फिर भी अपने आपको बहुत अच्छे से संभाल कर बोले; "बेटा आपकी मम्मी गलत नहीं हैं...उन्होंने कुछ नहीं किया? वो मुझसे बहुत प्यार करती हैं! आपसे भी ज्यादा .... मेरे अच्छे future के लिए उन्होंने मुझे खुद से दूर किया था, ताकि मैं अपनी जिंदगी में कुछ बन जाऊँ...... अपनी जिंदगी संवार सकूँ|"
"तो क्या वो बस एक बार आपसे पूछ नहीं सकती थीं? बिना आपसे कुछ पूछे ही उन्होंने अपना फैसला आपको सुना दिया? बिना किसी गलती के आपको सजा दे डाली| मैं जानती हूँ आप बाकियों की तरह नहीं जो अपनी जिम्मेदारियों को नहीं उठाते| मुझे पूरा विश्वास है की आप माँ और अपना career दोनों एक साथ संभाल लेते| क्यों उन्होंने ने मुझे आपसे दूर किया? क्या उन्हें पता नहीं था की आपके आलावा मुझे वहां पर प्यार करने वाला कोई नहीं था?" नेहा ने एक-एक शब्द वही बोला था जो इन्होने मुझसे उस दिन कहा था, इसलिए ये थोड़ा हैरान थे| इन्हें लगा की मैंने नेहा को सब बताया है पर तभी नेहा बोल पड़ी; "उस दिन जब मेरे लिए फ्रॉक लाये थे तब उस gift pack में सबसे ऊपर आपने चिप्स का पैकेट रखा था| मेरी इस पसंद के बारे में आपके इलावा कोई नहीं जानता इसलिए मजबूरन मैं आपसे पूछना चाहते थी की इतने साल आप मुझसे मिलने गाँव क्यों नहीं आये? पर तभी मैंने आपकी और माँ की बातें सुन ली|"
इन्होने बड़े इत्मीनान से नेहा से सवाल किया; "बेटा मेरा भी आपके लिए एक सवाल है? अगर आपको सर्दी-खाँसी हो जाए और डॉक्टर आपको हिदायत दे की आपको आयुष से दूर रहना है ताकि उसे ये infection ना हो जाए तो क्या आप तब भी उसके साथ खेलोगे?"
"बिलकुल नहीं|" नेहा ने जवाब दिया|
"पर क्यों? आपको तो मामूली सा सर्दी-जुखाम है! भला आयुष को सर्दी खाँसी के अलावा क्या होगा? दो-तीन दिन दवाई खायेगा और फिर ठीक हो जायेगा!"
"पर पापा इस बिमारी से उसे थोड़ा बहुत कष्ट तो होगा ही और वो दो-तीन दिन स्कूल नहीं जा पायेगा और उसकी पढ़ाई का नुक्सान होगा! और मैं उसकी बहन हूँ उसका बुरा कैसा चाहूँगी?"
ये थोड़ा सा मुस्कुराये और बोले; "बेटा आपने तो सर्दी-खाँसी जैसी मामूली बिमारी के चलते आयुष को खुद से दूर कर दिया और मेरे तो CBSE Boards के exam थे वो भी आयुष के पैदा होने के ठीक एक महीने बाद! अब बताओ इसमें आपकी मम्मी की क्या गलती? अगर आप मम्मी की जगह होते तो क्या आप अपने स्वार्थ के लिए मेरा एक साल बर्बाद होने देते?" ये सुन कर नेहा एक दम चुप हो गई|
"हाँ एक गलती आपकी मम्मी से हुई, वो ये की उन्हें मुझसे एक बार बात करनी चाहिए थी| मेरे exams मार्च में थे और मैं आप से मिलने अक्टूबर holidays में आ सकता था| और एक गलती मुझसे भी हुई... की मुझे आपकी मम्मी की बात का इतना बुरा नहीं मन्ना चाहिए था की मैं आपसे भी नाराज हो जाऊँ? इसलिए मैं आज आपको SORRY बोलता हूँ की मैंने आपसे भी इतना rude behave किया|
जिस माँ को आप नफरत करते हो आपको पता है की मेरे लिए उन्होंने कितनी कुर्बानी दी हैं? आपके नाना-नानी तक को छोड़ दिया सिर्फ मेरे लिए? आप बोलो क्या कभी आप ऐसा करोगे?" नेहा ने ना में सर हिलाया| उस की आँखें भर आईं थी पर वो सर झुकाये सब सुन रही थी|
"मैंने और आपकी मम्मी ने प्लान किया था की जब उनकी डिलीवरी होगी तब मैं उनके साथ रहूँगा पर मेरी पढ़ाई के लिए उन्होंने ये सब कुर्बान कर दिया और मुझे खुद से अलग कर दिया| पर आयुष के जीवन के वो '*" साल जो मैं नहीं देख पाया....जिन्हें मैं महसूस नहीं कर पाया...उसे गोद में नहीं खिला पाया .... उसका मेरी गोद में सुसु करना...ये सब मैंने miss कर दिया क्योंकि आपकी मम्मी की उस एक बात को मैंने अपने दिल से इस कदर लगा लिया था! उसी कारन आपकी मम्मी को ये बच्चा चाहिए था ताकि मैं उस सुख को भोग सकूँ! सिर्फ मेरे लिए ...वो ये बच्चा चाहती थीं! इससे ज्यादा कोई किसी के लिए क्या कर सकता है?" ये सब सुन नेहा खामोश हो गई थी उस की आँखें छलक आईं थीं.... "बेटा I guess you owe your mummy an apology?” बस ये सुन कर नेहा उठी और मेरे पाँव छुए और बोली; "sorry मम्मी... मैंने आपको बहुत गलत समझा| मुझे माफ़ कर दो प्लीज!" माने उस के सर पर हाथ फेरा और कहा; "its okay बेटा.... कोई बात नहीं!" फिर वो जा कर अपने पापा के गले लगी और रो पड़ी.... बहुत जोर से रोइ... इन्होने उसे बहुत प्यार किया और तब जा कर वो चुप हुई|
"अच्छा बेटा आप है ना ... छुप-छुप कर बातें मत सुना करो! bad manners! मैं आपसे कोई बात नहीं छुपाता ना?" इन्होने कहा|
"sorry पापा! आगे से ऐसा कुछ नहीं करुँगी|"
"और आप देवी जी (अर्थात मैं) आप भी जरा कम कान लगाया करो!" वो कुछ देर पहले मैंने इनकी और अनिल की बातें सुनी थी ये उसी के लिए था ही..ही..ही...
सब कुछ सामान्य हो गया था....पर अभी भी कुछ था जो छूट गया था..... रात को खाना खाने के बाद सभी हमारे कमरे में बैठे थे और हँसी-मजाक चल रहा था| तभी मेरे पिताजी ने अपने जाने की बात कही| उस समय इनके आठ में लैपटॉप था| जैसे ही पिताजी ने जाने की बात कही ये मुस्कुराये और बोले; "इतनी जल्दी जा रहे हो आप?"
तभी बीच में अनिल बोल पड़ा; "सारे जा रहे हैं जीजू!" दरअसल उसका भी मन नहीं था जाने का|
"हम्म्म..... ठीक है.... बेटा अपना मोबाइल चेक कर!" इन्होने अनिल से कहा| अनिल ने अपना मोबाइल चेक किया तो देख कर दंग रह गया और जोर से चिल्लाया; "पिताजी!!! जीजू ने फ्लाइट की टिकट्स बुक करा दी हैं!" ये सुन कर तो मैं भी चौंक गई... उस कमरे में बैठा हर कोई चौंक गया सिवाय इनके जो मंद-मंद मुस्कुराये जा रहे थे! बड़की अम्मा बोलीं; "मुन्ना ये क्या?"
"अम्मा.... माँ-पिताजी को तो हवाई यात्रा करा दी, अब बारी थी मेरी बड़ी माँ की और सास-ससुर की| अब ऐसा मौका दुबारा कहाँ मिलेगा?” इन्होने मुस्कुराते हुए कहा| अम्मा ने पिताजी (मेरे ससुर जी) की तरफ देखा ओ पिताजी बोले; "हभी.... आप ही का लड़का है ... अब मैं कैसे इसे मना करूँ! जो काम बाप ना कर सका वो बेटे ने कर दिया! शाबाश!"
"अरे समधी जी, हवाई जहाज की टिकट तो बहुत महंगी होती है!" मेरे पिताजी ने कहा|
"पर पिताजी आप सबसे महंगी तो नहीं?" इन्होने अपना तर्क दिया| सब ने बहुत कोशिश की पर ये टस से मस नहीं हुए| आखिर कर सब को फ्लाइट से ही जाना पड़ा| सब बहुत खुश थे .... बहुत-बहुत खुश| शायद ही मैंने कभी ऐसी ख़ुशी एक साथ सब के चेहरे पर देखि हो!
आज रात बड़की अम्मा और अजय यहीं ठहरने वाले थे.... सब के सोने का प्रबंध किसी तरह हो गया था| आयुष और नेहा आज सब के साथ सोये थे और finally हम दोनों आज रात अकेले थे| मैंने झट से दवाजा लॉक किया| आखिर वो पल आ ही गया जिसका मुझे बेसब्री से इन्तेजार था!
8 years ago#50
अनिल ने अपना मोबाइल चेक किया तो देख कर दंग रह गया और जोर से चिल्लाया; "पिताजी!!! जीजू ने फ्लाइट की टिकट्स बुक करा दी हैं!" ये सुन कर तो मैं भी चौंक गई... उस कमरे में बैठा हर कोई चौंक गया सिवाय इनके जो मंद-मंद मुस्कुराये जा रहे थे! बड़की अम्मा बोलीं; "मुन्ना ये क्या?"
"अम्मा.... माँ-पिताजी को तो हवाई यात्रा करा दी, अब बारी थी मेरी बड़ी माँ की और सास-ससुर की| अब ऐसा मौका दुबारा कहाँ मिलेगा?” इन्होने मुस्कुराते हुए कहा| अम्मा ने पिताजी (मेरे ससुर जी) की तरफ देखा ओ पिताजी बोले; "हभी.... आप ही का लड़का है ... अब मैं कैसे इसे मना करूँ! जो काम बाप ना कर सका वो बेटे ने कर दिया! शाबाश!"
"अरे समधी जी, हवाई जहाज की टिकट तो बहुत महंगी होती है!" मेरे पिताजी ने कहा|
"पर पिताजी आप सबसे महंगी तो नहीं?" इन्होने अपना तर्क दिया| सब ने बहुत कोशिश की पर ये टस से मस नहीं हुए| आखिर कर सब को फ्लाइट से ही जाना पड़ा| सब बहुत खुश थे .... बहुत-बहुत खुश| शायद ही मैंने कभी ऐसी ख़ुशी एक साथ सब के चेहरे पर देखि हो!
आज रात बड़की अम्मा और अजय यहीं ठहरने वाले थे.... सब के सोने का प्रबंध किसी तरह हो गया था| आयुष और नेहा आज सब के साथ सोये थे और finally हम दोनों आज रात अकेले थे| मैंने झट से दवाजा लॉक किया| आखिर वो पल आ ही गया जिसका मुझे बेसब्री से इन्तेजार था!
अब आगे......
जैसे ही मैं दरवाजा लॉक कर के पलटी तो ये बाथरूम से निकल रहे थे| पता नहीं मुझे क्या हुआ मैं इनकी तरफ बढ़ी और जा कर इनके गले लग गई| वो प्यास जो मुझे अंदर ही अंदर खाए जा रही थी मुझ पर हावी हो चुकी थी|इन्होने मुझे कस के गले लगा लिया ... वो इनके बाजुओं की ताकत वो एहसास..... इनके जिस्म की वो तपिश जो मुझे जला के राख कर देना चाहती थी.....और मैं खुद इस अग्नि के लिए मरी जा रही थी....
"finally ..... " बस इतना ही कह पाई| कुछ देर के लिए मैं सब भूल चुकी थी... बस उनकी बाहों में ही सिमटी रहना चाहती थी! जब एहसास हुआ की ये अभी तक पूरी तरह स्वस्थ नहीं हैं तो मैंने इनसे अलग होना चाहा पर इन्होने मुझे अपनी गिरफ्त से आजाद नहीं किया बल्कि और जोर से भींच लिया! अगले पल इन्होने मुझे अपनी गोद में उठा लिया और पलंग पर ला कर लिटा दिया| मैं जानती थी की इनका शरीर अभी भी कमजोर है पता नहीं कैसे इनमें इतनी ताकत आ गई थी! मेरे चेहरे पर चिंता की रेखाएं इन्होने देख ली और मुस्कुराते हुए बोले; "जान मुझे कुछ नहीं हुआ|" इतना कह कर ये bedpost का सहारा ले कर बैठ गए और मैं इनके कंधे पर सर रख कर बैठ गई|
"तुम्हें पता है, जब मुझे होश आया तो ये आँखें खुल ही नहीं रहीं थीं... लग रहा था की मैं तुम्हें कभी देख ही नहीं पाउँगा! बस तुम्हारे हाथ का वो स्पर्श मुझे महसूस हुआ.... फिर तुम्हारी आवाज सुनाई दी.... दिल को थोड़ा सकूँ मिला की कम से कम तुम मेरे पास तो हो! अपनी जिस्म की पूरी ताकत झोंक कर मैंने आँखें खोलीं और तुम्हें देख कर लगा जैसे सालों बाद तुम्हें देख रहा हूँ! वो तड़प..... मैं बयान नहीं कर सकता!"
"श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श...." मैंने उनके होंठों पर ऊँगली रख कर न्हें खामोश कर दिया| मैं उनके वो दुःख भरे लम्हे उन्हें फिर से याद नहीं दिलाना चाहती थी|
"मुझे आपको thank you कहना था!"
"thank you? किस लिए?" उन्होंने पूछा|
"आपने मुझे मेरी खोई हुई इज्जत...मान-सम्मान वापस दिलाया| आज मेरे पिताजी मुझे जब देख रहे थे तो उन्हें वही गर्व महसूस हो रहा था, जो पहले होता था| माँ ने मुझे आशीर्वाद दिया तो उसी प्यार के साथ जैसे पहले दिया करती थी| अनिल मुझे फिर से 'दीदी' कहने लगा और नेहा की आँखों मुझे वही माँ वाला प्यार नजर आता है! सब आपकी वजह से....."
"मैंने कुछ भी नहीं किया! गलती तुम्हारी थी जो तुमने मेरी गलतियाँ छुपाने के लिए खुद को ढाल बना दिया| यार आपने मुझे जो मेल भेजा था उसे मैंने पढ़ा ... सच कहूँ मुझे उस दिन आपके असली जज्बात का अंदाजा हुआ.... इसके बारे में आपसे बात करनी चाही पर आप नाराज थे....फिर उस दिन सुबह आपके दुःख और तकलीफ को महसूस कर मैं खुद को कोसता रहा की मन अपनी पत्नी की रक्षा नहीं कर सका....अपने बच्चों की देख-रेख नहीं कर सकता...... काश मैंने उसे उस दिन जान से मार दिया होता तो ये दिन नहीं देखना पड़ता!"
"अगर आप उसके गंदे खून से अपने हाथ गंदे कर लेते तो मेरा क्या होता? बच्चों का क्या होता? आप तो हम से दूर हो जाते... कैसे जीते हम सब आपके बिना? मैं जानती हूँ की आप मुझसे इतना प्यार करते हो की मेरी गलती कभी नहीं मानोगे.... देखा जाए तो सब मेरी गलती थी...." मेरे आगे बोलने से पहले इन्होने मेरी बात काटी; "बिलकुल नहीं...." पर इस बार मैंने इनकी एक नहीं चलने दी| मुझे इन्हें एहसास कराना था की गलती मेरी थी ना की इनकी| इन्होने तो मेरे लिए कितना कुछ किया.....
"आज आपको मेरी बात सुन्नी ही होगी.... आप को लगता है की गलती आपकी है पर ऐसा कतई नहीं है| मेरी सबसे बड़ी गलती की मैंने आपसे अपना गम छुपाया ...आपसे .... अपने पति परमेश्वर से! जिसे मैं इतना प्यार करती हूँ.... जो मेरे लिए अपनी जान देने से भी नहीं चुकेगा उससे मैंने अपने दिल का हाल छुपाया| अगर मैं गलत नहीं तो .... आपको मेरे दिल की हालत का अंदाजा था| आप जानते थे की मैं अंदर से कैसा महसूस कर रही हूँ पर फिर भी आपने हार नहीं मानी...मुझे हँसाने-बुलाने की कोशिश करते रहे| पर एक मैं ही थी जो खुद को आपसे अलग कर बैठी थी वो भी सिर्फ इसलिए की ये सब मेरी गलती थी| जो की सच है.... मेरी ख़ुशी के लिए आप ये देश छोड़ के बाहर सेटल होना चाहते थे ... सिर्फ मेरे लिए! अपने माँ-पिताजी से भी अलग होने को तैयार हो गए...सिर्फ मेरे लिए! इससे बड़ी क़ुरबानी की मैं आपसे उम्मीद नहीं कर सकती| मुझे बिना बताये आप मेरे परिवार की मदद करते रहे ... आपको पता है पिताजी आपको अपने सभी बच्चों से ज्यादा प्यार करते हैं और ये मेरे लिए कितनी गर्व की बात है| जहाँ कुछ महीने पहले उन्हें इस रिश्ते से चिड़ थी वहीँ आज वो आपको इतना मान-सम्मान देते हैं| फिर भी धिक्कार है मुझ पर जो मैंने आपसे इस तरह बोलना-चालना बंद कर दिया| नेहा ने सही कहा था... I don’t deserve you! ………… im sorry…. ना मैं वो सब लिखती और ना ही आपकी ये हालत होती|” मेरे मन में अभी तक जो बात दबी हुई थी वो आज सब फुट कर बाहर आ गई थी और साथ ही मेरे आँसूं भी बह निकले थे| उन्होंने कुछ कहा नहीं बस मुझे कस कर अपने सीने से लगा लिया और मैं उनके सीने में सर रखे बैठी रही| मेरे आँसूं थम चुके थे... अंदर जितनी भी ग्लानि थी वो अब नहीं थी| कुछ देर बाद वो बोले; "जानू.... I LOVE YOU!" इतने समय बाद इनके मुँह से ये सुन कर अच्छा लगा ... मन प्रसन्न हो गया| "गलती दोनों की थी... okay? matter finish!" कितनी आसानी से उन्होंने मेरे साड़ी गलतियाँ अपने साथ बाँट ली थीं| सच! मुझे लगता है की मैं कभी इन्हें समझ ही नहीं पाऊँगी! अब नींद दोनों को ही आ रही थी.... पर मैं आज का मौका गँवाना नहीं चाहती थी| ये पीठ के बल लेते थे, मैंने इनके दहीं हाथ को सीधा किया और उसे अपना तकिया बनाते हुए इनसे लिपट गई| इन्होने दोनों के ऊपर रजाई डाली और फिर मेरी तरफ करवट ले कर लेट गए| इनके होंठ मेरे मस्तक को छू रहे थे और मैं वो तपिश अपने मस्तक पर महसूस कर पा रही थी| सच एक अरसे बाद हम इस तरह सो रहे थे! रात को करीब तीन बजे मैंने एक भयानक सपना देखा...जिसके बारे में लिखने में भी मुझे दर लगा रहा है और मैं बुरी तरह घबरा गई और चौंक कर उठ गई| मेरे साथ-साथ इनकी भी आँख खुल गई और इन्हें पता चला गया की मैंने कोई भयानक सपना देखा है| ये बोले; "hey ... मैं यहीं हूँ... !" और मैं फिर से इनके सीने से आ लगी और आँख से आँसूं बह निकले| इन्होने मेरे आँसूं पोछे और मुझे इतना कस के अपने सीने से लगाया की मुझे इनकी और इन्हें मेरे दिल की जोरदार धड़कन सुनाई देने लगी थी| हम फिर से लेट गए पर नींद नहीं आ रही थी…. ना मुझे और ना इन्हें ....
करीब एक घंटे बाद दरवाजे पर दस्तक हुई..... पहले तो हम दोनों डर गए क्योंकि इतनी देर रात दस्तक होना किसी अच्छी चीज की निशानी तो नहीं थी| मैं उठने लगी तो इन्होने मुझे रोक दिया और खुद दरवाजा खोला| दरवाजा खोलते ही नेहा आकर इनके पैरों में लिपट गई और रोने लगी| उसे रोता देख मैं भी झट से उठ गई और तब तक इन्होने उसे गोद में उठा लिया था और उसे पुचकारने लगे| "awwwwww मेरा बच्चा क्या हुआ? फिर से बुरा सपना देखा?.... बस...बस... रोते नहीं... बस.... पापा हैं ना यहाँ|" ये उसे गोद में ले कर घूमने लगे जैसे किसी नन्हें बच्चे को चुप कराया जाता है| मेरी नजर दुबारा दरवाजे पर गई तो देखा मेरी माँ कड़ी थीं और इन्हें इस तरह नेहा को पुचकारता हुआ देख हँस रही थीं| "अब समझ आया की नेहा मानु बेटे से इतना प्यार क्यों करती है! खेर माफ़ करना बेटा पर अचानक से नेहा चौंक कर उठ गई और पापा का कर रोने लगी| तुमने अभी तक किसिस डॉक्टर को इसे नहीं दिखाया?"
मैंने जवाब देने के लिए मुँह खोला ही था की ये बोल पड़े; "नहीं माँ...नेहा को कोई बीमारी नहीं है| वो बस मुझसे बहुत प्यार करती है ना की उसे मेरे बिना नींद नहीं आती|" पता नहीं कैसे पर एह की आँख लग गई थी या कम से कम हमें तो यही लगा था|
"पर बेटे...अभी तुम जवान हो.... और अगर इस तरह ये तुम दोनों से....मतलब.... तुम दोनों को नही तो कुछ समय मिलना चाहिए?" माँ ने कहा और मेरी तरह आप लोग भी उनकी बात समझ ही गए होंगे| हम दोनों के पास इसका कोई जवाब नहीं था और हम दोनों बस एक दूसरे की ओर देख रहे थे.... थोड़ा awkward moment था .... तभी माँ को भी हमारी दशा समझ आ गई और वो बोलीं; "अच्छा बेटा ... नेहा तो सो गई ... अब आप दोनों भी सो जाओ|" और इतना कह कर माँ चली गईं| मैंने दरवाजा बंद किया और देखा तो ये पीठ के बल सीधा लेटे हुए थे ओर नेहा इनकी छाती पर चिपकी हुई थी| मेरे लिए इन्होने अपनी दायीं बाह को खोल रखा था ताकि मैं उसे अपना तकिया बना के लेट जाऊँ| इसलिए मैं भी बिस्तर में घुसी और उनके biceps को अपना तकिया बना कर इनसे लिपट गई| मेरा डायन हाथ नेहा की पीठ पर था और मैं उसे सहला रही थी| करीब आधे घंटे बाद दोनों की आँख लग गई|
सुबह ग्यारह बजे सबकी फ्लाइट थी तो मैं करीब पाँच बजे उठ गई और नहा धो कर रसोई में पहुँच गई| आज ठण्ड ज्यादा थी और रात भर मेरी और नेहा की वजह से इनकी नींद पूरी नहीं हुई थी इसलिए सबब बैठक में बैठे थे और सब वहीँ चाय पी रहे थे| सात बजे करीब नेहा उठ कर बाहर आई तो मुझे लगा की अब ये भी उठ गए होंगे| इसलिए मैं अपनी और इनकी चाय ले कर कमरे में आ गई और मेरे पीछे-पीछे बड़की अम्मा भी आ गईं| उनके हाथ में एक झोला था और चेहरे पर मुस्कान| "बेटा.... तूने मेरी कोख से जनम क्यों नहीं लिया?" ये कहते हुए अम्मा ने इनके सर पर हाथ रख दिया|
"अम्मा.... सिर्फ जन्म लेने से कोई बेटा बन जाता है?" इन्होने जवाब दिया|
"हम्म.... मेरे बच्चे जिन्होंने मुझे कभी रेल से यात्रा नहीं कराई और तू मुझे हवाई जहाज से यात्रा करा रहा है! जुग-जुग जिओ ... दूधो नहाओ पुतो फलों!" अम्मा ने इन्हें आशीर्वाद दिया|
"अच्छा अम्मा...एक बात थी! बुरा न मानो तो एक बात कहूँ?" इन्होने जिझकते हुए कहा|
"पूछ बेटा|"
"अम्मा जब आप आये थे उस इन आप आयुष से तो गले मिल लिए थे पर आपका ध्यान नेहा पर नहीं गया....वो बेचारी आपके पाँव छू कर ही रह गई| मैं जानता हूँ आप उसे भी प्यार करते हो पर....." इन्होने बात पूरी नहीं की|
"नेहा....बेटी इधर तो आ|" अम्मा ने नेहा को आवाज लगाईं| नेहा सामने आ कर खड़ी हो गई| अम्मा ने अपना हाथ झोले में डाला और गुलाबी कागज में बंधा हुआ कुछ निकला और उसे खोलने लगी| जब उन्होंने उसे खोला तो उसमें चाँदी की पायल निकली| बहुत खूबसूरत थी....
उन्होंने वो पायल नेहा को दी और उसका माथा चूम कर बोलीं; "ये मेरी बेटी के लिए.... वैसे ये थी तो तेरी माँ के लिए पर उससे ज्यादा तेरे पाँव पर जचेगी! और मुझे माफ़ कर दे बेटी उस दिन मैं ने सच में तुझ पर ध्यान नहीं दिया| तेरे पापा की तबियत के बारे में सुन कर मैं बहुत परेशान थी... सॉरी (sorry)!"
नेहा ये सुनते ही अम्मा से लिपट गई और बोली; "सॉरी नहीं sorry ... और अम्मा माँ ने मुझे समझा दिया था... its okay!" पता नहीं अम्मा को क्या समझ आया पर उन्होंने फिर से लड़खड़ाते हुए कहा; "टहंक ऊ" ये सं कर हम सब की हँसी छूट गई और नेहा ने उन्हें फिर से बताया की; "अम्मा thank you होता है!" ये सुन का र अम्मा के मुंह पर बी मुस्कान आ गई| खेर सब क जाने का समय नजदीक आ रहा था| पिताजी (ससुर जी) ने Innova taxi मँगवाई थी और वे खुद सबको छोड़ने T3 जा रहे थे| मेरे लाख मन करने पर भी ये उठ के बहार बैठक में आ गए और सभी के पाँव छुए और उन्हें विदा किया| सबने जाते हुए इन्हें बहुत-बहुत आशीर्वाद दिए| सबके जाने के बाद घर में बस मैं, माँ, नेहा और ये ही रह गए थे| जैसे ही ये अपने कमरे में आये इन्हें sinus का अटैक शुरू हो गया!
"अम्मा.... माँ-पिताजी को तो हवाई यात्रा करा दी, अब बारी थी मेरी बड़ी माँ की और सास-ससुर की| अब ऐसा मौका दुबारा कहाँ मिलेगा?” इन्होने मुस्कुराते हुए कहा| अम्मा ने पिताजी (मेरे ससुर जी) की तरफ देखा ओ पिताजी बोले; "हभी.... आप ही का लड़का है ... अब मैं कैसे इसे मना करूँ! जो काम बाप ना कर सका वो बेटे ने कर दिया! शाबाश!"
"अरे समधी जी, हवाई जहाज की टिकट तो बहुत महंगी होती है!" मेरे पिताजी ने कहा|
"पर पिताजी आप सबसे महंगी तो नहीं?" इन्होने अपना तर्क दिया| सब ने बहुत कोशिश की पर ये टस से मस नहीं हुए| आखिर कर सब को फ्लाइट से ही जाना पड़ा| सब बहुत खुश थे .... बहुत-बहुत खुश| शायद ही मैंने कभी ऐसी ख़ुशी एक साथ सब के चेहरे पर देखि हो!
आज रात बड़की अम्मा और अजय यहीं ठहरने वाले थे.... सब के सोने का प्रबंध किसी तरह हो गया था| आयुष और नेहा आज सब के साथ सोये थे और finally हम दोनों आज रात अकेले थे| मैंने झट से दवाजा लॉक किया| आखिर वो पल आ ही गया जिसका मुझे बेसब्री से इन्तेजार था!
अब आगे......
जैसे ही मैं दरवाजा लॉक कर के पलटी तो ये बाथरूम से निकल रहे थे| पता नहीं मुझे क्या हुआ मैं इनकी तरफ बढ़ी और जा कर इनके गले लग गई| वो प्यास जो मुझे अंदर ही अंदर खाए जा रही थी मुझ पर हावी हो चुकी थी|इन्होने मुझे कस के गले लगा लिया ... वो इनके बाजुओं की ताकत वो एहसास..... इनके जिस्म की वो तपिश जो मुझे जला के राख कर देना चाहती थी.....और मैं खुद इस अग्नि के लिए मरी जा रही थी....
"finally ..... " बस इतना ही कह पाई| कुछ देर के लिए मैं सब भूल चुकी थी... बस उनकी बाहों में ही सिमटी रहना चाहती थी! जब एहसास हुआ की ये अभी तक पूरी तरह स्वस्थ नहीं हैं तो मैंने इनसे अलग होना चाहा पर इन्होने मुझे अपनी गिरफ्त से आजाद नहीं किया बल्कि और जोर से भींच लिया! अगले पल इन्होने मुझे अपनी गोद में उठा लिया और पलंग पर ला कर लिटा दिया| मैं जानती थी की इनका शरीर अभी भी कमजोर है पता नहीं कैसे इनमें इतनी ताकत आ गई थी! मेरे चेहरे पर चिंता की रेखाएं इन्होने देख ली और मुस्कुराते हुए बोले; "जान मुझे कुछ नहीं हुआ|" इतना कह कर ये bedpost का सहारा ले कर बैठ गए और मैं इनके कंधे पर सर रख कर बैठ गई|
"तुम्हें पता है, जब मुझे होश आया तो ये आँखें खुल ही नहीं रहीं थीं... लग रहा था की मैं तुम्हें कभी देख ही नहीं पाउँगा! बस तुम्हारे हाथ का वो स्पर्श मुझे महसूस हुआ.... फिर तुम्हारी आवाज सुनाई दी.... दिल को थोड़ा सकूँ मिला की कम से कम तुम मेरे पास तो हो! अपनी जिस्म की पूरी ताकत झोंक कर मैंने आँखें खोलीं और तुम्हें देख कर लगा जैसे सालों बाद तुम्हें देख रहा हूँ! वो तड़प..... मैं बयान नहीं कर सकता!"
"श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श...." मैंने उनके होंठों पर ऊँगली रख कर न्हें खामोश कर दिया| मैं उनके वो दुःख भरे लम्हे उन्हें फिर से याद नहीं दिलाना चाहती थी|
"मुझे आपको thank you कहना था!"
"thank you? किस लिए?" उन्होंने पूछा|
"आपने मुझे मेरी खोई हुई इज्जत...मान-सम्मान वापस दिलाया| आज मेरे पिताजी मुझे जब देख रहे थे तो उन्हें वही गर्व महसूस हो रहा था, जो पहले होता था| माँ ने मुझे आशीर्वाद दिया तो उसी प्यार के साथ जैसे पहले दिया करती थी| अनिल मुझे फिर से 'दीदी' कहने लगा और नेहा की आँखों मुझे वही माँ वाला प्यार नजर आता है! सब आपकी वजह से....."
"मैंने कुछ भी नहीं किया! गलती तुम्हारी थी जो तुमने मेरी गलतियाँ छुपाने के लिए खुद को ढाल बना दिया| यार आपने मुझे जो मेल भेजा था उसे मैंने पढ़ा ... सच कहूँ मुझे उस दिन आपके असली जज्बात का अंदाजा हुआ.... इसके बारे में आपसे बात करनी चाही पर आप नाराज थे....फिर उस दिन सुबह आपके दुःख और तकलीफ को महसूस कर मैं खुद को कोसता रहा की मन अपनी पत्नी की रक्षा नहीं कर सका....अपने बच्चों की देख-रेख नहीं कर सकता...... काश मैंने उसे उस दिन जान से मार दिया होता तो ये दिन नहीं देखना पड़ता!"
"अगर आप उसके गंदे खून से अपने हाथ गंदे कर लेते तो मेरा क्या होता? बच्चों का क्या होता? आप तो हम से दूर हो जाते... कैसे जीते हम सब आपके बिना? मैं जानती हूँ की आप मुझसे इतना प्यार करते हो की मेरी गलती कभी नहीं मानोगे.... देखा जाए तो सब मेरी गलती थी...." मेरे आगे बोलने से पहले इन्होने मेरी बात काटी; "बिलकुल नहीं...." पर इस बार मैंने इनकी एक नहीं चलने दी| मुझे इन्हें एहसास कराना था की गलती मेरी थी ना की इनकी| इन्होने तो मेरे लिए कितना कुछ किया.....
"आज आपको मेरी बात सुन्नी ही होगी.... आप को लगता है की गलती आपकी है पर ऐसा कतई नहीं है| मेरी सबसे बड़ी गलती की मैंने आपसे अपना गम छुपाया ...आपसे .... अपने पति परमेश्वर से! जिसे मैं इतना प्यार करती हूँ.... जो मेरे लिए अपनी जान देने से भी नहीं चुकेगा उससे मैंने अपने दिल का हाल छुपाया| अगर मैं गलत नहीं तो .... आपको मेरे दिल की हालत का अंदाजा था| आप जानते थे की मैं अंदर से कैसा महसूस कर रही हूँ पर फिर भी आपने हार नहीं मानी...मुझे हँसाने-बुलाने की कोशिश करते रहे| पर एक मैं ही थी जो खुद को आपसे अलग कर बैठी थी वो भी सिर्फ इसलिए की ये सब मेरी गलती थी| जो की सच है.... मेरी ख़ुशी के लिए आप ये देश छोड़ के बाहर सेटल होना चाहते थे ... सिर्फ मेरे लिए! अपने माँ-पिताजी से भी अलग होने को तैयार हो गए...सिर्फ मेरे लिए! इससे बड़ी क़ुरबानी की मैं आपसे उम्मीद नहीं कर सकती| मुझे बिना बताये आप मेरे परिवार की मदद करते रहे ... आपको पता है पिताजी आपको अपने सभी बच्चों से ज्यादा प्यार करते हैं और ये मेरे लिए कितनी गर्व की बात है| जहाँ कुछ महीने पहले उन्हें इस रिश्ते से चिड़ थी वहीँ आज वो आपको इतना मान-सम्मान देते हैं| फिर भी धिक्कार है मुझ पर जो मैंने आपसे इस तरह बोलना-चालना बंद कर दिया| नेहा ने सही कहा था... I don’t deserve you! ………… im sorry…. ना मैं वो सब लिखती और ना ही आपकी ये हालत होती|” मेरे मन में अभी तक जो बात दबी हुई थी वो आज सब फुट कर बाहर आ गई थी और साथ ही मेरे आँसूं भी बह निकले थे| उन्होंने कुछ कहा नहीं बस मुझे कस कर अपने सीने से लगा लिया और मैं उनके सीने में सर रखे बैठी रही| मेरे आँसूं थम चुके थे... अंदर जितनी भी ग्लानि थी वो अब नहीं थी| कुछ देर बाद वो बोले; "जानू.... I LOVE YOU!" इतने समय बाद इनके मुँह से ये सुन कर अच्छा लगा ... मन प्रसन्न हो गया| "गलती दोनों की थी... okay? matter finish!" कितनी आसानी से उन्होंने मेरे साड़ी गलतियाँ अपने साथ बाँट ली थीं| सच! मुझे लगता है की मैं कभी इन्हें समझ ही नहीं पाऊँगी! अब नींद दोनों को ही आ रही थी.... पर मैं आज का मौका गँवाना नहीं चाहती थी| ये पीठ के बल लेते थे, मैंने इनके दहीं हाथ को सीधा किया और उसे अपना तकिया बनाते हुए इनसे लिपट गई| इन्होने दोनों के ऊपर रजाई डाली और फिर मेरी तरफ करवट ले कर लेट गए| इनके होंठ मेरे मस्तक को छू रहे थे और मैं वो तपिश अपने मस्तक पर महसूस कर पा रही थी| सच एक अरसे बाद हम इस तरह सो रहे थे! रात को करीब तीन बजे मैंने एक भयानक सपना देखा...जिसके बारे में लिखने में भी मुझे दर लगा रहा है और मैं बुरी तरह घबरा गई और चौंक कर उठ गई| मेरे साथ-साथ इनकी भी आँख खुल गई और इन्हें पता चला गया की मैंने कोई भयानक सपना देखा है| ये बोले; "hey ... मैं यहीं हूँ... !" और मैं फिर से इनके सीने से आ लगी और आँख से आँसूं बह निकले| इन्होने मेरे आँसूं पोछे और मुझे इतना कस के अपने सीने से लगाया की मुझे इनकी और इन्हें मेरे दिल की जोरदार धड़कन सुनाई देने लगी थी| हम फिर से लेट गए पर नींद नहीं आ रही थी…. ना मुझे और ना इन्हें ....
करीब एक घंटे बाद दरवाजे पर दस्तक हुई..... पहले तो हम दोनों डर गए क्योंकि इतनी देर रात दस्तक होना किसी अच्छी चीज की निशानी तो नहीं थी| मैं उठने लगी तो इन्होने मुझे रोक दिया और खुद दरवाजा खोला| दरवाजा खोलते ही नेहा आकर इनके पैरों में लिपट गई और रोने लगी| उसे रोता देख मैं भी झट से उठ गई और तब तक इन्होने उसे गोद में उठा लिया था और उसे पुचकारने लगे| "awwwwww मेरा बच्चा क्या हुआ? फिर से बुरा सपना देखा?.... बस...बस... रोते नहीं... बस.... पापा हैं ना यहाँ|" ये उसे गोद में ले कर घूमने लगे जैसे किसी नन्हें बच्चे को चुप कराया जाता है| मेरी नजर दुबारा दरवाजे पर गई तो देखा मेरी माँ कड़ी थीं और इन्हें इस तरह नेहा को पुचकारता हुआ देख हँस रही थीं| "अब समझ आया की नेहा मानु बेटे से इतना प्यार क्यों करती है! खेर माफ़ करना बेटा पर अचानक से नेहा चौंक कर उठ गई और पापा का कर रोने लगी| तुमने अभी तक किसिस डॉक्टर को इसे नहीं दिखाया?"
मैंने जवाब देने के लिए मुँह खोला ही था की ये बोल पड़े; "नहीं माँ...नेहा को कोई बीमारी नहीं है| वो बस मुझसे बहुत प्यार करती है ना की उसे मेरे बिना नींद नहीं आती|" पता नहीं कैसे पर एह की आँख लग गई थी या कम से कम हमें तो यही लगा था|
"पर बेटे...अभी तुम जवान हो.... और अगर इस तरह ये तुम दोनों से....मतलब.... तुम दोनों को नही तो कुछ समय मिलना चाहिए?" माँ ने कहा और मेरी तरह आप लोग भी उनकी बात समझ ही गए होंगे| हम दोनों के पास इसका कोई जवाब नहीं था और हम दोनों बस एक दूसरे की ओर देख रहे थे.... थोड़ा awkward moment था .... तभी माँ को भी हमारी दशा समझ आ गई और वो बोलीं; "अच्छा बेटा ... नेहा तो सो गई ... अब आप दोनों भी सो जाओ|" और इतना कह कर माँ चली गईं| मैंने दरवाजा बंद किया और देखा तो ये पीठ के बल सीधा लेटे हुए थे ओर नेहा इनकी छाती पर चिपकी हुई थी| मेरे लिए इन्होने अपनी दायीं बाह को खोल रखा था ताकि मैं उसे अपना तकिया बना के लेट जाऊँ| इसलिए मैं भी बिस्तर में घुसी और उनके biceps को अपना तकिया बना कर इनसे लिपट गई| मेरा डायन हाथ नेहा की पीठ पर था और मैं उसे सहला रही थी| करीब आधे घंटे बाद दोनों की आँख लग गई|
सुबह ग्यारह बजे सबकी फ्लाइट थी तो मैं करीब पाँच बजे उठ गई और नहा धो कर रसोई में पहुँच गई| आज ठण्ड ज्यादा थी और रात भर मेरी और नेहा की वजह से इनकी नींद पूरी नहीं हुई थी इसलिए सबब बैठक में बैठे थे और सब वहीँ चाय पी रहे थे| सात बजे करीब नेहा उठ कर बाहर आई तो मुझे लगा की अब ये भी उठ गए होंगे| इसलिए मैं अपनी और इनकी चाय ले कर कमरे में आ गई और मेरे पीछे-पीछे बड़की अम्मा भी आ गईं| उनके हाथ में एक झोला था और चेहरे पर मुस्कान| "बेटा.... तूने मेरी कोख से जनम क्यों नहीं लिया?" ये कहते हुए अम्मा ने इनके सर पर हाथ रख दिया|
"अम्मा.... सिर्फ जन्म लेने से कोई बेटा बन जाता है?" इन्होने जवाब दिया|
"हम्म.... मेरे बच्चे जिन्होंने मुझे कभी रेल से यात्रा नहीं कराई और तू मुझे हवाई जहाज से यात्रा करा रहा है! जुग-जुग जिओ ... दूधो नहाओ पुतो फलों!" अम्मा ने इन्हें आशीर्वाद दिया|
"अच्छा अम्मा...एक बात थी! बुरा न मानो तो एक बात कहूँ?" इन्होने जिझकते हुए कहा|
"पूछ बेटा|"
"अम्मा जब आप आये थे उस इन आप आयुष से तो गले मिल लिए थे पर आपका ध्यान नेहा पर नहीं गया....वो बेचारी आपके पाँव छू कर ही रह गई| मैं जानता हूँ आप उसे भी प्यार करते हो पर....." इन्होने बात पूरी नहीं की|
"नेहा....बेटी इधर तो आ|" अम्मा ने नेहा को आवाज लगाईं| नेहा सामने आ कर खड़ी हो गई| अम्मा ने अपना हाथ झोले में डाला और गुलाबी कागज में बंधा हुआ कुछ निकला और उसे खोलने लगी| जब उन्होंने उसे खोला तो उसमें चाँदी की पायल निकली| बहुत खूबसूरत थी....
उन्होंने वो पायल नेहा को दी और उसका माथा चूम कर बोलीं; "ये मेरी बेटी के लिए.... वैसे ये थी तो तेरी माँ के लिए पर उससे ज्यादा तेरे पाँव पर जचेगी! और मुझे माफ़ कर दे बेटी उस दिन मैं ने सच में तुझ पर ध्यान नहीं दिया| तेरे पापा की तबियत के बारे में सुन कर मैं बहुत परेशान थी... सॉरी (sorry)!"
नेहा ये सुनते ही अम्मा से लिपट गई और बोली; "सॉरी नहीं sorry ... और अम्मा माँ ने मुझे समझा दिया था... its okay!" पता नहीं अम्मा को क्या समझ आया पर उन्होंने फिर से लड़खड़ाते हुए कहा; "टहंक ऊ" ये सं कर हम सब की हँसी छूट गई और नेहा ने उन्हें फिर से बताया की; "अम्मा thank you होता है!" ये सुन का र अम्मा के मुंह पर बी मुस्कान आ गई| खेर सब क जाने का समय नजदीक आ रहा था| पिताजी (ससुर जी) ने Innova taxi मँगवाई थी और वे खुद सबको छोड़ने T3 जा रहे थे| मेरे लाख मन करने पर भी ये उठ के बहार बैठक में आ गए और सभी के पाँव छुए और उन्हें विदा किया| सबने जाते हुए इन्हें बहुत-बहुत आशीर्वाद दिए| सबके जाने के बाद घर में बस मैं, माँ, नेहा और ये ही रह गए थे| जैसे ही ये अपने कमरे में आये इन्हें sinus का अटैक शुरू हो गया!